लखनऊ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने लखनऊ में आयोजित एक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए भारत की समृद्ध और गौरवशाली प्राचीन शिक्षा पद्धति पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में शिक्षा पूरी तरह से निःशुल्क (Free Education) थी, जहाँ छात्रों को भोजन, वस्त्र, औषधि और पुस्तकें गुरुकुल में बिना किसी शुल्क के प्राप्त होती थीं। भारत में शिक्षा पर शुल्क लगाने और इसका व्यवसायीकरण करने का काम अंग्रेजों ने किया।
डॉ. कृष्ण गोपाल रविवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में ‘महामना शिक्षण संस्थान’ के नूतन सत्र के शुभारम्भ के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज देश में बड़े-बड़े एक्सप्रेसवे, हाइवे और एयरपोर्ट तो बन रहे हैं, लेकिन हमारे समाज का 80 प्रतिशत हिस्सा आज भी उच्च शिक्षा (Higher Education) प्राप्त करने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है। शिक्षा का यह महंगा स्वरूप समाज में असंतोष उत्पन्न कर रहा है।
“दुनिया को गणित, व्याकरण और विज्ञान भारत ने सिखाया”
सह सरकार्यवाह ने वैश्विक पटल पर भारत के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत में प्राचीन काल में आर्थिक और भौतिक उन्नति चरम पर थी।
“पूरी दुनिया को व्याकरण, अक्षर ज्ञान, दशमलव (Decimal), गणित, त्रिकोणमिति (Trigonometry) और नक्षत्रों की सटीक गणना करना भारत ने ही सिखाया। यहाँ तक कि दुनिया को सभ्यता और कपड़ा पहनना भी भारत ने सिखाया। विश्व में सबसे पहला जहाज (Ship) भी भारत की ही धरती पर बनाया गया था।” – डॉ. कृष्ण गोपाल, सह सरकार्यवाह, RSS
उन्होंने आगे कहा कि प्राचीन समय में भारत के प्रत्येक गाँव में विद्यालय संचालित होते थे। देश में नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय थे, जहाँ विदेशों से छात्र अध्ययन करने आते थे। लेकिन पहले इस्लामिक आक्रमणों ने हमारे इन महान शैक्षणिक संस्थानों को नष्ट किया और बाद में जब अंग्रेज आए, तो उन्होंने भारत की पारंपरिक शिक्षा पद्धति को ही पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। इसी दमनकारी नीति के कारण देखते ही देखते समृद्ध भारत एक निरक्षर देश में बदल गया।
उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ते मानसिक तनाव पर गहरी चिंता
इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और आईआईटी (IIT) लखनऊ के निदेशक प्रो. अरुण मोहन शेरी ने कहा कि महामना शिक्षण संस्थान समाज को वैचारिक दिशा देने और सकारात्मक बदलाव लाने का सराहनीय कार्य कर रहा है। उन्होंने वर्तमान समय में देश के शीर्ष उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के बीच बढ़ते मानसिक तनाव और आत्महत्या की दुखद घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस संकट से निपटने के लिए उच्च शिक्षा के माहौल और पाठ्यक्रम में थोड़े मानवीय बदलाव की सख्त जरूरत है।
समारोह के अन्य मुख्य विचार:
- संस्कारों से ही खड़ा होगा भारत: कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दुर्ग सिंह चौहान ने कहा कि शिष्टाचार की पहली जननी माँ होती है। देश की सभी आंतरिक समस्याओं का अंतिम समाधान केवल पौराणिक संस्कारों से युक्त शिक्षा में ही निहित है।
- महापुरुषों की प्रेरणा: डॉ. अणिमा जामवाल ने संस्थान के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि ‘महामना मालवीय शिक्षण संस्थान’ देश के दो महान मनीषियों— महामना पंडित मदन मोहन मालवीय और भाऊराव देवरस जी की राष्ट्र निर्माण की पावन प्रेरणा से निरंतर संचालित हो रहा है।
इस गरिमामयी सत्र के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन, लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति प्रो. जे.पी. सैनी, प्रान्त प्रचारक कौशल, पूर्व क्षेत्र प्रचारक शिवनारायण, क्षेत्र के गौरक्षा गतिविधि के संयोजक व सामाजिक सद्भाव के प्रान्त प्रमुख राजेन्द्र, विभाग प्रचारक अनिल, कैंसर संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट, डॉ. नवीन जामवाल एवं डॉ. संतोष शुक्ला सहित शहर के कई प्रबुद्ध शिक्षाविद व गणमान्य नागरिक मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

















