आपातकाल। एक हस्ताक्षर हुआ और करोड़ों भारतीयों के मौलिक अधिकार कागज के टुकड़े बनकर रह गए। न्यायपालिका को नियंत्रित करने की कोशिश, संविधान में मनमाने संशोधन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स विवाद और केशवानंद भारती मामला, इन सबका आपातकाल से क्या कोई संबंध था? क्या आपातकाल सिर्फ 25 जून, 1975 की एक घटना थी? या पटकथा वर्षों पहले लिखी गई?
कसक की कहानी
1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी 352 सीटें जीतकर सत्ता में लौटीं, लेकिन तानाशाही में अवरोधक बने सर्वोच्च न्यायालय को ठिकाने लगाने का संकल्प उनके मन में था। दरअसल, 1967 में गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद कोई भी मौलिक अधिकार छीन या उसमें कटौती नहीं कर सकती। नीति निर्देशक सिद्धांतों के कार्यान्वयन के लिए भी मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं किया जा सकता।
दोबारा सत्ता में आने पर इंदिरा गांधी ने 24वें संविधान संशोधन के जरिए व्यवस्था की कि संसद के पास संविधान संशोधन अधिनियमों को लागू कर किसी भी मौलिक अधिकार को कम करने या छीनने की शक्ति है।
25वें संशोधन में उन्होंने नया अनुच्छेद 31सी जोड़ा, जिससे लोगों के लिए संपत्ति की खरीद को नियंत्रित करने वाले कानूनों को चुनौती देना लगभग असंभव हो गया। मुआवजा शब्द की पर्याप्त मुआवजा के रूप में न्यायिक व्याख्या को देखते हुए उसे रकम कर दिया गया।
देशी राजाओं को मिलने वाले भत्ते खत्म किए
1971 में इंदिरा गांधी ने देशी राजाओं को मिलने वाले भत्ते ‘प्रिवी पर्स’ को खत्म कर दिया। यह पूर्ववर्ती रियासतों के शासक परिवारों को दिया जाने वाला भुगतान था, जो विलय समझौतों के तहत मिलता था।
14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण
इंदिरा सरकार ने 19 जुलाई, 1969 को बैंकिंग कंपनीज आर्डिनेंस नाम से अध्यादेश जारी कर देश के 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। 19 जुलाई की रात 8:30 बजे इंदिरा गांधी ने इसकी घोषणा की।
सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त तीनों मामलों में सरकार के कदम को असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया। इंदिरा गांधी ने बहुमत का दुरुपयोग कर इन तीनों फैसलों को पलट दिया।
केशवानंद भारती का मामला बना आधार
केशवानंद भारती मामले में 24 अप्रैल, 1973 को सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भारत के लोकतंत्र का आधार स्तंभ बना। इसने इंदिरा गांधी द्वारा न्यायपालिका को नियंत्रित करने की मंशा को भी उजागर किया। मामला अडनीर न्यास की जमीन से जुड़ा था। बाबा केशवानंद भारती केरल के कासरगोड़ स्थित अडनीर मठ के प्रमुख थे। केरल सरकार ने मठ की 400 एकड़ में से 300 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर पट्टेदारों को खेती के लिए दे दी, जिसे केशवानंद ने चुनौती दी थी।
देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7-6 के बहुमत से निर्णय दिया। इसमें संविधान के आधारभूत सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया, जिसके अनुसार संविधान की कुछ मौलिक विशेषताओं जैसे लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, संघवाद और कानून का शासन को संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता। न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न अंग है और इसे संसद द्वारा संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से नहीं छीना जा सकता। संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, न्यायालय की स्वतंत्रता, संसदीय व्यवस्था, निष्पक्ष चुनाव, गणतांत्रिक ढांचा और संप्रभुता को आधारभूत ढांचे का हिस्सा माना गया।
फैसले से नाराज इंदिरा सरकार ने क्या किया?
अगले दिन 25 अप्रैल को प्रधानमंत्री कार्यालय से न्यायमूर्ति ए.एन. रे के पास फोन आया। पूछा गया कि क्या उन्हें भारत के नए मुख्य न्यायाधीश का पद स्वीकार है! 26 अप्रैल को उन्हें सीजेआई बना दिया गया। सरकार ने न्यायमूर्ति शेलाट, न्यायमूर्ति ग्रोवर और न्यायमूर्ति हेगड़े की वरिष्ठता को दरकिनार कर यह फैसला किया। ये तीनों उन 7 न्यायाधीशों में शामिल थे, जिन्होंने कहा था कि सरकार संविधान से ऊपर नहीं है।
इंदिरा गांधी ने 1975 में संविधान में 39वां संशोधन किया। इसके बाद 41वां संशोधन किया। इससे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी, न ही मुकदमा दर्ज किया जा सकता था। केशवानंद मुकदमे के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने इन संशोधनों को खारिज कर दिया। इसी तरह, 1975 में आपातकाल में मौलिक अधिकारों की बहाली से जुड़ा एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा तो पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4-1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में निर्णय दिया। न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने सरकार के खिलाफ निर्णय दिया। इससे वे भी निशाने पर आ गए। वे वरिष्ठतम थे, लेकिन सरकार ने उन्हें दरकिनार कर न्यायमूर्ति एम.एच. बेग को सीजेआई बना दिया। वह केशवानंद मामले में भी सरकार के साथ खड़े थे।
इंदिरा गांधी को संविधान के तिरस्कार की शिक्षा अपने पिता नेहरू से मिली थी, जिन्होंने कहा था कि यदि संविधान कांग्रेस की नीतियों के विपरीत जाता है, तो उसे बदलकर और अनुकूल बनाया जाना चाहिए। यहां बाबासाहेब आंबेडकर की बात याद आती है। संविधान सभा में बहस के दौरान संविधान के प्रारूप पर आलोचनाओं का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था कि यदि नवीन संविधान के अंतर्गत कोई गड़बड़ी पैदा होती है, तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि यह कहना चाहिए कि सत्तारूढ़ व्यक्ति ही अधम था, नीच था। उनकी आशंका 1975 में सच साबित हुई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया
आपातकाल के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। स्वयंसेवकों ने विवेक और आत्मसंयम के साथ स्थिति का सामना किया। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने पुणे की यरवदा जेल से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखा।
पत्र में इंदिरा गांधी को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनके निर्वाचन को वैध ठहराने पर बधाई दी गई। यह वास्तव में इंदिरा के लिए टीस का कारण था, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश में कहा था कि वे लोकसभा सांसद के रूप में बनी रह सकती हैं और सदन में उपस्थित हो सकती हैं, लेकिन कार्यवाही में भाग नहीं ले सकतीं, सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकतीं और पारिश्रमिक नहीं ले सकतीं। वह चाहती थीं कि उनके निर्वाचन को रद्द करने वाला इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश पूरी तरह निरस्त हो, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इंदिरा को बताया फासीवाद का स्वरूप
बालासाहब देवरस ने पत्र के माध्यम से इंदिरा को बताया कि फासीवाद का स्वरूप क्या होता है। उन्होंने लिखा कि वह सत्ता, जो समाजवाद का मुखौटा पहनकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलती है, विपक्ष को मिटाने का प्रयास करती है, प्रेस पर सेंसरशिप थोपती है और असहमति को अपराध बना देती है, वही फासीवाद का रूप लेती है। इस कसौटी पर बालासाहब ने स्पष्ट कर दिया कि फासीवाद का वास्तविक रूप सत्ता की उसी राजनीति में था, जो उस समय कांग्रेस की नीति बन चुकी थी। उन्होंने पत्र में गांधीजी की हत्या के संदर्भ में सरदार पटेल के उस पत्र का उल्लेख किया, जिसे अक्सर उद्धृत किया जाता है। उन्होंने पटेल के संवाद का वह हिस्सा भी सामने रखा, जिसे सत्ता ने जान-बूझकर छिपा लिया था। वह पत्र, जिसमें सरदार पटेल ने पंडित नेहरू को लिखा था कि गांधीजी की हत्या के षड्यंत्र में संघ का कोई हाथ नहीं है।
संघ को मुसलमानों और ईसाइयों के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश का भी देवरस जी ने उत्तर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की आलोचना, यदि कहीं हुई भी है, तो वह किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि कुछ मानसिकताओं और राजनीतिक प्रवृत्तियों के संदर्भ में हुई है। यदि इसी तर्क पर संघ को सांप्रदायिक कहा जाए, तो नेहरू और गांधी के कथनों की व्याख्या भी उसी दृष्टि से करनी पड़ेगी।
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