भारतीय मूल की बिजनेस लीडर्स में शामिल इंदिरा नूयी एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं। पेप्सिको की पूर्व सीईओ ने हाल ही में एक इंटरव्यू में भारत, चीन और अमेरिका की कार्यसंस्कृति, लोकतंत्र और विकास मॉडल पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अगर वह अमेरिका नहीं गई होतीं, तो शायद अपने करियर में इतनी बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पातीं।
भारत-चीन की तुलना पर क्या बोलीं इंदिरा नूयी?
‘हूवर इंस्टिट्यूशन’ को दिए गए इंटरव्यू में इंदिरा नूयी ने कहा कि अमेरिका में योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने के ज्यादा अवसर मिलते हैं। उन्होंने कहा कि भारत में रहकर उनके लिए इस स्तर तक पहुंचना आसान नहीं होता। भारत और चीन की तुलना करते हुए नूयी ने कहा कि चीन अधिक व्यवस्थित और साफ-सुथरा दिखाई देता है, जबकि भारत काफी विविधताओं वाला और कई बार अव्यवस्थित नजर आता है। उन्होंने कहा कि एक पर्यटक के रूप में चीन में रहना आसान लगता है। उन्होंने चीन के विकास मॉडल और भारत के लोकतंत्र की भी तुलना की। नूयी का कहना था कि चीन ने केंद्रीकृत व्यवस्था के कारण तेजी से फैसले लिए और विकास किया, जबकि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था होने की वजह से निर्णय लेने में समय लगता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें भारत का लोकतंत्र पसंद है, क्योंकि यहां लोगों को अपनी बात कहने और न्याय पाने का अधिकार मिलता है। उनके मुताबिक, यही लोकतंत्र भारत की सबसे बड़ी ताकत है। भारत और अमेरिका के रिश्तों पर बोलते हुए इंदिरा नूयी ने दोनों देशों को स्वाभाविक साझेदार बताया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां की युवा आबादी, अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ तथा सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में प्रतिभा भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने दोनों देशों के नेताओं को सलाह दी कि किसी भी बड़े फैसले से पहले एक-दूसरे के नजरिए को समझने की कोशिश करनी चाहिए। भू-राजनीति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत की मजबूती अमेरिका के लिए भी अहम है। उनके अनुसार, भारत एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है और यहां लोकतंत्र मजबूत बने रहना पूरी दुनिया के हित में है।
इंदिरा नूयी का जन्म 28 अक्टूबर 1955 को चेन्नई में हुआ था। उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज और आईआईएम कलकत्ता से पढ़ाई की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गईं और येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से मास्टर डिग्री हासिल की। 1994 में उन्होंने पेप्सिको जॉइन किया और 2006 में कंपनी की सीईओ बनीं।











