लोकतंत्र में आंदोलन केवल नारों, भीड़ और अनशन से नहीं बनते। आंदोलन की असली परीक्षा इस बात से होती है कि उसका मूल प्रश्न क्या है, उसका नैतिक आधार कितना स्पष्ट है, उसका नेतृत्व कितना पारदर्शी है और उसकी ऊर्जा अंततः किस राजनीतिक दिशा में बह रही है। जनता का असंतोष नदी का पानी है, लेकिन उसे किस नहर में मोड़ा जाएगा, यह अक्सर वे लोग तय करते हैं जिनके हाथ में संगठन, प्रचार और प्रतीक होते हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के नाम से उभरा अभियान इसी जटिलता का उदाहरण है। इसे पूरी तरह काल्पनिक बताना उचित नहीं होगा, क्योंकि नीट परीक्षा, बेरोजगारी, पेपर लीक और संस्थागत जवाबदेही से जुड़ी युवाओं की बेचैनी वास्तविक है। लेकिन वास्तविक पीड़ा की जमीन पर उगी हर राजनीतिक फसल स्वाभाविक नहीं होती। कई बार बीज कहीं और से आता है, खाद किसी और की होती है और फसल काटने वाले वे लोग होते हैं जो आरंभ से खेत में दिखाई भी नहीं देते।
सीजेपी की डिजिटल उपस्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत हुआ मानो देश का पूरा युवा वर्ग किसी निर्णायक विद्रोह के लिए उठ खड़ा हुआ हो। सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की आंधी चली, वीडियो वायरल हुए, मीम बने और एक ऐसी छवि तैयार की गई जैसे यह स्वतंत्र भारत के सबसे व्यापक युवा आंदोलनों में से एक हो, लेकिन जैसे ही इस विराट डिजिटल छाया को जमीन पर नापा गया, उसका आकार सिकुड़ता दिखाई दिया। स्क्रीन पर महासागर की तरह प्रस्तुत हुआ आंदोलन जंतर मंतर पर चंद बूंदों की तरह नजर आया। आंदोलन की वास्तविक शक्ल देखकर भाजपा विरोध की वह राजनीति जो अचानक मन भा रही थी, इससे छिटकने लगी।
इसी अंतर को सीजीआई प्रोटेस्ट का रूपक समझा जा सकता है। दृश्य भव्य, भावनाएं तीखी, प्रस्तुति चमकदार, लेकिन वास्तविक जनसंगठन अपेक्षाकृत कमजोर। तथ्य जांच ने यह भी दिखाया कि कुछ भीड़ वाले वीडियो सचमुच कृत्रिम पाए गए। इससे स्पष्ट है कि आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष का नहीं, सूचना युद्ध का भी मैदान बन चुका है।
इस पूरे प्रसंग की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आंदोलन की उत्पत्ति नीट से नहीं हुई थी। इसका तात्कालिक कारण मुख्य न्यायाधीश की एक विवादास्पद मौखिक टिप्पणी थी, जो फर्जी डिग्रियों और संदिग्ध पेशेवर योग्यताओं से संबंधित मामले में की गई थी। टिप्पणी कठोर थी, उसकी भाषा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक था और न्यायपालिका जैसे संस्थान से अधिक संयम की अपेक्षा भी उचित है। लेकिन इस सीमित कानूनी संदर्भ को समस्त बेरोजगार युवाओं के अपमान के रूप में गढ़ा जाने लगा।
यहीं से कथा निर्माण आरंभ हुआ। फर्जी डिग्रियों की जांच का प्रश्न पीछे चला गया और उसके स्थान पर नीट, बेरोजगारी, न्यायपालिका, मीडिया, सत्ता, लोकतंत्र और व्यवस्था विरोध का विशाल गठ्ठर तैयार कर दिया गया। अलग-अलग समस्याओं को एक ही रस्सी में गांठ दिया गया, ताकि हर नाराज व्यक्ति उस रस्सी का कोई न कोई सिरा पकड़ सके।
प्रोपेगेंडा या प्रपंच हमेशा झूठ का दूसरा नाम नहीं होता। उसका सबसे परिष्कृत रूप आधे सत्यों की माला होता है। हर मनका असली दिख सकता है, लेकिन धागा स्वार्थ से भरा, राजनीतिक होता है। नीट की चिंताएं वास्तविक थीं। बेरोजगारी वास्तविक है। किंतु इन सभी को एक न्यायिक टिप्पणी से अनायास जोड़ देना तथ्य का नहीं, राजनीतिक तिकड़म का कार्य था।
यदि इस आंदोलन में वास्तविक नैतिक साहस होता, तो वह फर्जी डिग्रियों, जाली मार्कशीट, खरीदे गए प्रमाणपत्रों और उन संगठित गिरोहों के विरुद्ध भी आवाज उठाता जो योग्य युवाओं के अवसर चुरा रहे हैं। लेकिन वह कठिन प्रश्न कालीन के नीचे सरका दिया गया। कारण स्पष्ट है। फर्जी डिग्री का मुद्दा नारे से अधिक जांच मांगता है। उसमें अपराधी हर दल, वर्ग और संस्था में मिल सकते हैं। वह सुविधाजनक शत्रु नहीं देता। इसलिए आसान क्रोध चुना गया और जटिल सत्य छोड़ दिया गया।
आंदोलन की निष्पक्षता पर दूसरा बड़ा प्रश्न उसके नेतृत्व की राजनीतिक पृष्ठभूमि से उठता है। संस्थापक अभिजीत दीपके का आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया और मीम राजनीति से पुराना संबंध सार्वजनिक चर्चा में आया। उन्होंने वर्तमान संगठनात्मक संबंध से इनकार किया, लेकिन इससे प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता। किसी व्यक्ति का किसी दल से पूर्व संबंध होना अपराध नहीं है। समस्या तब होती है जब राजनीतिक प्रशिक्षण और प्रचार कौशल से निर्मित अभियान स्वयं को पूर्णतः स्वतःस्फूर्त, निष्पक्ष और दलविहीन जनाक्रोश के रूप में प्रस्तुत करे।
आम आदमी पार्टी का अपना इतिहास भी इस संदेह को गहरा करता है। अन्ना आंदोलन ने नैतिकता, भ्रष्टाचार विरोध और जनलोकपाल की भाषा में जनता का विश्वास अर्जित किया। बाद में उसी नैतिक ऊर्जा को राजनीतिक दल की सीढ़ी बनाया गया। अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते अलग हुए। सत्ता प्राप्ति के बाद वही दल उन विवादों और आरोपों में घिरा जिनसे लड़ने का दावा करते हुए वह जन्मा था। इसलिए जब एक नया आंदोलन फिर किसी निष्कलंक नैतिक प्रतीक की तलाश करता है, तो इतिहास चेतावनी की घंटी बजाता है।
इस बार वह प्रतीक सोनम वांगचुक बने। फिल्मी संस्कृति ने पहले ही उनके चारों ओर एक आदर्शवादी आभा निर्मित कर दी थी। फुनसुख वांगडू की लोकप्रिय स्मृति ने वास्तविक सोनम वांगचुक को भी लगभग एक बेदाग नैतिक चरित्र की तरह स्थापित कर दिया। लेकिन वास्तविक मनुष्य फिल्मी पात्र नहीं होता।
उसके निर्णय, संस्थान, राजनीतिक संबंध और सार्वजनिक वक्तव्य जांच से परे नहीं हो सकते। वांगचुक से जुड़े भूमि आवंटन, संस्थागत मान्यता, विदेशी चंदा अनुपालन, लद्दाख आंदोलन और सरकारी कार्रवाई जैसे विवाद वास्तविक हैं। इन सभी में राष्ट्रीय चिंताओं की महत्वपूर्ण व्याख्याएं हैं। इन्हें छिपाना भी अनुचित है। वास्तव में नैतिकता में लपेटकर प्रस्तुत किए गए प्रतीक को आलोचना से ऊपर रख देना लोकतांत्रिक विवेक का परित्याग है।
सोनम वांगचुक का अनशन आंदोलन के लिए मानो नैतिक पूंजी के तौर पर सहेजा जाने लगा। जैसे-जैसे अनशन के दिन बढ़े, मूल मुद्दे पीछे और उनका स्वास्थ्य आगे आता गया। यह भावनात्मक रूप से प्रभावी रणनीति थी। किसी व्यक्ति की गिरती सेहत स्वाभाविक रूप से सहानुभूति पैदा करती है, लेकिन सहानुभूति नीति का विकल्प नहीं होती। किसी व्यक्ति के शरीर को तर्क की अंतिम अदालत नहीं बनाया जा सकता।
इसी बीच भोजन करते आयोजकों के वीडियो ने आंदोलन की प्रतीकात्मक असंगति उजागर की। आयोजकों ने कहा कि संचालन करने वाली टीम अनशन पर नहीं थी और कुछ वीडियो पुराने थे। यह स्पष्टीकरण संभव है, लेकिन राजनीति में दृश्य तथ्य से अधिक प्रभावी हो जाते हैं। एक ओर भूख से कमजोर होता प्रतीक और दूसरी ओर भोजन करता नेतृत्व। यह विरोधाभास आंदोलन की नैतिक संरचना पर प्रश्न उठाता है, भले ही वह तकनीकी रूप से गलत न हो।
जंतर मंतर के मंच पर ‘हम देखेंगे’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसी प्रस्तुति ने इसके पीछे छिपी कड़वाहट की कलई खोल दी। सार्वजनिक आंदोलन में मंच कोई साहित्यिक प्रयोगशाला नहीं होता। यह बहुत संवेदनशील झरोखा होता है। लोग देखते भी हैं और आप दिखते भी हो। जनता यहां विचारों को सूक्ष्मता से परखती है।
मंच पर कौन आता है, क्या बोलता है और किस प्रतीक का उपयोग करता है, यह आयोजकों की राजनीतिक जिम्मेदारी है। यदि आंदोलन स्वयं को समस्त भारतीय युवाओं का मंच बताता है, तो वह रंच मात्र भी असंवेदनशील या मसखरों का जमावड़ा कैसे हो सकता है! आयोजकों द्वारा विवादित तत्वों को मंच देने के बाद स्वयं को निर्दोष दर्शक बताना किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है। सार्वजनिक मंच किराए का कमरा नहीं होता, जहां आने जाने वाले से मालिक का कोई संबंध न हो। मंच आंदोलन और विचार का चेहरा होता है।
मानसून सत्र के साथ संसद मार्च की टाइमिंग भी बताती है कि यह अभियान केवल छात्र असंतोष नहीं रहा। वह राजनीतिक वैधता, मीडिया दृश्यता और विपक्षी एकजुटता का उकसाऊ माध्यम बन चुका था। अलग-अलग मुद्दों, व्यक्तियों और समूहों को जोड़ने की कोशिश किसी व्यापक नागरिक आकांक्षा का प्रतिबिंब मानी जा सकती थी, लेकिन बिना स्पष्ट वैचारिक आधार के ऐसा गठबंधन अक्सर अवसरवाद की मंडी बन जाता है।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि आंदोलन राजनीतिक क्यों हुआ। हर गंभीर आंदोलन राजनीतिक परिणाम पैदा करता है। असली प्रश्न यह है कि क्या उसने अपनी राजनीति को ईमानदारी से स्वीकार किया। क्या उसने अपने वित्त, संगठन, नेतृत्व, दलगत संबंध, सोशल मीडिया तंत्र और भविष्य की योजना को सार्वजनिक किया। क्या उसने नीट की समस्याओं के समाधान का ठोस प्रारूप दिया। क्या उसने फर्जी डिग्रियों के मूल प्रश्न को उठाया। क्या उसने मंचीय अनुशासन बनाया। क्या उसने दर्शक, फॉलोअर और वास्तविक कार्यकर्ता के अंतर को स्वीकार किया।
युवाओं की पीड़ा को नकारना सत्ता का अहंकार है। लेकिन उसी पीड़ा को डिजिटल तमाशे, राजनीतिक ब्रांड और नैतिक व्यापार में बदल देना आंदोलनकारी अवसरवाद है।
नैतिकता का लबादा पहन लेने से कोई आंदोलन नैतिक नहीं हो जाता। असली नैतिकता वहां दिखाई देती है जहां आंदोलन अपने पक्ष के असुविधाजनक तथ्यों को भी सामने रखे, अपने नेताओं से प्रश्न पूछे, अपने मंच की सीमाएं तय करे और उस मूल समस्या से न भागे जिसके नाम पर उसने जनता का विश्वास मांगा था। वरना आंदोलन मशाल नहीं रहता। वह कैमरे के सामने जलती फुलझड़ी बन जाता है। चमक बहुत होती है, धुआं भी बहुत उठता है, लेकिन अंधेरा वहीं का वहीं रहता है।
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