रानी दुर्गावती: स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वालीं महान वीरांगना
October 2, 2026
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रानी दुर्गावती: स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वालीं महान वीरांगना

राजमाता वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस 24 जून पर समर्पित

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Jun 24, 2026, 08:33 am IST
inभारत
महान वीरांगना रानी दुर्गावती

महान वीरांगना रानी दुर्गावती

राजमाता वीरांगना रानी दुर्गावती का बलिदान विश्व में नारी सशक्तिकरण का वह पड़ाव है,जहां इतिहास और समय भी नतमस्तक होते हैं। जन्म प्रथम सत्य है, तो मृत्यु अंतिम सत्य है परन्तु इसके मध्य जीवन भी सर्वोच्च और शाश्वत सत्य है,जिसमें नर से नारायण तक की यात्रा संभव होती है। पुरुषार्थ ही इतिहास का निर्माण करता है। यह अटल सत्य है कि व्यक्ति का जन्म साधारण ही होता है, परंतु मृत्यु सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि मृत्यु के समय ही उसका आकलन होता है। कमजोर और भीरु व्यक्ति की मृत्यु पर इतिहास मौन हो जाता है, श्रद्धांजलि भी नहीं देता है परंतु जब स्व के लिए किसी धीर, वीर और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो इतिहास ऐसी हुतात्माओं को अमर कर देता है, और इन सब में सबसे महत्वपूर्ण मृत्यु है, मातृभूमि के प्रति बलिदान! वीरांगना रानी दुर्गावती का बलिदान इस कोटि की उच्चतम पराकाष्ठा है।

प्रश्न यदि विजय का प्रश्न उठता है,तो छलपूर्वक प्राप्त की गई विजय,पराजय से भी शर्मनाक होती है। कुरुक्षेत्र के मैदान में सात महारथियों ने मिलकर छल पूर्वक वीर अभिमन्यु का वध किया था, परंतु सच तो यह है कि वीर अभिमन्यु ही जीते थे, वहीं 24 जून 1564 को नर्रई के मैदान में अकबर के सेनापति आसफ खान और पांच अन्य मुग़ल सेनानायकों द्वारा किए गए छलपूर्वक युद्ध में वीरांगना रानी दुर्गावती ने घमासान युद्ध के बाद अपने बलिदान से मोर्चा मार ही लिया था।

विश्व की श्रेष्ठ वीरांगनाओं और नारी शक्ति के आदर्श प्रतिमानों के आलोक में सोलहवीं शताब्दी के इतिहास के पन्नों को पलटने पर भारत की एक ऐसी वीरांगना का नाम उभरता है,जो तुलनात्मक दृष्टि से विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना होने का दर्जा प्राप्त करती हैं, उन्हें भारतीय इतिहास में राजमाता वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से जाना जाता है। रानी दुर्गावती का गौरवशाली इतिहास बुंदेलखंड के कालिंजर से प्रारम्भ होकर,गढ़ा कटंगा के गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग तक पहुँचता है।रानी दुर्गावती 16 वर्ष तक गढ़ा – कटंगा के गोंडवाना साम्राज्य की साम्राज्ञी रहीं। एतदर्थ वीरांगना रानी दुर्गावती के इतिहास के पृष्ठ गोंडवाना से खोलते हैं।

क्या है  पृष्ठभूमि

भारत के हृदय स्थल में स्थित त्रिपुरी के महान् कलचुरि वंश का 13 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवसान हो गया था,फलस्वरूप सीमावर्ती शक्तियां इस क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए लिए लालायित हो रही थीं। अंततः इस संक्रांति काल में एक वीर योद्धा जादोंराय (यदुराय) ने, तिलवाराघाट निवासी एक महान् ब्राह्मण सन्यासी सुरभि पाठक के भगीरथ प्रयास से, त्रिपुरी क्षेत्रांतर्गत, गढ़ा-कटंगा क्षेत्र में गोंड वंश की नींव रखी।कालांतर में यह साम्राज्य महान् गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया।गोंडवाना साम्राज्य का चरमोत्कर्ष का प्रारंभ 48वीं पीढ़ी के महानायक राजा संग्रामशाह (अमानदास) के समय हुआ और इनकी पुत्रवधू वीरांगना रानी दुर्गावती का समय गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है।

रानी दुर्गावती के इतिहास से दुराव और उसका पटाक्षेप

भारतीय इतिहास का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा है, कि रानी दुर्गावती एवं गोंडवाना साम्राज्य के महान् इतिहास को एक छोटी सी कहानी बना डाला और पटाक्षेप कर दिया। रानी दुर्गावती का साम्राज्य लगभग इंग्लैंड के बराबर था। 16 वर्ष का शासन काल था, पूरे भारत में एकमात्र राज्य जहाँ कर, सोने के सिक्के एवं हाथियों तक में चुकाया गया था। जिसके चरित्र, शौर्य, पराक्रम, प्रबंधन और देशभक्ति के सामने, आस्ट्रिया की मारिया थेरेसा, रुस की कैथरीन द्वितीय और इंग्लैंड की एलिजाबेथ प्रथम,रजिया बेग़म और नूरजहाँ,समकक्ष नहीं हैं। रानी दुर्गावती के अदम्य साहस और वीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस अकबर के सामने बड़े -बड़े राजाओं ने घुटने टेक दिए थे, उस अकबर की चुनौती को वीरांगना रानी दुर्गावती ने दिलेरी के साथ स्वीकार किया। इसलिए अब शोधपूर्ण वास्तविक इतिहास लिखा जाना अनिवार्य है, ताकि रानी दुर्गावती और गोंडवाना साम्राज्य साम्राज्य के इतिहास के साथ न्याय हो और वर्तमान पीढ़ी और भावी पीढ़ी में गर्व और गौरव की अनुभूति हो तथा राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हो।

वीरांगना रानी दुर्गावती

गोंडवाना साम्राज्य का विस्तार

गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ जबलपुर, सागर, दमोह, सिवनी, मंडला, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, नागपुर, होशंगाबाद, भोपाल, और बिलासपुर तक फैले हुए थे। समकालीन इतिहासकारों की मानें तो 70 हजार गांव थे जिनकी संख्या रानी दुर्गावती के समय 80 हजार तक हो गई थी।किलों की संख्या 57 परगनों की संख्या 57 हो गई थी। कतिपय इतिहासकारों ने 56 सूबों का उल्लेख किया है। अकबर का दरबारी लेखक अबुल फजल लिखता है कि 23 हजार गांव में प्रत्यक्ष प्रशासन था और शेष सामंतों के अधीन करद गांव थे। गोंडवाना या गढ़ा-कटंगा विस्तृत और संपन्न राज्य हो गया था, इसके पूर्व में झारखंड, उत्तर में भथा या रीवा का राज्य, दक्षिण में दक्षिणी पठार और पश्चिम में रायसेन प्रदेश था। इसकी लंबाई पूर्व से पश्चिम 300मील तथा चौड़ाई उत्तर से दक्षिण 160 मील थी। इन सीमाओं को रानी दुर्गावती ने और बढ़ा लिया था। गोंडवाना साम्राज्य का क्षेत्रफल लगभग इंग्लैंड के क्षेत्रफल जितना हो गया था। विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण दिल्ली के सुल्तान या पड़ौस के कोई अन्य राजा गोंडवाना पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सके।

रानी दुर्गावती का विवाह और महान् साम्राज्ञी के रुप में उदय

उत्तर भारत में मुगल शासक हुमायूँ को शेरशाह ने बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध परास्त कर भारत से बाहर खदेड़ दिया और साम्राज्य विस्तार के लिए उद्यत हो गया। शेरशाह की मजहब की आड़ में विस्तारवादी नीति से कालिंजर के महान् शासक कीरत सिंह चिंतित हो गए थे, इसलिए शेरशाह सहित अन्य मुस्लिम आक्राताओं को मुँह तोड़ जवाब देने के लिए गोंडवाना साम्राज्य के महान् राजा संग्रामशाह से मित्रता का प्रस्ताव रखा, जो एक वैवाहिक संबंध के रुप में फलीभूत हुआ। वीरांगना रानी दुर्गावती का जन्म कालिंजर के किले में राजा कीरत सिंह के यहाँ 5 अक्टूबर सन् 1524 को दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था, उनकी माता का नाम कमलावती था। राजा संग्रामशाह और उनके सुपुत्र दलपतिशाह , राजा कीरतसिंह की सुपुत्री वीरांगना दुर्गावती के स्त्रियोचित सौंदर्य, शिष्टता, मधुरता और पराक्रम से बहुत प्रभावित थे, इसलिए संग्रामशाह ने कीरतसिंह से उनकी सुपुत्री का अपने पुत्र दलपतिशाह के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा, जो स्वीकार्य हुआ। दुर्भाग्य से सन् 1541 में राजा संग्रामशाह का निधन हो गया है बावजूद इसके राजा कीरतसिंह ने अपना वचन निभाया और सन् 1542 अपनी सुपुत्री वीरांगना दुर्गावती का विवाह, राजा दलपतिशाह से कर दिया।यह विवाह सामाजिक समरसता का अद्वितीय उदाहरण है।

सन् 1545 में शेरशाह ने कालिंजर पर आक्रमण किया और मारा गया जिसमें रानी दुर्गावती की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस युद्ध में राजा कीरतसिंह का भी बलिदान हुआ। जिससे वीरांगना दुर्गावती को धक्का लगा परंतु सन् 1548 में पति दलपतिशाह की आकस्मिक मृत्यु ने वीरांगना पर वज्रपात कर दिया। इस वज्रपात से वीरांगना दुर्गावती विचलित हुईं पर शीघ्र ही उन्होंने साहस के साथ अपने 5 वर्षीय अल्पवयस्क सुपुत्र वीर नारायण की ओर से गोंडवाना साम्राज्य की सत्ता संभाल ली। इस तरह गोंडवाना साम्राज्य की वीरांगना रानी दुर्गावती का महान् साम्राज्ञी के रुप में उदय हुआ।

रानी दुर्गावती की अर्थ नीति और गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग

रानी दुर्गावती ने लगभग 16 वर्ष शासन किया और यही काल गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग था। गोंडवाना साम्राज्य राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक,कला एवं साहित्य के क्षेत्र में सुव्यवस्थित रुप से पल्लवित और पुष्पित होता हुआ अपने चरमोत्कर्ष तक पहुँचा। वर्तमान में प्रचलित जी.एस. टी. जैंसी कर प्रणाली रानी दुर्गावती के शासनकाल में लागू की गई थी, फलस्वरुप तत्कालीन भारत वर्ष गोंडवाना ही एकमात्र राज्य था जहाँ की जनता अपना लगान स्वर्ण मुद्राओं और हाथियों में चुकाते थे, इसका उल्लेख स्वयं अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने भी किया है। रानी दुर्गावती ने महिलाओं को शिक्षित करने का प्रयास किया और उनके लिए लाख के आभूषणों के लघु उद्योग स्थापित कराए। चिरौंजी, सिंघाड़ा, महुआ एवं इमारती लकड़ी के व्यापार को प्राथमिकता दी । गढ़ा में उन्नत वस्त्र उद्योग था। जड़ी बूटियों से बनी औषधियों के व्यापार को भी बढ़ावा दिया।

गोंडवाना में विपुल पशुधन और उन्नत कृषि थी यहाँ का मोटा अनाज(मिलेट्स) पूरे भारत में हुआ। वहीं वस्त्र उद्योग, काष्ठ उद्योग, जड़ी बूटियों से तैयार औषधि उद्योग और शस्त्र उद्योग को बढ़ावा दिया गया। वनांचल में रहने वालों को लाख, औषधि निर्माण, शहद, चार-चिरोंजी और गोंद उद्योग को बढ़ाया गया।नगरीय क्षेत्र में आम, जामुन सीताफल और अमरुद के बगीचे विकसित किए तो ग्रामीण क्षेत्रों में साल, सागौन, खैर, तेंदू और महुआ आदि का संरक्षण और रोपण हुआ।जल संसाधन विकसित किए गए जिससे मत्स्य और सिंघाड़ा उद्योग उन्नत हुआ। रानी दुर्गावती के समय गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग बनाने में कर प्रणाली और आर्थिक नीतियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

गढ़ा बना लघु काशी- वृंदावन और नारी शिक्षा का केंद्र

उन दिनों उत्तर – मध्य भारत का हिन्दुओं का धार्मिक केंद्र बिंदु था, जहाँ कोई भी हिन्दू अपनी इच्छानुसार धार्मिक अनुष्ठान कर सकता था, श्रीमद् वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ का आगमन देवताल (गढ़ा) में अक्सर होता था। रानी दुर्गावती के आग्रह पर 3 वर्ष विट्ठलनाथ गढ़ा में ही रहे। यहीं बैठकजी के मंदिर का निर्माण किया गया जहाँ पर शुद्धाद्वैत नियमों से पूजा होती थी, इसलिए इस स्थान को लघुकाशी वृंदावन कहा जाता था,।

रानी दुर्गावती ने नारी सशक्तिकरण की दिशा में श्लाघनीय कार्य किये हैं।स्त्रियों को शास्त्र और शस्त्र की शिक्षा देने के उद्देश्य से गढ़ा में विट्ठलनाथ के प्रवास के दौरान ही रानी दुर्गावती ने देवताल के पास पचमठा में स्त्रियों के लिए प्रथम गुरुकुल स्थापित कराया था, जिसमें स्वयं स्वामी विट्ठलनाथ ने स्त्रियों को शिक्षा प्रदान की थी।स्त्रियों के लिए एक सैन्य पाठशाला भी स्थापित की गई थी। कौशल विकास केन्द्र स्थापित किए गए थे जिनमें उद्यमिता और कुटीर उद्योग को बढ़ाने के लिए कक्षाएं होती थीं।

विश्व का अद्भुत एवं अद्वितीय जल प्रबंधन तथा पर्यावरण संरक्षण

जल प्रबंधन और पर्यावरण की दृष्टि से वीरांगना रानी दुर्गावती की योजनाएं आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितनी उस काल में थीं। यूँ तो अपने साम्राज्य में 1000तालाब और 500 बावलियों का निर्माण कराया था परंतु जबलपुर में 52 सरोवर (तालाब) और 40 बावलियों का अद्भुत एवं अद्वितीय प्रबंधन किया गया था,। सरोवर 3 प्रकार के होते थे प्रथम – शिखर सरोवर – पहाड़ी सरोवर थे जो वनस्पतियों और वन्य जीवों की रक्षा के लिए थे। द्वितीय – तराई सरोवर – पहाड़ियों की तराई में जल संग्रहण हेतु बनाये गये थे। तृतीय – नगरीय सरोवर थे। तीनों प्रकार के सरोवर भूमिगत नहरों द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए थे, इस योजना को पंचासर योजना के नाम से जाना जाता है। जल संवर्धन के लिए वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग किया गया और केरल से बुलाए गए,भूजल विशेषज्ञ कीकर सिंह पानीकार का नाम उल्लेखनीय है।जल प्रबंधन और पर्यावरण की दृष्टि से गोंडवाना साम्राज्य की व्यवस्थाएं संपूर्ण विश्व में अद्भुत एवं अद्वितीय रही हैं। गोंडवाना के महान् राजा संग्राम शाह ने महान् भूजल विशेषज्ञ कीकर सिंह पानीकार के सहयोग से जल शोधन और प्रबंधन की अनोखी प्रणाली को विकसित किया था। जल प्रबंधन के अंतर्गत 3 प्रकार के तालाब निर्मित किए गए थे और उनको पंचसर (पंचासर) प्रणाली के अंतर्गत भूमिगत नहरों से जोड़ा गया था। पंचसर का तात्पर्य एक तालाब से 5 तालाबों का जुड़ाव था उसके बाद अन्य तालाब जुड़ते थे। यह योजना संग्राम सागर से प्रारंभ हुई थी। संग्राम सागर से ठाकुर ताल,सगड़ा ताल, बाल सागर, कोलाताल, और सूपाताल क्रमशः जुड़े हुए थे। तदुपरांत इन तालाबों से अन्य तालाब भूमिगत नहरों से जुड़े थे।

वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपने शासनकाल में जलसंरक्षण के लिए प्राकृतिक साइफन व्यवस्था को अपनाया था। यही वजह है कि गढ़ा -कटंगा में जलसंरक्षण और जलनिकासी व्यवस्था श्रेष्ठ थी। आज जल संरक्षण के प्रति उदासीनता के कारण बड़े-बड़े शहरों में जलसंकट गहराता जा रहा है। जलसंरक्षण करना अब बड़ी चुनौती बनता जा रहा है और भविष्य में पानी को लेकर ही युद्ध होगा। इसलिए जलसंरक्षण के लिए चिंता करने की आवश्यकता है। विश्व व्यापी गहराते जल संकट का समाधान करना है, तो रानी दुर्गावती का जल प्रबंधन का मॉडल आज अनुकरणीय है।

16 बड़े युद्ध सहित 52 युद्धों में से 51 में अपराजेय रहीं

 

वीरांगना ने 16 बड़े युद्ध लड़े। 16 युद्धों में से 15 युद्धों में विजयी रहीं, जिसमें 12 युद्ध मुस्लिम आक्राताओं से लड़े गये, उसमें से भी 6 मुगलों के विरुद्ध लड़े गये। वैंसे गोंडवाना में प्रचलित है कि छोटे – बड़े सभी युद्धों की बात की जाए तो वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपने जीवनकाल में 52 युद्ध लड़े थे जिसमें 51 युद्धों में उन्होंने विजय प्राप्त की थी।

गोंडवाना की साम्राज्ञी के रुप में सत्ता संभालते ही मांडू के अय्याश शासक बाजबहादुर ने विधवा महिला जानकर गोंडवाना साम्राज्य पर दो बार आक्रमण किए परंतु रानी दुर्गावती ने दोनों बार जमकर दुर्गति कर डाली। प्रथम आक्रमण में वीरांगना रानी दुर्गावती ने बाजबहादुर के चाचा फतेह खां को द्वंद्व युद्ध में मार डाला और द्वितीय आक्रमण में बाजबहादुर को मांडू राजधानी घर तक खदेड़ा। बाजबहादुर जीवन भर शरणागत रहा। आगे मालवा के सूबेदार शुजात खाँ की कभी हिम्मत नहीं हुई। रानी दुर्गावती की युद्ध नीति से ही, शेरखां (शेरशाह) कालिंजर अभियान में मारा गया। कुछ दिनों बाद मुगलों ने पानीपत के द्वितीय युद्ध के उपरांत पुनः सत्ता हथिया ली और अकबर शासक बना। शीघ्र ही उसने येन केन प्रकारेण साम्राज्य विस्तार करना आरंभ कर दिया।

वीरांगना रानी दुर्गावती का निर्भय संदेश और अकबर का बौखलाहट

रानी दुर्गावती के गोंडवाना साम्राज्य की संपन्नता और समृद्धि की चर्चा कड़ा और मानिकपुर के सूबेदार आसफ खान द्वारा मुगल दरबार में की गई । धूर्त, लंपट और चालाक अकबर लूट और विधवा रानी को कमजोर समझते हुए बदनीयती से बलात् गोंडवाना साम्राज्य हथियाने के उद्देश्य से रानी को आत्मसमर्पण के लिए धमकाया और अपने दूत से यह परवाना लिख कर भेजा कि

अपनी सीमा राज की,
अमल करो परमान।
भेजो नाग सुपेत सोई,
अरु आधार दीवान।।

परंतु गोंडवाना की निर्भीक, स्वाभिमानी, स्वतंत्र प्रिय और स्व की प्रतिमूर्ति वीरांगना रानी दुर्गावती नहीं मानी।तब अकबर का एक और संदेश आया कि स्त्रियों का काम रहंटा कातने का है, तो रानी ने जवाब में अपने संदेश के साथ एक सोने का पींजन भेजा और कहा कि आपका भी काम रुई धुनकने का है। अकबर बौखला गया और उसने आसफ खान को गोंडवाना साम्राज्य की लूट और उसके विनाश के लिए रवाना किया। इसके पूर्व अकबर ने दो गुप्तचरों क्रमशः गोप महापात्र और नरहरि महापात्र को भेजा परंतु वीरांगना ने दोनों को अपनी ओर मिला लिया। उन्होंने अकबर की योजना और आसफ खाँ के आक्रमण के बारे में रानी दुर्गावती को सब कुछ बता दिया।

वीरांगना रानी दुर्गावती के मुगलों से 6 भीषण युद्ध

वीरांगना रानी दुर्गावती सतर्क हो गईं और सिंगौरगढ़ में मोर्चा बंदी कर ली। आसफ खान 6 हजार घुड़सवार सेना 12 हजार पैदल सेना एवं तोपखाने तथा स्थानीय मुगल सरदारों के साथ सिंगोरगढ़ आ धमका। इधर रानी दुर्गावती के साथ, उनके पुत्र वीर नारायण सिंह, आधार सिंह, हाथी सेना के सेनापति अर्जुन सिंह बैस, कुंवर कल्याण सिंह बघेला, चक्रमाण कलचुरि, महारुख ब्राह्मण, वीर शम्स मियानी, मुबारक बिलूच,खान जहान डकीत, महिला दस्ता की कमान रानी दुर्गावती की बहन कमलावती और पुरा गढ़ की राजकुमारी (वीर नारायण सिंह की होने वाली पत्नी) संभाली। अविलंब युद्ध आरंभ हो गया।

सिंगोरगढ़ का प्रथम युद्ध

आसफ खान ने आत्मसमर्पण के लिए कहा, वीरांगना दुर्गावती ने कहा कि किसी शासक के नौकर से इस संदर्भ में बात नहीं की जा सकती है। वीरांगना रानी दुर्गावती ने भयंकरआक्रमण किया, मुगलों के पैर उखड़ गये आसफ खान भाग निकला।

सिंगौरगढ़ का द्वितीय युद्ध– प्रथम युद्ध की तरह पुनः मुगलों के वही हाल हुए, लेकिन मुगलों का तोपखाना पहुंच गया और रानी को जानकारी लग गयी उन्होंने गढ़ा में मोर्चा जमाया और सिंगोरगढ़ छोड़ दिया।
सिंगौरगढ़ का तृतीय युद्ध –  सेनानायक अर्जुन सिंह बैस ने मुगलों के पैर उखाड़ दिए परंतु मुगलों का तोपखाना भारी पड़ गया। इसलिए सिंगोरगढ़ का किला एक रणनीति के अंतर्गत छोड़ दिया गया।

चंडाल भाटा (अघोरी बब्बा) का युद्ध

यह चौथा युद्ध था जिसका उद्देश्य मुगल सेना को पीछे हटाना था ताकि वीरांगना रानी दुर्गावती गढ़ा से बरेला के जंगलों की ओर निकल जाए।चंडाल भाटा के मैदान में घमासान युद्ध हुआ और सेनानायक अर्जुन सिंह बैस ने आसफ खाँ को बहुत पीछे तक खदेड़ दिया। वीरांगना ने तोपखाने से निपटने के लिए, एक शानदार रणनीति बनायी जिसके अनुसार बरेला (नर्रई) के सकरे और घने जंगलों के मध्य मोर्चा जमाया ताकि तोपों की सीधी मार से बचा जा सके।

गौर नदी का युद्ध

गौर नदी पर आसफ खान ने तोपखाना ले जा के लिए पुल का निर्माण करवाया, जिसे ध्वस्त करने के लिए गये महारथी अर्जुन सिंह बैस लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। वीरांगना रानी दुर्गावती के जीवन के 15वें बड़े और मुगलों से 5वें युद्ध में 22 जून 1564 को स्वतंत्रता,स्वाभिमान और शौर्य की देवी – विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती ने,प्रात:सेनानायक अर्जुन सिंह बैस के बलिदान होने का समाचार मिलते ही “अर्द्धचंद्र व्यूह”बनाते हुए “गौर नदी के युद्ध” में आसफ खाँ सहित मुगलों की सेना पर भयंकर आक्रमण किया और पुल तोड़ दिया ताकि तोपखाना नर्रई (बरेला) न पहुँच सके। मुगल सेना तितर-बितर बितर हो गई जिसको जहां रास्ता मिला भाग निकला। वीरांगना रानी दुर्गावती ने पुन:रात्रि में आक्रमण की योजना बनाई परंतु सरदारों की असहमति के कारण निर्णय बदलना पड़ा। यहीं भारी चूक हो गई, यदि रात्रि में आक्रमण होता तो इतिहास कुछ और ही होना था।

नर्रई के घमासान युद्ध और स्व के लिए वीरांगना का प्राणोत्सर्ग

अंततः वीरांगना ने नर्रई की ओर कूच किया।23 जून 1564 को नर्रई में प्रथम मुठभेड़ हुई, रानी और उनके सहयोगियों ने मुगलों की की दुर्गति कर डाली ।आसफ खान सहित मुगल सेना भाग निकली और डरकर बरेला तक निकल गई । 23 जून की रात तक तोपखाना गौर नदी पार कर बरेला पहुंच गया। 23 जून की रात को घातक षड्यंत्र हुआ। आसफ खान ने रानी के एक छोटे सामंत बदन सिंह को घूस देकर मिला लिया। उसने रानी की रणनीति का खुलासा कर दिया कि कल युद्ध में रानी मुगलों को घने जंगलों की ओर खींचेगी जहाँ तोपखाना कारगर नहीं होगा और सब मारे जाएंगे। आसफ खान डर गया उसने उपचार पूछा, तब बदन सिंह ने बताया कि नर्रई नाला सूखा पड़ा है और उसके पास पहाड़ी सरोवर है जिसे यदि तोड़ दिया जाए तो पानी भर जाएगा और रानी नाला पार नहीं कर पाएगी और तोपों की मार सीधा पड़ेगी। उधर रात में रानी को अनहोनी का अंदेशा हुआ, उन्होंने सरदारों से रात में ही हमले का प्रस्ताव रखा पर सरदार नहीं माने ! यदि मान जाते तो इतिहास कुछ और ही होता। अंततोगत्वा युद्ध की अंतिम घड़ी समीप आ ही गयी। 24 जून 1564 को प्रातः लगभग 10 बजे भयंकर मोर्चा खुल गया और घमासान युद्ध प्रारंभ हुआ पहले हल्ले में मुगलों के पांव उखड़ गए। मुगलों ने 3 बार आक्रमण किये और तीनों बार गोंडों ने जमकर खदेड़ा, इसलिए मुगलों ने तोपखाना से मोर्चा खोल दिया। रानी दुर्गावती ने योजना अनुसार घने जंगलों की ओर बढ़ना प्रारंभ किया परंतु बदन सिंह की योजना अनुसार पहाड़ी सरोवर तोड़ दिया गया। नर्रई में बाढ़ जैसी स्थिति बन गयी, अब वीरांगना घिर गयी। इसी बीच अपरान्ह लगभग 3 बजे वीरनारायण के घायल होने की खबर आई परंतु वीरांगना रानी दुर्गावती तनिक भी विचलित नहीं हुई। आंख में तीर लगने के बाद भी युद्ध जारी रखा, मुगल सेना के बुरे हाल थे परंतु अचानक रानी को एक तीर गर्दन पर लगा रानी ने तीर तोड़ दिया। हाथी सरमन के महावत को अधार सिंह ने पीछे हटने का आदेश दिया,परंतु रानी समझ गयी थी कि अब वो नहीं बचेंगी! अत: आधार सिंह को उन्होंने स्वयं को मार देने का आदेश दिया परंतु आधार सिंह ने वीरांगना को मारने से मना कर दिया। वीरांगना रानी दुर्गावती, अधार सिंह से यह कहते हुए कि

“मृत्यु तो सभी को आती है आधार सिंह,
परंतु इतिहास उन्हें ही याद रखता है जो स्वाभिमान के साथ जिये और मरे”,

युद्ध के गोल में समा गयीं और लगभग 150 मुगल सैनिकों का वध करते हुए, भीषण युद्ध किया जब उनको मूर्छा आने लगी तो उन्होंने अपनी कटार से प्राणोत्सर्ग किया। वहीं सेनापति आधार सिंह के नेतृत्व में कल्याण सिंह बघेला,चक्रमाण कलचुरि और महारुख ब्राम्हण ने युद्ध जारी रखा और वीरांगना के पवित्र शरीर को सुरक्षित किया तथा युवराज वीर नारायण सिंह को रणभूमि से सुरक्षित भेज कर अपनी पूर्णाहुति दी। युवराज वीरनारायण सिंह ने वीरांगना रानी दुर्गावती का अंतिम संस्कार कर चौरागढ़ में सेनापति आधार सिंह के साथ मुगलों के विरुद्ध मोर्चा जमाया, जहाँ मुगलों के विरुद्ध चौरागढ़ ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया।
जबलपुर के समीप बरेला, ग्राम पंचायत-पिपरिया खुर्द, बारहाग्राम में स्थित नर्रई की युद्ध भूमि में वीरांगना रानी दुर्गावती का समाधि स्थल है।

विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती का व्यक्तिव और कृतित्व सनातन धर्म में नारी शक्ति की मीमांसा का पर्याय है।यह शोध आलेख उन हिंदू वीरांगनाओं और समग्र नारियों को सादर समर्पित है,जो जीवन के संग्राम में स्व के लिए मां, बेटी, बहन, पत्नी के रुप में देश की रक्षा के लिए अनादि काल से पूर्णाहुति देती आ रही हैं और दे रहीं हैं जिनकी आस्था और समर्पण अटल है और उन्हें विपरीत परिस्थितियाँ भी हरा नहीं सकीं। हिन्दुओं में बेटी का जन्म एक परिवार, एक कुटुम्ब का जन्म है, इसलिए मातृशक्ति हिंदुत्व का मूलाधार है।एतदर्थ हिन्दू धर्म में एक बेटी का जन्म शक्ति के अवतार के रूप में शिरोधार्य किया जाता है, जिसे विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती ने चरितार्थ किया है।कालजयी वीरांगना रानी दुर्गावती चिरकाल तक स्व के लिए आन -बान -शान और बलिदान की पराकाष्ठा का प्रतीक रहेंगी।

 

Topics: पाञ्चजन्य विशेषरानी दुर्गावतीगोंडवाना साम्राज्यरानी दुर्गावती और अकबररानी दुर्गावती का इतिहास
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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