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‘तुम्हारी औकात कैसे हुई मेरी शिकायत करने की?’

'जामिया मिल्लिया इस्लामिया' में प्रोफेसर डॉ. रियाजुद्दीन ने हिंदू कर्मचारी रामफूल मीणा को काफिर कहते हुए उन्हें जातिसूचक गालियां दीं। विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की। मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तक पहुंचा

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 30, 2026, 02:50 pm IST
in दिल्ली
ऊपर प्रकोष्ठ में पीड़ित रामफूल मीणा और आरोपी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रियाजुद्दीन

ऊपर प्रकोष्ठ में पीड़ित रामफूल मीणा और आरोपी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रियाजुद्दीन

नई दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय फिर एक बार विवादों में है। एक एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रियाजुद्दीन ने एक हिंदू कर्मचारी रामफूल मीणा की पिटाई कर दी। जब मीणा ने इसकी शिकायत विश्वविद्यालय के कुलसचिव से की तो उनका स्थानांतरण विश्वविद्यालय के एक ऐसे केंद्र में कर दिया गया, जहां की सभी कर्मचारी महिलाएं हैं और पढ़ने वाली भी लड़कियां हैं। वहां एक ही शौचालय है। रामफूल मीणा का कहना है, “एक तरह से विश्वविद्यालय प्रशासन ने सजा के तौर पर मेरा स्थानांतरण उस केंद्र में कर दिया, जहां किसी पुरुष कर्मचारी की नियुक्ति किसी भी तरह से उचित नहीं है, क्योंकि वह केंद्र महिलाओं के लिए है।” चूंकि मीणा अनुसूचित जनजाति से हैं तो न्याय के लिए उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का दरवाजा खटखटाया। 18 जून को आयोग ने विश्वविद्यालय के कुलपति को एक नोटिस जारी कर इस संबंध में जवाब देने को कहा है।

बता दें कि रामफूल मीणा जामिया मिल्लिया इस्लामिया के ‘यूनिवर्सिटी पॉलिटेक्निक’ में प्रवर श्रेणी लिपिक (यूडीसी) हैं। उनका आरोप है कि लगभग चार महीने पहले उन्होंने प्रो. डॉ. रियाजुद्दीन के विरुद्ध जातिसूचक दुर्व्यवहार और शारीरिक हमले की लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने आरोपी पर कार्रवाई करने के बजाय, उन्हें ही उनके मूल कार्यस्थल से हटाकर जामा मस्जिद के पास स्थित ‘बालक माता सेंटर’ में स्थानांतरित कर दिया। मीणा मानते हैं कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने, उन्हें चुप कराने और प्रताड़ित करने के उद्देश्य से यह प्रतिशोधात्मक कदम उठाया गया। उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से मांग की है कि इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए, उनकेे मूल स्थान को बहाल किया जाए और दोषियों के विरुद्ध ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (एस/एसटी एक्ट) के अंतर्गत कड़ी कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही उन्होंने अपनी सुरक्षा की भी मांग की है।

कैसे शुरू हुआ यह विवाद

दिल्ली पुलिस को 17 जनवरी, 2026 को सौंपी गई आधिकारिक शिकायत के अनुसार, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब छात्रों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर डॉ. रियाजुद्दीन के विरुद्ध एक शिकायत दर्ज की गई थी। रामफूल मीणा का कहना है कि वे उस शिकायत में सीधे तौर पर शामिल नहीं थे, लेकिन उससे जुड़े एक वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद डॉ. रियाजुद्दीन को शक हुआ और उन्होंने मीणा को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया।शिकायत के अनुसार, पहली घटना 13 जनवरी, 2026 को हुई, जब आरोपी प्रोफेसर ने रामफूल मीणा के दफ्तर में घुसकर उन्हें जातिसूचक अपशब्द कहे। मीणा ने तुरंत इसकी लिखित सूचना विश्वविद्यालय प्रशासन को दी। इसके तीन दिन बाद यानी 16 जनवरी, 2026 को यह विवाद बेहद हिंसक रूप में बदल गया। दोपहर के समय आरोपी प्रोफेसर दोबारा मीणा के कमरे में घुसा और चिल्लाते हुए कहा, “तुम्हारी औकात कैसे हुई कि तुमने मेरे खिलाफ शिकायत की?” इसके तुरंत बाद दुर्व्यवहार ने जातिगत और मजहबी रूप ले लिया। शिकायत में दर्ज बयानों के अनुसार, पीड़ित को धमकाते हुए आरोपी मुस्लिम प्रोफेसर ने कहा, “तुम सा.. आदिवासी जंगली हो, मुसलमानों के इदारे (संस्थान) में रहकर मेरे खिलाफ शिकायत करने की जुर्रत कैसे की?”

जब मीणा ने इस अपमानजनक भाषा का विरोध किया तो प्रोफेसर ने उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। आरोप है कि प्रोफेसर ने उनके चेहरे पर कई घूंसे मारे, जिससे उनके होंठ कट गए और आंख के नीचे गंभीर सूजन आ गई। घटना के बाद रामफूल मीणा ने जामिया के ‘अंसारी स्वास्थ्य केंद्र’ में अपना प्राथमिक इलाज कराया और उन्होंने मेडिकल दस्तावेजों को अपनी एफआईआर और शिकायत के साथ संलग्न किया है।

कन्वर्जन का दबाव

रामफूल मीणा ने न केवल जातिगत प्रताड़ना, बल्कि विश्वविद्यालय के भीतर मजहबी उत्पीड़न का भी आरोप लगाया है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को दिए गए दस्तावेजों में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्हें परिसर के भीतर बार-बार ‘काफिर’ कहकर प्रताड़ित किया जाता था। मीणा का आरोप है कि उन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस्लाम अपनाने के लिए लगातार दबाव डाला जा रहा था। उन्होंने कहा कि उनके साथ हो रहा यह हिंसक और प्रशासनिक दुर्व्यवहार असल में इस बात का परिणाम है कि उन्होंने मुसलमान बनने से साफ इनकार कर दिया था और वे अपनी हिंदू पहचान के साथ वहां काम कर रहे थे।

पहले भी सामने आ चुके हैं मामले

जुलाई, 2024 में एक वंचित समाज के कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि एक वरिष्ठ अधिकारी ने उससे कहा था कि यदि वह मुसलमान हो जाता है तो उसके और उसके बच्चों के करियर को पूरी तरह सुरक्षित कर दिया जाएगा।

इस घटना के कुछ महीनों बाद एक दिव्यांग महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया कि उसे हिजाब पहनने की सलाह दी गई और कहा गया कि ऐसा करने से उसके चेहरे पर ‘नूर’ आएगा।

इन पुराने मामलों को लेकर विश्वविद्यालय में एक जांच भी कराई गई थी। इसमें कई शिक्षकों और पूर्व छात्रों ने गैर-मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभाव की पुष्टि की थी। हालांकि, जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन अपने यहां पर कन्वर्जन और जातिगत भेदभाव के खिलाफ ‘जीरो टोलरेंस’ की नीति अपनाने का राग अलापता रहता है, लेकिन आलोचकों का कहना कुछ और ही है। उनकी बात में दम भी लग रहा है। जामिया में हिंदू कर्मचारियों के साथ भेदभाव होना आम बात है। पद, पदोन्नति और पैसे का लालच देकर उन्हें मुसलमान बनने के लिए प्रेरित किया जाता है। यही कारण है कि जामिया विश्वविद्यालय में कार्यरत अनेक हिंदू शिक्षक और छात्र मुसलमान बन चुके हैं।

विश्विद्यालय की भूमिका पर उठे सवाल

रामफूल मीणा ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. मोहम्मद आलम रिजवी और उनके कार्यालय की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत के अनुसार, जब मीणा ने 13 जनवरी को पहली लिखित शिकायत रजिस्ट्रार कार्यालय में दी तो उस पर कोई सुरक्षात्मक कार्रवाई नहीं की गई। इसके विपरीत, उनकी शिकायत की गोपनीय जानकारी आरोपी प्रो. डॉ. रियाजुद्दीन तक पहुंचा दी गई, जिसके कारण ही 16 जनवरी को प्रोफेसर ने दफ्तर में घुसकर उन पर हमला किया।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू मीणा के स्थानांतरण का समय है। 16 जनवरी की शाम को जब मीणा ने मारपीट की शिकायत लेकर वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की तो उन्हें आश्वासन दिया गया कि मामले को सुलझाया लिया जाएगा, लेकिन उसी शाम कार्यालय बंद होने के समय एक आधिकारिक आदेश जारी किया गया। इसमें लिखा था कि शिकायतकर्ता रामफूल मीणा का स्थानांतरण तुरंत प्रभाव से ‘यूनिवर्सिटी पॉलिटेक्निक’ से हटाकर ‘बालक माता सेंटर’ कर दिया गया है।

इस मामले ने एक बार फिर से जामिया प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उम्मीद है कि जामिया में हो रही इन हरकतों पर कोई नियामक संस्था रोक लगाएगी।

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