यह श्लोक महाकाव्य उत्तर रामायण/वाल्मीकि रामायण से उद्धृत है। यह वाक्य भगवान श्रीराम ने लंका विजय के बाद अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी से कहा था, जब लक्ष्मण जी लंका की अपार समृद्धि, सोने के महलों और वैभव को देखकर आश्चर्यचकित थे।
आज का श्लोक-
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण! रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।८।।
भावार्थ-
हे लक्ष्मण! यह स्वर्णमयी लंका मुझे अच्छी नहीं लगती है, क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढकर है।
आज श्लोक की प्रासंगिकता-
यह श्लोक मानवीय मूल्यों, देशप्रेम और जड़ों से जुड़ाव का एक अमर संदेश है। आज की दुनिया में लोग अक्सर धन, संपत्ति और भौतिक वैभव को ही सफलता का अंतिम पैमाना मान लेते हैं। इसमें भगवान राम का यह कथन सिखाता है कि बाहरी चमक-धमक, धन-दौलत और भौतिक सुख कभी भी अपनी जड़ों, संस्कारों और अपनी मातृभूमि के प्रति स्नेह का स्थान नहीं ले सकते। लोग बेहतर अवसरों की तलाश में लोग अपना देश, गाँव या घर छोड़कर विदेशों में बस रहे हैं।
यह हमें याद दिलाता है कि व्यक्ति चाहे दुनिया के किसी भी समृद्ध कोने में चला जाए, अपनी मातृभूमि और संस्कृति के प्रति निष्ठा एवं सम्मान सदैव बना रहना चाहिए। अपनी जड़ों से कटकर प्राप्त की गई समृद्धि अधूरी होती है।

















