राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : 'नवाचार के साथ बचाएं शाश्वत मूल्यों को'’
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होम संघ @100 पंच परिवर्तन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : ‘नवाचार के साथ बचाएं शाश्वत मूल्यों को’’

भारत की प्रत्येक भाषा राष्ट्रीय भाषा है, जबकि कुछ भारतीय भाषाएं संपर्क भाषा के रूप में संवाद को सुगम बनाती हैं। संघ की प्रार्थना, आज्ञाएं और वाद्य परंपरा संस्कृत साहित्य, भारतीय रागों और स्वदेशी सांस्कृतिक विरासत से प्रेरित हैं।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 31, 2026, 01:24 pm IST
in पंच परिवर्तन, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण, संघ @100
दत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह , रा.स्व.संघ

दत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह , रा.स्व.संघ

भारत की प्रत्येक भाषा राष्ट्रीय भाषा है, जबकि कुछ भारतीय भाषाएं संपर्क भाषा के रूप में संवाद को सुगम बनाती हैं। संघ की प्रार्थना, आज्ञाएं और वाद्य परंपरा संस्कृत साहित्य, भारतीय रागों और स्वदेशी सांस्कृतिक विरासत से प्रेरित हैं। भारत सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचारों का स्वागत करता है, किंतु अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है।

आधुनिकीकरण को केवल पाश्चात्यकरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक आधुनिकता नवाचार को अपनाने के साथ-साथ शाश्वत सभ्यतागत मूल्यों को बनाए रखने में है। संघ की स्थापना इन्हीं स्थायी सांस्कृतिक मूल्यों के पुनर्जागरण तथा स्वतंत्रता के दशकों बाद भी संस्थानों और बौद्धिक विमर्शों पर प्रभाव डाल रही औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के उद्देश्य से हुई थी।

भगवान राम उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने के प्रतीक हैं, भगवान कृष्ण पूर्व और पश्चिम को जोड़ते हैं, जबकि शिव तत्व सम्पूर्ण भारत की एकात्म चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। भाषा, परंपरा और जीवनशैली की विविधता समाज को विभाजित करने के बजाय उसे और सशक्त बनाती है, क्योंकि साझा सांस्कृतिक चेतना राष्ट्र को एक सूत्र में बांधती है।

संतुलित विकास के लिए व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र दोनों आवश्यक हैं। भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक मूल्यों का उन्नयन साथ-साथ चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि भौतिक आवश्यकताएं पूरी न हों तो सांस्कृतिक विमर्श अधूरा रह जाता है। राज्य को सभी उपासना पद्धतियों के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए और धार्मिक मामलों में तुष्टिकरण के बजाय निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए।

जो भी व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से राष्ट्र के लिए कार्य करता है, वही स्वयंसेवक की भावना का प्रतिनिधित्व करता है, चाहे उसका औपचारिक संगठनात्मक संबंध हो या नहीं। भारत की सभ्यतागत दृष्टि मानवता के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है और नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित सामूहिक प्रयास ही एक सशक्त और समरस राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
-दत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह (गुवाहाटी के युवा सम्मेलन में 22 मार्च, 2026)

 

 

Topics: शताब्दी वर्षसर्वकल्याणपरिवार प्रबोधनसाधना और कल्याणसंगठित शक्तिसामाजिक समरसतापर्यावरणकुटुंब प्रबोधनसर्वे भवन्तु सुखिनः'समाज परिवर्तनपाञ्चजन्य  विशेषस्वदेशीनागरिक कर्तव्य और सामाजिक समरसताविविधता में एकतासंस्कारों की पाठशालापंच परिवर्तनविश्व पटल पर हिंदुत्व
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