आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। पूरी दुनिया इसके फायदे और नुकसान पर बात कर रही है। विशेषज्ञ कहते हैं कि एआई कई जगह ठीक काम करता है, लेकिन अगले दस साल में यह इंसानों पर हावी हो सकता है। दूसरी तरफ, प्राकृतिक आपदाओं में लोगों को बचाने जैसे कामों में इस तकनीक ने हजारों जानें भी बचाई हैं।
पिछले महीने नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने हजारों लोगों की जान ले ली। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से बहुतों की जान बच भी गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल के वित्त मंत्रालय के आईटी इंजीनियर नीरज भुषाल ने एक एआई वाला वेब पोर्टल बनाया। इसमें लोगों से मिले लापता व्यक्तियों की जानकारी को आधिकारिक मृतक और घायल सूची से मिलाया गया। साथ ही ओपन-सोर्स सैटेलाइट तस्वीरों से टूटी इमारतों का नक्शा भी बनाया गया।
इसी तरह निजी ड्रोन चलाने वाले मनीष महर्जन ने थर्मल कैमरे वाले ड्रोन उड़ाए। ये मलबे में इंसान के शरीर की गर्मी पहचानकर बचाव टीमों को रास्ता दिखाते थे। ये कोशिशें आपदा के पैमाने के मुकाबले छोटी थीं, लेकिन नई तकनीक, खासकर एआई टूल्स की बढ़ती कामयाबी दिखाती है।
बढ़ता उपयोग और फायदा
अब आपदा प्रबंधन सिर्फ सरकारी एजेंसियों तक नहीं रहा। गूगल जैसी कंपनियां, टेलीकॉम वाले और सैटेलाइट कंपनियां भी इसमें लग गई हैं। स्मार्टफोन और ड्रोन बहुत सारा डेटा पैदा करते हैं। आईआईटी बॉम्बे के सेंटर फॉर क्लाइमेट स्टडीज के प्रमुख सुबिमल घोष कहते हैं कि एआई टूल्स का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये बड़ी मात्रा में डेटा को आम भाषा, आवाज और वीडियो के रूप में लगभग तुरंत प्रोसेस कर सकते हैं। आपदा में समय सबसे कीमती होता है, इसलिए एआई पर भरोसा बढ़ रहा है। घोष मुंबई में भारी बारिश का लोकल पूर्वानुमान निकालने के लिए एआई इस्तेमाल कर रहे हैं।
हाल के दिनों में कई एआई टूल्स बने हैं जैसे ग्राफकास्ट, डिजास्टरअवेयर, गूगल का फ्लड हब और एसकेएआई। ये अर्ली वॉर्निंग, खतरे का नक्शा और सैटेलाइट तस्वीर जैसी सेवाएं देते हैं। एआई अब आपदा प्रबंधन के हर चरण में काम आ रहा है – तैयारी, अर्ली वॉर्निंग, बचाव-रेस्क्यू और फिर रिकवरी-रिहैबिलिटेशन तक।
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अर्ली वॉर्निंग में भूमिका
एआई का सबसे अच्छा इस्तेमाल समय पर पूर्वानुमान और अर्ली वॉर्निंग देने में हो रहा है। पुराने तरीके के मौसम पूर्वानुमान में सैकड़ों फिजिक्स के समीकरण चलाए जाते हैं। जितना लोकल या कम समय का पूर्वानुमान, उतनी अनिश्चितता ज्यादा। एआई अलग तरीके से काम करता है। यह पिछले मौसम के डेटा पर सीखता है और जल्दी से पूर्वानुमान निकालता है। घोष के अनुसार हाइपरलोकल पूर्वानुमान फिजिक्स समीकरणों से मुश्किल है क्योंकि उसमें बहुत कंप्यूटिंग और समय लगता है। लेकिन अच्छी तरह सीखे हुए एआई मॉडल से लगभग तुरंत हाइपरलोकल पूर्वानुमान संभव है। मुंबई में भारी बारिश और बाढ़ के लिए यह अच्छा काम कर रहा है।
गूगल का फ्लड हब दुनिया भर की मौसम एजेंसियों का डेटा लेकर प्रेडिक्शन मॉडल चलाता है। इसे 2018 में भारत की बाढ़ में पहली बार इस्तेमाल किया गया था। यह सात दिन पहले तक सलाह दे सकता है और हाल में थाईलैंड, जापान और भारत के कुछ हिस्सों की बाढ़ का अनुमान भी लगा चुका है।
पूर्वानुमान को खतरे के नक्शों के साथ जोड़कर जोखिम का आकलन करना पड़ता है। यहां एआई कई एजेंसियों के डेटा, टेक्स्ट, ग्राफ और तस्वीरों को प्रोसेस करके पूरे खतरे का अंदाजा लगाता है, जिससे अर्ली वॉर्निंग जारी की जा सकती है।















