नकारात्मक नैरेटिव अक्सर आधे-अधूरे तथ्यों और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से प्रेरित होता है। इस बात का बहुत अच्छा प्रमाण है ‘सनातन धर्म’ के खिलाफ एक सतत दुष्प्रचार। विडंबना यह है कि ‘सनातन धर्म’ तो अपने मूल में समावेशी, सहिष्णु, शांतिप्रिय और सर्वकल्याणकारी है।
लेकिन दुर्भाग्य से विदेशी विचारधाराओं ने इस सनातन धर्म के खिलाफ सैकड़ों वर्षों से एक मुहिम छेड़ रखी है। इन विदेशी षड्यंत्रों के प्रभाव और साथ ही अपने राजनीतिक स्वार्थों के वशीभूत भारत में भी कुछ राजनीतिक दलों, नेताओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने सनातन धर्म के विरुद्ध मोर्चा खोला हुआ है। इसका नवीनतम उदाहरण है पिछले दिनों 12 मई 2026 को तमिलनाडु विधानसभा सत्र के दौरान डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन का विषवमन कि “सनातन को मिटा देना चाहिए।” उनके अनुसार सनातन समाज को बाँटता है। हालाँकि यह पहला अवसर नहीं था जब उदयनिधि या ऐसे लोगों ने सनातन विरोधी बयान दिया हो। गहराई से पड़ताल करें तो ऐसे खतरनाक वक्तव्यों के पीछे दरअसल एक दुर्भावना और राजनीतिक स्वार्थ तो है ही, साथ ही ‘सनातन धर्म’ को लेकर एक गलत और विकृत समझ भी है।
सनातन धर्म का अर्थ और उसकी शाश्वत अवधारणा
‘सनातन’ शब्द का निर्माण संस्कृत भाषा के ‘सद’ धातु से हुआ है। पाणिनि सूत्र के अनुसार जब ‘सद’ धातु पर ‘नुम्’ प्रत्यय लगता है, तो इससे ‘सना’ शब्द बनता है, जिसका अर्थ है ‘सदा रहने वाला’ या ‘शाश्वत’। ‘सनातन’ शब्द का दूसरा हिस्सा ‘तन’ का अर्थ है विस्तारित। इस प्रकार सनातन का अर्थ है जो शाश्वत रूप से या सदैव विस्तारित और प्रवाहित है। कहा भी गया है, ‘सनातनस्य धर्मः इति सनातन धर्मः’, अर्थात् जो सदा से है और सदा रहेगा, वही सनातन है। इसका न कोई आदि (शुरुआत) है और न ही कोई अंत। सनातन विरोधियों को भलीभांति समझ लेना चाहिए कि जिस ‘सनातन धर्म’ का कोई आदि और अंत नहीं, जो शाश्वत और चिरंतन है, उसे मिटाने या नष्ट करने की कल्पना एक दिवास्वप्न ही है। अतीत में सिकंदर, मिहिरकुल, मोहम्मद गोरी, महमूद गजनवी, खिलजी, चंगेज़ खाँ, तैमूर लंग, बाबर, औरंगजेब आदि ने भी सनातन धर्म-संस्कृति को समाप्त करने का प्रयास किया, लेकिन आज भी ‘सनातन धर्म’ अपराजेय खड़ा है।
सनातन धर्म के मूल सिद्धांत और ब्रह्मांडीय नियम
सनातन की इस चिरंतनता का आधार है कुछ ब्रह्मांडीय नियम, जो सार्वदेशिक, सार्वकालिक और सार्वभौमिक हैं। ये ब्रह्मांडीय नियम हैं— सत्य, कर्म, कर्तव्य, नैतिकता, सदाचार, सर्वकल्याण, सहिष्णुता, प्रकृति-पूजा और मोक्ष इत्यादि। अर्थात सनातन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की समग्र पद्धति भी है।
इस सनातन धर्म से इस्लाम या ईसाइयत आदि रिलिजन या मजहब काफी अलग हैं, जो एक पैगम्बर, एक किताब या एक विशिष्ट पूजा-उपासना पद्धति पर आधारित हैं और अन्य को स्वीकार नहीं करते। जबकि सर्वसमावेशी सनातन धर्म के सूत्र हैं— “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” (ऋग्वेद), अर्थात परम सत्य या परमेश्वर एक है, विद्वान इसकी अलग-अलग व्याख्या करते हैं; या “सर्वे भवन्तु सुखिनः” (बृहदारण्यक उपनिषद), यानी सबका कल्याण हो, केवल सनातन को मानने वालों का ही नहीं; या “वसुधैव कुटुम्बकम्” (महोपनिषद), अर्थात पूरा विश्व ही अपना परिवार है, केवल अपने रिलिजन या मजहब वाले ही नहीं; या “ईशावास्यमिदं सर्वम्” (ईशावास्य उपनिषद), अर्थात केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि जीव-जंतु के साथ-साथ पेड़-पौधे, नदी, पर्वत सभी चर-अचर में एक ही चेतना का वास है।
इसीलिए सनातन धर्म में सबके कल्याण की कामना और सबके समान अस्तित्व का स्वीकार भाव है। फिर सनातन धर्म विभाजनकारी या भेदभावपूर्ण कैसे हुआ? पालि भाषा में बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘धम्मपद’ में ‘धम्मो सनन्तनो’ (सनातन धर्म) का महिमामंडन है। भक्तशिरोमणि कबीरदास, तुलसी, रैदास और मीरा से लेकर जायसी, रसखान जैसे मुसलमान भी सनातन का बखान करते हैं। इस सनातन धर्म को प्राचीनकाल में ‘आर्य धर्म’ या ‘मानव धर्म’ भी कहा जाता था। बाद में इसे हिंदू धर्म भी कहा जाने लगा। हालाँकि समय के साथ इसमें जाति-पाँति जैसी कुछ बुराइयाँ भी घुस गईं। तथापि प्राचीनकाल से लेकर अब तक इन बुराइयों का आंतरिक रूप से हमेशा विरोध भी हुआ, और होना भी चाहिए। लेकिन इन कुछ बुराइयों के कारण सम्पूर्ण सनातन धर्म को ही मिटा देने की बात करना घोर निंदनीय है।
राजनीतिक दलों और नेताओं के सनातन धर्म पर विवादित बयान
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि मार्क्सवाद एवं अन्य विदेशी विचारधाराओं के साथ-साथ तुष्टिकरण की राजनीति के कारण डीएमके ही नहीं, कांग्रेस पार्टी और समाजवादी पार्टी जैसे दलों के नेता भी सनातन धर्म या हिंदू धर्म की जब-तब अवमानना करते रहते हैं।
सितंबर 2023 में भी उदयनिधि स्टालिन ने कहा था, “जिस प्रकार मच्छर, डेंगू, मलेरिया और कोरोना को समाप्त किया जाता है, उसी प्रकार केवल सनातन धर्म का विरोध करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए।” मद्रास उच्च न्यायालय ने तो उनके 2023 के बयानों को ‘हेट स्पीच’ के समान बताया था। अर्थात यह संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अनुसार असंवैधानिक है।
कष्ट की बात यह है कि सनातन धर्म या हिंदू धर्म पर प्रहार करने वाले ऐसे बयानों पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दलों की मौन सहमति ही रही है। उदयनिधि के हालिया बयान की निंदा करने के बजाय कांग्रेस ने इसे उनका ‘निजी विचार’ या ‘क्षेत्रीय राजनीति’ करार देकर धीरे से किनारा कर लिया। उदयनिधि के 2023 के बयानों पर कांग्रेस ने ‘सर्वधर्म समभाव’ की बात तो की, पर यह भी जोड़ दिया कि हर राजनीतिक दल को अपनी बात रखने की आजादी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे प्रियांक खरगे ने तो उदयनिधि के बयान का परोक्ष रूप से समर्थन किया था।
समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी उदयनिधि के बयान की निंदा करने के बजाय धर्म को एक व्यक्तिगत विषय बताकर किनारा कर लिया। बल्कि अखिलेश यादव स्वयं सनातन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रहार करते रहे हैं। मई 2022 में अयोध्या में राम मंदिर के प्रश्न पर उन्होंने कहा, “हिंदू धर्म में कहीं भी पत्थर रख दो, लाल झंडा लगा दो, पीपल के पेड़ के नीचे मंदिर बन जाता है।” यह टिप्पणी हिंदू आस्था का उपहास ही थी।
इसी तरह 2025 में अखिलेश यादव ने एक दुर्भावनापूर्ण बयान दिया कि उन्हें सुगंध पसंद है, इसलिए उनकी सरकार ने कन्नौज में इत्र पार्क बनाया, जबकि भाजपा ‘दुर्गंध’ पसंद करती है, इसलिए गौशालाएँ बनवा रही है। ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ से संचालित समाजवादी पार्टी की राजनीति में यह प्रवृत्ति नई नहीं है। मुलायम सिंह यादव ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर गोली चलाने के निर्णय का बचाव करते हुए कहा था कि अगर गोली नहीं चलती तो मुसलमानों का देश से विश्वास उठ जाता।
डीएमके, टीवीके और अन्य नेताओं की विवादित टिप्पणियाँ
डीएमके सांसद ए. राजा ने तो अति करते हुए सनातन धर्म की तुलना एचआईवी (HIV) और कुष्ठ रोग से कर दी थी। तमिलनाडु में टीवीके सरकार के नए मुख्यमंत्री, जोसेफ विजय, उदयनिधि के भाषण के दौरान एक मूक दर्शक बने रहे। यह उदयनिधि के तीखे हमले के लिए एक परोक्ष समर्थन था। यह अकारण नहीं था कि 14 मई 2026 को टीवीके विधायक वीएमएस मुस्तफा ने उदयनिधि की टिप्पणियों का समर्थन करते हुए कहा था कि उनकी पार्टी सनातन धर्म को मिटाने के लिए मैदान में उतरी है।
कांग्रेस का सनातन धर्म और हिंदू आस्था को लेकर रवैया
उधर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी का रवैया तो सनातन धर्म के प्रति अक्सर विवादों में रहा ही है। इंदिरा गाँधी द्वारा नवंबर 1966 में गौ-भक्तों पर गोली चलवाना, वर्ष 2007 में रामसेतु प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय में कांग्रेस द्वारा रामकथा के पात्रों एवं घटनाओं को ऐतिहासिक प्रमाण मानने से शुरू में इनकार करना, या अप्रैल 2025 में अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी में राहुल गांधी द्वारा प्रभु श्रीराम को एक मिथकीय (अर्थात जो ऐतिहासिक नहीं है) पात्र बताना; इसके स्पष्ट प्रमाण हैं।
सनातन धर्म की सहिष्णुता और संवाद की परंपरा
यह विडंबना ही है कि जो सनातन परंपरा अपने मूल में सर्वाधिक सहिष्णु, उदार और समावेशी है, उसी पर सर्वाधिक प्रहार किया जाता है। सनातन की यही विशेषता है कि यहाँ मतभेद को भी स्थान मिलता है। उपनिषदों की वाद-संवाद परंपरा से लेकर गार्गी-याज्ञवल्क्य, आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ तक भारतीय सभ्यता ने असहमति को संघर्ष नहीं, बल्कि ज्ञान-विस्तार का माध्यम माना है।
दुर्भाग्य से, कुछ राजनीतिक वर्ग इस सहिष्णुता को सनातन की कमजोरी समझ बैठते हैं। यही राजनीतिक दल कट्टरपंथी विचारधाराओं के विरुद्ध कुछ भी नहीं बोलते। वहाँ विरोध करने पर हिंसक प्रतिक्रियाओं का भय रहता है। “गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा” जैसे कट्टर नारों पर तथाकथित पंथनिरपेक्ष और प्रगतिशील राजनीति प्रायः मौन दिखाई देती है। यह मौन केवल संयोग नहीं, बल्कि तुष्टीकरण की राजनीति का परिचायक है।
मानव सभ्यता के लिए सनातन धर्म का महत्व
आज विश्व आतंकवाद, हिंसा, युद्ध, सांस्कृतिक असहिष्णुता और सामाजिक विघटन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में एक संतुलित और टिकाऊ समाधान के लिए एक ऐसा विचार चाहिए जो समावेशी, सहिष्णु, उदार और सर्वकल्याणकारी हो। मानव सभ्यता की रक्षा के लिए यह मार्ग सनातन के द्वार से ही निकलेगा। सनातन धर्म को मिटाने या उसकी अवमानना करने वालों को यह बात ठीक से समझ लेनी चाहिए।

















