हरियाणा में हांसी जिले की नारनौंद तहसील में स्थित राखीगढ़ी सिंधु/सरस्वती सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) के सबसे बड़े पुरास्थलों में से एक है। राखी खास और राखी शाहपुर गांव सामूहिक रूप से प्राचीन स्थल राखीगढ़ी के नाम से जाने जाते हैं। यह हांसी शहर से लगभग 32 किलोमीटर उत्तर-पूर्व दिशा में, चंडीगढ़ से 206 किलोमीटर तथा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में अवस्थित है। यहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पुरातत्वविद् समय-समय पर खुदाई करते रहते हैं। खुदाई का मुख्य उद्देश्य है यह पता करना कि सिंधु/सरस्वती सभ्यता कितनी प्राचीन है, हमारे पूर्वज किन-किन क्षेत्रों में पारंगत थे, उनका जीवन कैसा था, वे किस तरह के मकानों में रहते थे, वे खेती कैसे करते थे, वे किस तरह के बर्तन प्रयोग करते थे, उनकी कला-संस्कृति कैसी थी…।
उत्खनन सत्र 2025–26 में 22 जनवरी से 12 जून, 2026 तक राखीगढ़ी में खुदाई हुई। यह कार्य एएसआई की उत्खनन शाखा–II, ग्रेटर नोएडा के अधीक्षण पुरातत्वविद् मनोज कुमार सक्सेना के निर्देशन में संपन्न हुआ। वर्षा काल को देखते हुए इन दिनों खुदाई रोक दी गई है। अब अगली खुदाई सितंबर-अक्तूबर से होगी। मनोज कुमार सक्सेना ने बताया, “उत्खनन सत्र 2025-26 में टीला संख्या 1, 2, 3, 5 एवं 7 पर खुदाई हुई।
इस उत्खनन के कई उद्देश्य थे-पहला, विभिन्न टीलों के आपसी संबंध तथा उनके वास्तविक विस्तार का निर्धारण करना। दूसरा, पुरास्थल के वास्तविक विस्तार एवं विभिन्न आवासीय क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना। तीसरा, राखीगढ़ी शहर की बनावट और घरों के नक्शों को वैज्ञानिक तरीके से फिर से समझने (पुनर्निर्माण) के लिए जरूरी पुरातात्विक प्रमाण जुटाना।”
उन्होंने यह भी बताया, “अब तक कुल 20 गड्ढों का विन्यास (Layout) किया जा चुका है, जिनमें से लगभग 60 ‘चतुर्थांश’ (वृत्त या समतल का चौथा हिस्सा) का उत्खनन किया गया है। इन अधिकांश गड्ढों से परिपक्व हड़प्पा काल से संबंधित पुरावस्तुएं, मृदभांड तथा अन्य सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं। साथ ही, वैज्ञानिक विश्लेषण हेतु मृदा और कोयला के नमूने तथा अन्य विभिन्न नमूने भी संकलित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ गड्ढों से प्रारंभिक हड़प्पा काल के मृदभांड खंड भी प्राप्त हुए हैं, जो फैब्रिक (मृदभांडों की शैलियों को वर्गीकृत करने की एक शब्दावली) ‘ए’ से फैब्रिक ‘एफ’ तक की विभिन्न श्रेणियों से संबंधित हैं।”

बड़ी उपलब्धि
यह निश्चित रूप से एएसआई के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इसलिए एएसआई के अधिकारी इस पर खुलकर बोलते भी हैं। उप अधीक्षण पुरातत्वविद् भूपेन्द्र सिंह फोनिया कहते हैं, “इस सत्र की खुदाई में कई उपलब्धियां प्राप्त हुईं। ह्यूमस (गहरे रंग का अत्यधिक उपजाऊ जैविक पदार्थ, जो मिट्टी में पौधों और जानवरों के अवशेषों के सड़ने-गलने से बनता है) परत हटाने के उपरांत उत्खनन में उत्तर-पश्चिम-दक्षिण-पूर्व तथा पूर्व-पश्चिम दिशा में निर्मित कच्ची ईंटों की दीवारें, कुटी हुई फर्श, गहरा स्थान, अग्निकुण्ड, पकी ईंटों से निर्मित नाली तथा अन्य संरचनात्मक अवशेष प्राप्त हुए, जो स्थल के क्रमिक अधिवास एवं सुविकसित नगर नियोजन के सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।”
उन्होंने यह भी बताया, “अधिकांश संरचनाओं में प्रयुक्त ईंटें हड़प्पाई मानक 4:2:1 अनुपात का अनुसरण करती हैं। उत्खनन में लगभग चार मीटर की गहराई तक छह सांस्कृतिक परतें देखी गईं, जो स्थल के दीर्घकालिक सांस्कृतिक विकास का संकेत देती हैं।”
खुदाई कार्य में लगे सहायक पुरातत्वविद् सोनू नागर ने बताया, “प्राप्त मृदभांडों में लाल मृदभांड, ब्लैक-ऑन-रेड वेयर (प्राचीन काल में मिट्टी के बर्तन बनाने की एक प्रमुख शैली), धूसर मृदभांड तथा चॉकलेट स्लिप वेयर (एक प्रकार के मिट्टी के बर्तन) के अनेक खंड प्राप्त हुए। इनके प्रमुख आकारों में कलश, तसला, छिद्रित पात्र, एस-आकार का घड़ा, आधारयुक्त थाली, उथली थाली, उथले कटोरे, टम्बलर (बिना हैंडल वाला बेलनाकार बर्तन) तथा संपूर्ण लघु पात्र सम्मिलित हैं। कुछ मृदभांडों पर काले वर्णक से चित्रांकन भी अंकित है।”
उन्होंने यह भी बताया, “उत्खनन से ताम्र छेनी, ताम्र कंगन, ताम्र ताबीज, ताम्र मत्स्य-बंसी कांटा, ताम्र की छड़ी, ताम्र जड़ाई (किसी अन्य धातु, लकड़ी, या पत्थर की सतह पर नक्काशी करके उसमें तांबे के तारों या टुकड़ों को खूबसूरती से जड़ने या फिट करने की एक प्राचीन हस्तकला), चर्ट (कठोर व महीन दानेदार पत्थर) का घनाकार बाट, चर्ट के ब्लेड एवं कोर, बेसाल्ट (ज्वालामुखी मूल का एक पत्थर) का मूसल, पीसने का पत्थर, स्वर्ण पत्र, स्वर्ण बुल्ला (एक प्रकार का जंतर), सर्पेंटाइन/हॉर्नब्लेन्ड (एक प्रकार के पत्थर) से निर्मित खेल-मोहरा, शंख की जड़ाई, टेराकोटा के त्रिकोणीय एवं वृत्ताकार केक, मुष्टिकाएं, गोफन के गोले (फेंकने वाला प्राचीन अस्त्र), जाल-भार, खिलौना गाड़ी के पहिए एवं अन्य खंड, उत्कीर्ण टेराकोटा कंगन, पशु आकृतियों की मृण्मूर्तियां (मिट्टी की बनी मूर्तियां) तथा अस्थि से निर्मित नुकीले उपकरण प्राप्त हुए हैं।”

मिला मानव कंकाल
अधीक्षण पुरातत्वविद् मनोज कुमार सक्सेना फिर एक बार कहते हैं, “खुदाई में सेलखड़ी (एक बहुत ही मुलायम प्राकृतिक पत्थर), कार्नेलियन (नारंगी से लेकर गहरे भूरे-लाल रंग का एक अर्ध-कीमती रत्न), जैस्पर (धब्बेदार पत्थर), एगेट (आकर्षक पत्थर), लैपिस लाजुली (खनिजों का एक मिश्रण), अमेजोनाइट (एक विशेष पत्थर) तथा फैयेंस (चमकीली मिट्टी) के मनके प्राप्त हुए, जो विकसित मनका-निर्माण एवं शिल्प परंपरा के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त भूमि में गड़ा हुआ एक भंडारण पात्र, जिसके मुख पर उल्टा रखा हुआ हांडी/कलश प्राप्त हुआ।”
टीला संख्या 7 में कुल 8 दफनों (जहां मृत शरीर को गाड़ा जाता है) का उत्खनन किया गया। इनमें से सात दफनों में मानव कंकाल प्राप्त हुए, जबकि एक दफन में केवल समाधि-उपहार तथा निचला जबड़ा प्राप्त हुआ। अधिकांश दफन उत्तर–दक्षिण अक्ष से लगभग 3° से 13° तक के झुकाव के साथ स्थापित पाए गए। प्रत्येक दफन में 3 से 42 तक मृदभांड अपने मूल स्थान में सुरक्षित अवस्था में प्राप्त हुए, जो मृतकों के साथ रखी गई समाधि-भेंट की समृद्ध परंपरा का संकेत देते हैं। टीला संख्या–1 से उत्खनन के दौरान प्रारंभिक हड़प्पा काल के फैब्रिक ए, बी, सी एवं डी से संबंधित मृदभांड भी प्राप्त हुए। साथ ही, फैब्रिक ई एवं एफ के मृदभांडों की भी पहचान एवं अभिलेखन किया गया। प्रारंभिक हड़प्पा के इन विभिन्न फैब्रिक समूहों की उपस्थिति इस स्थल पर प्रारंभिक हड़प्पा से परिपक्व हड़प्पा काल तक निरंतर सांस्कृतिक अनुक्रम तथा अधिवास की निरंतरता का महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत करती है।

श्री सक्सेना के अनुसार, “उत्खनन के दौरान एक मानव कंकाल भी मिला, जिसमें मेरुदण्ड एवं श्रोणि क्षेत्र (मानव शरीर का वह भाग, जो पेट के निचले हिस्से और जांघों के बीच स्थित होता है) सुरक्षित अवस्था में प्राप्त हुए। इसके साथ ही वेट फ्लोटेशन (अयस्कों से अशुद्धियों को दूर करने का एक तरीका) विधि से धान तथा संभावित चेनोपोडियम (वार्षिक फूल वाले पौधों की कई प्रजातियों की एक प्रजाति) के वानस्पतिक अवशेष प्राप्त हुए, जो तत्कालीन कृषि एवं आहार संबंधी परंपराओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करते हैं।” श्री सक्सेना कहते हैं, “प्राप्त संरचनात्मक अवशेषों, विविध पुरावस्तुओं, जैव-पुरातात्विक साक्ष्यों तथा स्तरीकरण से स्पष्ट होता है कि यह स्थल परिपक्व हड़प्पा कालीन सुव्यवस्थित नगरीय जीवन, विकसित शिल्प परंपरा तथा दीर्घकालिक एवं सतत् अधिवास का प्रतिनिधित्व करता है।”
प्रारंभिक निष्कर्ष
पुरातत्वविदों का मानना है कि वर्तमान उत्खनन से प्राप्त स्तरीकरण (चट्टानों या मिट्टी का प्राकृतिक अध्ययन), मृदभांड परंपरा तथा सांस्कृतिक अवशेषों के आधार पर प्रारंभिक रूप से यह प्रतीत होता है कि स्थल पर तीन प्रमुख सांस्कृतिक निक्षेप (किसी समाज, सभ्यता या मानव समूह की वह धरोहर, जिसे कला, साहित्य, भाषा, रीति-रिवाजों और भौतिक अवशेषों के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता है) विद्यमान हैं- परिपक्व हड़प्पा, प्रारंभिक हड़प्पा तथा पूर्व-प्रारंभिक सांस्कृतिक स्तर। यह सांस्कृतिक अनुक्रम डॉ. अमरेन्द्र नाथ के निर्देशन में 1997–2000 के दौरान किए गए उत्खनन की प्रकाशित रिपोर्ट में उल्लेखित निष्कर्षों से भी मेल खाता है।
वर्तमान उत्खनन से प्राप्त साक्ष्य पूर्ववर्ती उत्खनन द्वारा प्रस्तावित सांस्कृतिक क्रम की पुष्टि करते हैं। वर्तमान उत्खनन सत्र में प्राप्त अधिकांश दफनों से परिपक्व हड़प्पा काल के विशिष्ट समाधि-भेंट प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त, उत्खनन के दौरान द्विवर्णी मृदभांड के कुछ खंड भी प्राप्त हुए हैं, जो स्थल की सांस्कृतिक परंपराओं एवं कालक्रम के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
यद्यपि अंतिम निष्कर्ष वैज्ञानिक परीक्षणों, काल-निर्धारण तथा विस्तृत स्तरीकरण विश्लेषण के उपरांत ही स्थापित किए जा सकेंगे, तथापि वर्तमान उत्खनन से प्राप्त साक्ष्य इस स्थल पर पूर्व-प्रारंभिक चरण से प्रारंभिक हड़प्पा और परिपक्व हड़प्पा काल तक निरंतर सांस्कृतिक विकास एवं निवास की स्पष्ट पुष्टि करते हैं।
वर्तमान उत्खनन की प्रमुख उपलब्धियों में कच्ची ईंटों से निर्मित दीवारें तथा उनसे संबंध कुटी हुई फर्श विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन फर्शों के साथ बड़ी संख्या में वृत्ताकार एवं त्रिकोणीय टेराकोटा केक प्राप्त हुए हैं। ये टेराकोटा केक तीन से चार विभिन्न आकारों में निर्मित हैं तथा इनके परिमाप और विशेषकर वृत्ताकार केकों की परिधि में उल्लेखनीय समानता एवं मापीय सटीकता परिलक्षित होती है। इनकी निर्माण-प्रणाली और मानकीकृत मापों के आधार पर यह अनुमान किया जा सकता है कि इनका उपयोग केवल एक उद्देश्य तक सीमित नहीं था। संभवतः इनका प्रयोग तापमान नियंत्रण, फर्श पर बिछाने वाली टाइलों अथवा अन्य व्यावहारिक कार्यों में किया जाता रहा हो। साथ ही, इनके अनुष्ठानिक उपयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
परिपक्व नगरीय सभ्यता
श्री सक्सेना कहते हैं, “यदि वर्तमान उत्खनन की तुलना पूर्ववर्ती उत्खननों से की जाए, तो इस सत्र में अर्ध बहुमूल्य तथा बहुमूल्य पत्थरों के मनकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि परिलक्षित होती है। इसके अतिरिक्त, तांबे से निर्मित विभिन्न पुरावस्तुएं, जैसे चूड़ियां, अंजन-शलाका (विभिन्न धातुओं, मुख्य रूप से तांबे से बना एक काजल), नख-परिष्कारक तथा अन्य ताम्र उपकरण भी पर्याप्त संख्या में प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार अस्थि से निर्मित नुकीले उपकरण एवं स्टाइलस (लेखन उपकरण) की बड़ी संख्या में प्राप्ति इस स्थल पर विकसित हस्तशिल्प, विशिष्ट तकनीकी दक्षता तथा एक उन्नत एवं परिपक्व नगरीय सभ्यता की उपस्थिति का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करती है।”
इससे पहले अप्रैल, 2015 में टीला-7 की खुदाई के दौरान चार कंकाल भी मिले थे। इनमें से तीन की पहचान पुरुष और एक की स्त्री के रूप में की गई है। इनके पास से भी कुछ बर्तन और कुछ खाद्य पदार्थ मिले थे। इतिहासकार युद्धवीर सिंह रावत कहते हैं, “राखीगढ़ी में ‘हाकड़ा वेयर’ नाम से चिह्नित ऐसे अवशेष भी मिले हैं, जिनका निर्माण काल सिंधु घाटी सभ्यता और विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी घाटी के कालखंड से मेल खाता है। इस क्षेत्र में आठ ऐसी समाधियां और कब्रें भी मिली हैं, जिनका निर्माण काल ईसा से लगभग 8,000 वर्ष पूर्व बताया जा रहा है।”
मध्य-एशियाई मूल का निशान नहीं
एक बात यह भी स्पष्ट हो चुकी है कि राखीगढ़ी में मिले नरकंकाल अवशेषों के डीएनए अध्ययन में मध्य-एशियाई मूल का कोई निशान नहीं मिला है। इसका अर्थ है कि आर्य आक्रमण सिद्धांत भारतीयों को बांटने के लिए जानबूझकर गढ़ा गया था। डीएनए का अध्ययन करने वाले प्रमुख शोधकर्ताओं में से एक डॉ. वसंत शिंदे का कहना है, “राखीगढ़ी के मानव डीएनए में स्पष्ट रूप से एक प्रमुख स्थानीय तत्व दिखाई देता है। इसमें माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए बहुत मजबूत है। इसमें कुछ मामूली विदेशी तत्व भी हैं, जो किसी विदेशी आबादी के साथ मिश्रण को दर्शाते हैं, लेकिन डीएनए स्पष्ट रूप से स्थानीय है।” इन प्रमाणों से वामपंथियों का वह विमर्श धराशायी हो रहा है कि ‘आर्य बाहर से आए थे।’ सच तो यह है कि भारत में आर्य-अनार्य की कोई बात ही नहीं है। सभी भारत के मूल निवासी हैं, थे और रहेंगे। 

















