न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते ।। (मनु.)
हिन्दी अर्थ –
कामनाओं के उपभोग से कामाग्नि शान्त नहीं होती, प्रत्युत अधिक प्रचण्ड होती है। जैसे घृतादि से युक्त हवि के डालने से अग्नि प्रदीप्त ही होती है। अतः प्रचण्ड कामाग्नि की शान्ति के लिए मन पर नियन्त्रण अत्यावश्यक है। यही दम है।

















