मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने सोमवार को तमिलनाडु सरकार के उन सरकारी आदेशों (G.O.) को रद्द कर दिया, जिनमें करूर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों को सरकारी नौकरियां दी जा रही थीं। कोर्ट ने कहा कि ये नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं।
क्या था पूरा मामला
सितंबर 2025 में करूर में तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) की रोडशो के दौरान स्टांपीड हो गया था। इस कार्यक्रम को पार्टी के अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने संबोधित किया था। इस हादसे में कई लोग मारे गए थे। इस घटना के बाद सरकार ने पीड़ित परिवारों के सदस्यों को सहानुभूति के आधार पर सरकारी नौकरियां देने का फैसला लिया। जुलाई में मुख्यमंत्री विजय ने खुद करूर में जाकर लगभग 31-32 परिवार के सदस्यों को नियुक्ति पत्र सौंपे थे। ये नौकरियां जूनियर असिस्टेंट, ऑफिस असिस्टेंट जैसी पदों पर थीं।
PIL पर सुनवाई
कुछ लोगों ने पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) दायर करके इस फैसले को चुनौती दी। मदुरै बेंच के जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. सक्थिवेल की डिवीजन बेंच ने इन याचिकाओं पर सुनवाई की। पहले कोर्ट ने सरकार को करूर में नियुक्ति पत्र बांटने की इजाजत दे दी थी, लेकिन साफ कहा था कि ये नियुक्तियां अदालती समीक्षा के अधीन रहेंगी।
कोर्ट का क्या कहना है
कोर्ट ने कहा कि सहानुभूति के आधार पर नौकरी देने के लिए स्पष्ट गाइडलाइंस होती हैं। सरकार ने इसे इंसानी रवैया बताया और कहा कि इसे चुनौती नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन कोर्ट का मत था कि जनता का हित सबसे ऊपर है। हर विभाग में सहानुभूति नौकरियों के लिए वेटिंग लिस्ट है। वहां सीनियरिटी के आधार पर नौकरी दी जाती है, न कि तुरंत राहत के आधार पर। अगर करूर पीड़ितों के परिवारों को तरजीह दी जाती है तो वेटिंग लिस्ट में लगे दूसरे लोगों के साथ अन्याय होगा।
कोर्ट ने कहा कि सरकार ने आर्टिकल 162 के तहत अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल किया, लेकिन ये शक्तियां भी संविधान की सीमा में रहकर इस्तेमाल होनी चाहिए। बिना रोक-टोक के इस्तेमाल से अराजकता फैल सकती है। अदालत का काम है कि निष्पक्षता सुनिश्चित करे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी नौकरियां देने से दूसरे हादसों (जैसे आतिशबाजी या सड़क दुर्घटनाओं) में मारे गए लोगों के परिवार भी इसी तरह मांग करेंगे। इससे सार्वजनिक नौकरियों पर दबाव बढ़ेगा।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकार को परिवार के सदस्यों को स्किल ट्रेनिंग, एंटरप्रेन्योरशिप या टेक्निकल कोर्स कराने में मदद करनी चाहिए। इससे वे खुद आत्मनिर्भर बनें और दूसरों को नौकरी दें। कोर्ट ने कहा कि ऑफिस असिस्टेंट जैसी नौकरी देने से बेहतर यह विकल्प है। कोर्ट ने ये भी कहा कि हर नौकरी का अपना मूल्य और सम्मान है। सरकार को इसे “साधारण पद” कहकर कमतर नहीं बताना चाहिए।
TNPSC (तमिलनाडु पब्लिक सर्विस कमीशन) ने भी बताया कि सहानुभूति नौकरियां अब उसके दायरे से बाहर कर दी गई हैं। कोर्ट ने कहा कि TNPSC को संविधान के तहत गाइडलाइंस बनाने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
















