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मुसलमान बने तो आरक्षण नहीं

मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक हालिया निर्णय में कहा है कि यदि कन्वर्जन कर कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार कर लेता है तो उसके जन्म से तय होने वाले किसी विशेष समुदाय की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यानी उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा

Written byडॉ. विश्वास कुमार चौहानडॉ. विश्वास कुमार चौहान
Jul 7, 2026, 10:38 pm IST
in विश्लेषण, तमिलनाडु

अभी हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने एक ऐसे सरकारी आदेश को संविधान के विरुद्ध बताते हुए रद्द कर दिया, जो कन्वर्जन करने वाले व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण का लाभ देने की अनुमति देता था। यह केवल अदालत का एक फैसला नहीं है, बल्कि समाज, मजहब और आरक्षण से जुड़े बड़े सवालों को भी सामने रखता है।

मद्रास हाईकोर्ट का फैसला

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2024 का तमिलनाडु सरकार का आदेश उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पहले से तय किए गए कानूनी सिद्धांतों के विपरीत था।
न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति के इस्लाम स्वीकार करने के बाद उसे केवल मुसलमान माना जाएगा। उसे जन्म से तय होने वाले किसी विशेष समुदाय की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में लिखा है कि-
‘जैसा कि मद्रास उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने 75 वर्ष पहले कहा था, इस्लाम अपनाने पर व्यक्ति मुसलमान बन जाता है। ‘सिर्फ एक मुसलमान’ शब्द का प्रयोग किया गया था। उसे किसी ऐसे समुदाय में नहीं रखा जा सकता जिसकी पहचान केवल जन्म से निर्धारित होती है। जब खंड पीठ का निर्णय आज भी प्रभावी है, तब केवल एक सरकारी आदेश जारी कर उसे बदला नहीं जा सकता।’

इसी आधार पर मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने 25/26 जून 2026 को रिट याचिका नंबर 7127-2022 (समीर अहमद बनाम जिला कलेक्टर) में तमिलनाडु सरकार के आदेश नंबर.31 दिनांक 09.03.2024 को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

मद्रास उच्च न्यायालय ने 1951 के ऐतिहासिक निर्णय जी. माइकल बनाम एस. वेंकटेश्वरन (1952) 1 एमएलजे 239 का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि हिंदू से इस्लाम मजहब अपनाने वाला व्यक्ति ‘सिर्फ एक मुसलमान’ बन जाता है। इस सिद्धांत की पुष्टि बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कैलाश सोनकर, के.पी. मनु तथा सी. सेल्वरानी (2024) जैसे मामलों में भी की।

न्यायालय की यह टिप्पणी केवल कन्वर्जन तक सीमित नहीं है। यह संविधान के उस मूल सिद्धांत को भी दोहराती है कि सरकार केवल आदेश निकालकर अदालत के पहले से लागू फैसलों का असर खत्म नहीं कर सकती। अदालत ने कन्वर्जन और उसके बाद आरक्षण की मांग के बीच पैदा होने वाली दोहरी स्थिति पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा-

‘ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक उपदेशकों ने दशकों तक यह प्रचार किया कि उनके मजहब या रिलीजन में सामाजिक समानता है जबकि हिंदू में जाति व्यवस्था है। यदि कन्वर्जन इसी आधार पर कराया गया है, तो बाद में यह कहना कि इस्लाम में भी ऊंच-नीच या सामाजिक पदानुक्रम है, उचित नहीं कहा जा सकता। हमारी राय में कुछ समुदायों को ‘पिछड़ा’ और अन्य को ‘अगड़ा’ मानना कुरान की मूल भावना के भी विपरीत है।’

अंत में सरकारी आदेश की कानूनी वैधता पर सवाल उठाते हुए अदालत ने अपने फैसले में कहा-‘जब कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है तो जमात उसे यह प्रमाणित करती है कि वह मुसलमान बन गया है। हमारे पास यह निष्कर्ष निकालने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है कि सरकार केवल न्यायालय के पूर्व निर्णयों को निष्प्रभावी करने के लिए एक नया तरीका लेकर आई है, जो न केवल असंवैधानिक है बल्कि गैर-इस्लामिक भी है।’

कौन हैं ये मुस्लिम लेब्बाई

याचिकाकर्ता ने 2016 में इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार एक महिला से शादी की थी, और उसके दो बच्चे हैं। उसने अपना नाम बदलने के बाद जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था जिसमें उसे “मुस्लिम लेब्बाई” दिखाया गया हो क्योंकि वह उस खास समुदाय के धर्म को मानता है। उसके आवेदन को कायथर के तहसीलदार ने खारिज कर दिया, जिसके बाद उसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
यह फैसला तब आया जब न्यायालय ने 2022 में थूथुकुडी के रहने वाले एक व्यक्ति की अर्जी पर सुनवाई कर रहा था। उसके माता-पिता हिंदू थे और उन्होंने 2015 में इस्लाम स्वीकार कर लिया था।
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ का हालिया आदेश, जिसमें 2024 के तमिलनाडु सरकार के आदेश को रद्द कर दिया गया था। इस सरकारी आदेश में व्यवस्था है कि जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया है, उन्हें पिछड़े वर्ग के मुसलमान (बीसीएम) श्रेणी में आरक्षण प्रदान किया जाए। इस आरक्षण का लाभ सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में दाखिले के लिए पिछड़े वर्ग के मुसलमानों-(बीसीएम) के नाम पर लंबे समय से उठा रहा है।
इस संदर्भ में राज्यसभा सांसद डाॅ. के. लक्ष्मण का कहना है कि मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले ने एक मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत की पुष्टि की है कि आरक्षण सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए है, न कि केवल कन्वर्जन के आधार पर लाभ उठाया जाना चाहिए।
लक्ष्मण का मानना है कुछ राज्यों में मुसलमानों को ओबीसी सूची में शामिल करने से वास्तव में पिछड़े ओबीसी समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। आरक्षण सामाजिक न्याय का एक संवैधानिक साधन है और इसे राजनीतिक तुष्टीकरण का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय ने सही कहा है कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति स्वतः ही पिछड़े वर्ग के मुस्लिम का दर्जा प्राप्त नहीं कर सकता। यह फैसला आरक्षण को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक ढांचे को मजबूत करता है। इस बात को पुष्ट करता है कि लाभ उन्हीं तक पहुंचना चाहिए जो वास्तव में इसके हकदार हैं। आरक्षण की प्रत्येक सीट का गलत तरीके से दुरुपयोग एक योग्य ओबीसी युवा को शिक्षा, रोजगार और अवसर से वंचित करता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आरक्षण को संविधान और न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार लागू किया जाए, ताकि सामाजिक न्याय हो सके।

निर्णय का संवैधानिक आधार

यह निर्णय केवल मजहब से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि संविधान के मूल सिद्धांतों पर भी आधारित है। संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के सामने समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को समाज और शिक्षा में पिछड़े वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था करने की अनुमति देते हैं। इसी प्रकार अनुच्छेद 162 के अनुसार राज्य सरकार की कार्यपालिका शक्ति संविधान और अदालतों के निर्णयों के अधीन होती है। कोई भी सरकारी आदेश अदालत द्वारा पहले से तय किए गए कानूनी सिद्धांतों के विपरीत नहीं हो सकता।

संविधान सभा की मंशा और आरक्षण का उद्देश्य

हमारे संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की व्यवस्था इसलिए बनाई थी ताकि समाज और शिक्षा में लंबे समय से पीछे रह गए वर्गों को बराबरी का अवसर मिल सके। डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित संविधान सभा के अनेक सदस्यों ने स्पष्ट किया था कि आरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को प्रतिनिधित्व देना है, न कि मजहब के आधार पर विशेष लाभ देना।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक निर्णयों में यही सिद्धांत दोहराया है। विशेष रूप से इंदिरा साहनी (1992) के ऐतिहासिक निर्णय में कहा गया कि पिछड़ेपन का आधार सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति है, केवल मजहब नहीं। बाद के निर्णयों, जैसे एम. नागराज (2006) और जरनैल सिंह (2018) में भी न्यायालय ने ठोस आंकड़ों और वास्तविक सामाजिक पिछड़ेपन के महत्व पर बल दिया।

‘अल्पसंख्यक’ शब्द की अनसुलझी परिभाषा

आज हमारे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि ‘अल्पसंख्यक’ किसे माना जाए। संविधान में इस शब्द का प्रयोग तो किया गया है, लेकिन इसकी कोई स्पष्ट और सभी जगह लागू होने वाली परिभाषा नहीं दी गई है। समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने अलग-अलग मामलों में धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों की पहचान के कुछ सिद्धांत बताए हैं। इसलिए यह विषय आज भी संवैधानिक और सरकारी नीति से जुड़ी बहस का हिस्सा बना हुआ है।

दोहरा लाभ और न्याय का तराजू

आज भारत के आम नागरिक के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या एक व्यक्ति संविधान के तहत मिलने वाली विभिन्न सुविधाओं का एक साथ लाभ प्राप्त कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति मजहबी अल्पसंख्यक संस्थानों की सुविधाओं का लाभ भी प्राप्त करे और साथ ही पिछड़ा वर्ग अथवा अन्य श्रेणियों के लाभ भी प्राप्त करे, तो यह नीति-निर्माताओं के सामने संतुलन का विषय बन जाता है।

संविधान सर्वोच्च या शरीयत

भारत का संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। प्रत्येक नागरिक, संस्था और सरकार इसी के अधीन कार्य करती है। संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता भी संविधान के अन्य प्रावधानों और मौलिक अधिकारों के अधीन है। यदि कोई परंपरा, प्रथा या सरकारी नीति समानता, गरिमा और न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करती है, तो अंततः संविधान को ही सर्वोच्च माना जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत धार्मिक कानून भी पूरी तरह अदालत की समीक्षा से बाहर नहीं हैं। जहां मौलिक अधिकारों, समानता और संवैधानिक मूल्यों का प्रश्न उठता है, वहां संविधान सर्वोपरि रहता है। इसी कारण समय-समय पर समान नागरिक संहिता पर भी राष्ट्रीय स्तर पर बहस होती रही है।

समाधान की दिशा

मद्रास उच्च न्यायालय का यह निर्णय संकेत देता है कि आरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े विषयों की समय-समय पर गंभीर समीक्षा होती रहनी चाहिए। यह भी आवश्यक है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में उन्हीं लोगों तक पहुंचे, जिनके लिए संविधान ने इसकी व्यवस्था की है। नीतियों की समीक्षा करते समय इंदिरा साहनी, एम. नागराज (2006) तथा जरनैल सिंह (2018) जैसे निर्णयों के अनुसार ठोस आंकड़ों, क्रीमी लेयर व्यवस्था तथा समय-समय पर सामाजिक और शैक्षणिक सर्वेक्षणों का ध्यान रखा जाना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि आरक्षण का लाभ वास्तव में पात्र वर्गों तक पहुंचे और संविधान का उद्देश्य पूरा हो।

लोकतंत्र की शक्ति

मद्रास उच्च न्यायालय का यह निर्णय केवल एक सरकारी आदेश को रद्द करने तक सीमित नहीं है। यह संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और आरक्षण की मूल भावना को फिर से स्पष्ट करता है। यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि भारत में सामाजिक न्याय का आधार संविधान है, न कि कोई प्रशासनिक सुविधा या राजनीतिक आवश्यकता। समानता का अर्थ सभी नागरिकों के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार करना नहीं, बल्कि उन लोगों को उचित अवसर देना है जो वास्तव में समाज और शिक्षा में लंबे समय से पीछे रहे हैं। साथ ही यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय, दोनों ही भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण
मूल्य हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की शक्ति है और यही संविधान की आत्मा भी।

Topics: ) संविधान की सर्वोच्चताइंदिरा साहनी मामलासमान नागरिक संहिताजी. माइकलआरक्षणगैर-इस्लामिकमद्रास उच्च न्यायालयडॉ. विश्वास कुमार चौहानअल्पसंख्यकपाञ्चजन्य विशेषधर्मांतरण और आरक्षणमुस्लिम लेब्बाई समुदायसमीर अहमदसंवैधानिक एवं कानूनी
डॉ. विश्वास कुमार चौहान
डॉ. विश्वास कुमार चौहान
प्रोफेसर, पीजी लॉ कॉलेज भोपाल [Read more]
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