PoJK में दमन और जनांदोलन: दिखावे का 'खेल' हुआ बेनकाब, महा-विद्रोह! जानें क्या है पूरा विवाद?
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PoJK में दमन और जनांदोलन: दिखावे का ‘खेल’ हुआ बेनकाब, महा-विद्रोह! जानें क्या है पूरा विवाद?

पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (PoJK ) में कथित कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों के खिलाफ व्यापक जनांदोलन छिड़ गया है। जानिए कैसे इस्लामाबाद चुनाव परिणामों में हेरफेर कर रहा है और क्यों JAAC पर प्रतिबंध लगाया गया।

Written byडीपी श्रीवास्‍तवडीपी श्रीवास्‍तव — edited by Shivam Dixit
Jun 26, 2026, 10:00 pm IST
inविश्लेषण
PoK Protest Against Reserved Seats Joint Awami Action Committee Banned Pakistan Army Violence

जून की शुरुआत से ही पाकिस्‍तान अधिक्रांत कश्‍मीर (पीओजेके) में व्‍यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। राज्‍य की विधानसभा में कथित कश्‍मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों के विरोध में यह प्रदर्शन है। शांत‍िपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें 15 लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हो गए।

विरोध-प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रही ज्‍वाइंट अवामी एक्‍शन कमेटी (जेएएसी) को पाकिस्‍तान सरकार ने 5 जून को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित कर दिया। सरकार का कहना था कि यह संगठन ‘आतंकवाद में संलग्‍न’ है। शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग से स्पष्ट हो जाता है की इस्लामाबाद, जिस क्षेत्र को ‘आजाद’ कहता है, वास्तव में उसके साथ कैसा बर्ताव करता है।

राज्य विधानसभा की लगभग एक-चौथाई सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर के बाहर रह रहे हैं। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में चुनावों से पूर्व परिसीमन के समय पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि यह प्रक्रिया राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना को बदलने के उद्देश्य से की जा रही है। वहीं पीओजेके में स्थिति यह है कि न केवल उस क्षेत्र के बाहर रहने वाले लोगों को चुनाव में मतदान का अधिकार प्राप्त है, बल्कि उनके लिए बड़ी संख्या में विधानसभा सीटें भी आरक्षित रखी गई हैं।

पीओजेके में होने वाले चुनावों का परिणाम लगभग हमेशा इस्लामाबाद में सत्तारूढ़ दल के पक्ष में ही होता है। यह महज संयोग नहीं है। राज्‍य की विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, जिनमें से 12 सीटें तथाकथित ‘कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि 8 सीटें महिलाओं और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए निर्धारित हैं। इस प्रकार कुल 53 सीटों में से केवल 33 सीटों पर ही प्रत्यक्ष चुनाव कराए जाते हैं। जिन तथाकथित कश्मीरी शरणार्थियों के लिए 12 सीटें आरक्षित हैं, वे वास्तव में पीओजेके के निवासी नहीं हैं। वे पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में फैले हुए हैं। इससे इस्लामाबाद के लिए चुनावी परिणामों को प्रभावित करना और उनमें हेरफेर करना आसान हो जाता है। इसके प्रकार से पाकिस्तान की संघीय सरकार को राज्य विधानसभा के भीतर एक बड़ा वोटिंग ब्लॉक (मत-समूह ) प्राप्त हो जाता है, जिसका उपयोग वह अपने हित में करती है। अधिकांशतः वही दल सत्ता में आता है जो इस्लामाबाद में सत्तारूढ़ होता है या जिसे सेना मुख्यालय का समर्थन प्राप्त होता है।

आरक्षित सीटों की इस व्यवस्था ने कई रोचक और विचित्र परिस्थितियां उत्पन्न की हैं। एक अवसर ऐसा भी आया, जब कराची से दो प्रतिनिधि पीओजेके की विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। यह स्मरणीय है कि कराची में रहने वाले अनेक मुहाजिर मूलतः उत्तर प्रदेश और बिहार से गए थे। स्पष्टतः यह व्यवस्था स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के मूल सिद्धांत के भी प्रतिकूल है।

पीओजेके के निवासी इन आरक्षित सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकते। यह वोटिंग ब्लॉक इतना बड़ा है कि वह जनादेश के विपरीत सरकार बनाने में सफल हो सकता है। इसके अलावा, ‘स्टेट सब्जेक्ट’ (राज्य नागरिक) संबंधी नियमों में संशोधन कर पाकिस्तान में निवास करने वाले लोगों को भी इस क्षेत्र के चुनावों में भाग लेने की अनुमति दे दी गई है।

इस्लामाबाद यह दावा करता है कि जनमत-संग्रह के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण उसने पीओजेके को एक पृथक और ‘आजाद’ क्षेत्र के रूप में बनाए रखा है। किंतु जनमत-संग्रह का औचित्य ही संदिग्ध हो जाता है, क्योंकि पाकिस्तान पहले ही पीओजेके की जनसांख्यिकीय संरचना में व्यापक परिवर्तन कर चुका है।

पाकिस्‍तान के विभिन्‍न हिस्‍सों में कुल 4,64,000 शरणार्थी रहते हैं, जिनके लिए पीओजेके की विधानसभा में 12 सीटें आरक्षित की गई हैं। इनमें कथित तौर पर ‘कश्मीर घाटी’ से आए लगभग 30,000 शरणार्थी शामिल हैं, जिनके लिए 6 सीटें निर्धारित की गई हैं। वहीं शेष 4,34,000 शरणार्थी जम्मू संभाग से संबंधित हैं, किंतु उन्हें भी समान रूप से 6 सीटें ही आवंटित की गई हैं। दूसरी ओर, पूरे पीओजेके की कुल जनसंख्या लगभग 32 लाख है। पाकिस्तान में रहने वाले लगभग 30,000 ‘कश्मीरी’ पीओजेके की कुल जनसंख्या के 1 प्रतिशत से भी कम हैं। यद्यपि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को जोर-शोर से उठाता है, किंतु वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान में कश्मीर घाटी से जुड़े लोगों की संख्या अत्यंत कम है। इस तथ्य को छिपाने के लिए ही तथाकथिक कश्मीरी शरणार्थियों को बड़ा-चढ़ा कर प्रतिनिधित्‍व दिया गया है। प्रतिनिधित्व में यह असंतुलन जम्मू क्षेत्र से संबंधित लोगों के बीच भी असंतोष की भावना उत्पन्न करता रहा है।

आरक्षित सीटों की इस व्यवस्था का उपयोग पाकिस्तान की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों—पाकिस्‍तान मुस्लिम लीग (नवाज), पाकिस्‍तान पीपुल्‍स पार्टी और पाकिस्‍तान तहरीक-ए-इंसाफ द्वारा पीओजेके में अपनी-अपनी स्थानीय इकाइयों को सत्ता में स्थापित करने के लिए किया जाता रहा है। जब नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे, तब पीओजेके में पीएमएल-एन की स्थानीय इकाई की सरकार सत्ता में थी। इसके बाद जब इमरान खान प्रधानमंत्री बने, तो 2021 के विधानसभा चुनावों में पीटीआई की सरकार सत्ता में आई, जिसका नेतृत्व अब्‍दुल कय्यूम खान नियाजी ने किया।

इमरान खान को इस्लामाबाद की सत्ता से हटाए जाने के बाद नियाजी को भी पीओजेके में पद छोड़ना पड़ा था। हालांकि उनकी पार्टी को विधानसभा में बहुमत प्राप्त था। उन्हें विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। दिलचस्प बात यह रही कि यह अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं सत्तारूढ़ दल के सदस्यों द्वारा लाया गया था। दूसरी ओर, विपक्षी दल (पीपीपी और पीएमएल-एन)) ने इस विधानसभा सत्र का बहिष्कार किया था। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि पीओजेके में पाकिस्तान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल एक औपचारिकता भर है।

नियाजी के बाद क्रमशः सरदार तनवीर इलियास और चौधरी अनवर-उल-हक बहुत कम अंतराल में पीओजेके के प्रधानमंत्री बने। बाद में अनवर-उल-हक के विरुद्ध लाए गए विश्वास मत (या समर्थन परीक्षण) के परिणामस्वरूप फैजल मुमताज राठौर सत्ता में आए, जो पिछले पांच वर्ष में पीओजेके के चौथे प्रधानमंत्री बने। राठौर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) से संबंधित हैं, जो इस्लामाबाद की सत्ता-व्यवस्था का एक प्रमुख घटक है। वर्तमान व्यवस्था में पीपीपी के आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति हैं, जबकि शाहबाज शरीफ प्रधानमंत्री हैं। लेकिन पाकिस्तान की सत्ता का वास्तविक केंद्र सेना ही है।

क्षेत्रीय दल किनारे

पीओजेके में क्षेत्रीय राजनीतिक दल लगभग पूरी तरह किनारे कर दिए गए हैं। इस क्षेत्र की सत्ता पाकिस्तान की राष्ट्रीय मुख्यधारा की पार्टियों (पीपीपी, पीएमएल-एन और पीटीआई) की स्थानीय इकाइयों के हाथों में रहती है। 2021 के विधानसभा चुनावों में इसका स्पष्ट उदाहरण देखने को मिला, जब राज्य विधानसभा की कुल 53 सीटों में से केवल एक सीट ही किसी क्षेत्रीय दल के प्रतिनिधि के खाते में गई। शेष सभी सीटों पर पाकिस्तान की राष्ट्रीय पार्टियों या उनसे संबद्ध उम्मीदवारों का वर्चस्व रहा।

यह एकमात्र सीट सरदार अतीक अहमद खान ने जीती थी, जो ऑल जम्‍मू एंड कश्‍मीर मुस्लिम कांफ्रेंस के प्रमुख नेताओं में से हैं। यह स्थिति भारतीय जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक व्यवस्था से बिलकुल भिन्न है, जहां पिछले कई दशकों से सत्ता क्षेत्रीय दलों (नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी) के हाथों में रही है। जहां भारत क्षेत्रीय आकांक्षाओं को स्वीकार करता है, वहीं पाकिस्तान उन्हें दबाता है।

यह विरोध आंदोलन पीओजेके के लोगों के बीच व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर चुका है, किंतु पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां—पीपीपी, पीएमएल (एन) और पीटीआई तथा उनकी स्थानीय इकाइयां इससे लगभग अलग-थलग रही हैं। उनको कश्मीरी जनता के हितों में कोई रुचि नहीं है , जिसकी रक्षा करने का वे दावा करते हैं।

पीओजेके का संविधान

वर्तमान संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस्लामाबाद द्वारा रचित व्यवस्था में पीओजेके के लोगों के लिए कोई उम्मीद नहीं रह गई है। पीओजेके सुप्रीम कोर्ट ने घोषित किया है कि आरक्षित सीटें पीओजेके संविधान का हिस्सा हैं और इन्हें ‘प्रशासकीय कदमों, राजनीतिक समझौतों या जनदबाव’ के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता। पीओजेके के संविधान के अनुच्छेद 33 के अनुसार किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए केवल कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई बहुमत का समर्थन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए पाकिस्तान सरकार की पूर्व स्वीकृति भी अनिवार्य है। यह प्रावधान इस प्रकार बनाया गया है कि इस्लामाबाद का इस क्षेत्र पर नियंत्रण और अधिकार स्थायी रूप से बना रहे, जबकि संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान से इस क्षेत्र को खाली करने को कहा था। यह अपेक्षा करना कठिन है कि पाकिस्तान वह असाधारण अधिकार किसी भी कीमत पर छोड़ने के लिए तैयार होगा । यह प्रश्‍न केवल शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे कहीं व्यापक है।

वर्ष 2018 में पीओजेके के संविधान में किए गए 13वें संशोधन के तहत पाकिस्तान ने इस क्षेत्र के 32 विषयों पर प्रत्यक्ष विधायी और कार्यकारी अधिकार अपने हाथ में ले लिए। इससे पीओके सरकार के अधिकार एक संघ-प्रशासित क्षेत्र या केंद्रशासित प्रदेश से भी कम रह गए है। इतना ही नहीं, पीओके के अधिकार-क्षेत्र में बचे हुए 22 विषयों पर भी कोई कानून बनाने या विधायी कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान सरकार की स्वीकृति आवश्यक है। इस प्रकार, क्षेत्र की विधायी स्वायत्तता अत्यंत सीमित हो गई है और महत्वपूर्ण निर्णयों पर अंतिम नियंत्रण इस्लामाबाद के पास ही बना रहता है।

जिस क्षेत्र को सामान्यतः पीओके अथवा ‘आजाद कश्मीर’ कहा जाता है, वह पाकिस्तान के अवैध नियंत्रण में स्थित जम्मू-कश्मीर के कुल क्षेत्रफल का केवल लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा है। शेष 85 प्रतिशत क्षेत्र पहले ‘नॉर्दर्न एरियाज’ के नाम से जाना जाता था, जिसे बाद में गिलगित-बाल्टिस्तान नाम दिया गया। गिलगित बाल्टिस्तान की स्थिति तो पीओके से भी बदतर है। 2018 के गिलगित बाल्टिस्तान आदेश के तहत पाकिस्तान ने उन सभी 61 विषयों की सूची को समाप्त कर दिया, जिन पर पहले स्थानीय विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त था। इसके परिणामस्वरूप, क्षेत्र की समस्त विधायी और कार्यकारी शक्तियां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के अधीन निहित कर दी गईं। अर्थात् गिलगित-बाल्टिस्तान की स्थानीय संस्थाओं की स्वायत्तता अत्यंत सीमित हो गई और शासन-संबंधी महत्वपूर्ण अधिकारों का केंद्रीकरण इस्लामाबाद में कर दिया गया।

दरअसल, पीओजेके के संविधान में किया गया 13वां संशोधन तथा गिलगित-बाल्टिस्तान आदेश, 2018—दोनों ही वर्ष 2018 में लागू किए गए थे। यानी भारत द्वारा जम्‍मू-कश्‍मीर में अनुच्छेद 370 निरस्त किए जाने से लगभग एक वर्ष पूर्व ही पाकिस्तान इन दोनों क्षेत्रों में शासन और कानून निर्माण संबंधी अधिकारों का प्रत्यक्ष नियंत्रण अपने अधीन ले चुका था। पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में कैसे शासन किया है, इसके इसे विस्‍तार से जानने के लिए इस लैखक द्वारा लिखी गई ‘फॉरगॉटन कश्मीर : दी अदर साइड ऑफ लाइन ऑफ कंट्रोल पढ़िए।

जहां भारत की नीतियों और कदमों की व्यापक आलोचना की गई, वहीं पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में किए गए इन व्यापक एवं दूरगामी संवैधानिक तथा प्रशासनिक परिवर्तनों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। बहरहाल, पीओजेके में अगला चुनाव जुलाई में होने की संभावना है। जैसे-जैसे चुनाव की तिथि निकट आएगी, वैसे-वैसे वहां के लोगों को पुलिस और पाकिस्तानी सेना की ओर से अधिक दबाव, निगरानी और दमनात्मक कार्रवाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

Topics: गिलगित बाल्टिस्तान आदेश 201813वां संवैधानिक संशोधन PoKराजनयिक डीपी श्रीवास्तवForgotten Kashmir BookPanchjanya newsPoK Protest Against Reserved SeatsPoK में दमन और जनांदोलनज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटीकश्मीरी शरणार्थी आरक्षित सीटें
डीपी श्रीवास्‍तव
डीपी श्रीवास्‍तव
पूर्व राजदूत एवं फॉरगॉटन कश्मीर : दी अदर साइड ऑफ द लाइन ऑफ कंट्रोल के लेखक [Read more]
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