इस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब मार्च 2026 में होली के समय दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में हिंदू युवक तरुण खटीक की हत्या उसके पड़ोस में रहने वाले मुसलमानों ने घेरकर कर दी थी। तरुण की हत्या इस बात पर की गई थी कि उसकी चचेरी बहन से गलती से पड़ोस की मुस्लिम महिला पर पानी के कुछ छींटे पड़ गए थे। हाल ही में गाजियाबाद के खोड़ा इलाके में बकरीद के दिन असद नाम के युवक ने अपने पिता और चार दोस्तों के साथ मिलकर 17 वर्षीय सूर्या प्रताप चौहान की नृशंस तरीके से हत्या कर दी। सूर्या ने इसी साल 10वीं की परीक्षा दी थी। उसके पिता की दो वर्ष पहले मृत्यु हो चुकी है। परिवार में एक बड़ा भाई और एक बहन हैं। वह नवनीत विहार इलाके का रहने वाला था।
सुनियोजित हत्या की साजिश
पुलिस की जांच के अनुसार, असद और सूर्या के बीच बाइक चलाने को लेकर कुछ विवाद हुआ था। घटना वाले दिन भी दोनों के बीच कुछ बहस हुई थी। इसके बाद असद ने अपने पिता नवाब, दोस्त फरहान, आतिफ, सारिक और अन्य साथियों को इसकी जानकारी दी।
सबने मिलकर उसकी हत्या करने की साजिश रची, इसके तहत पहले उसे समझाैता करने के लिए फोन करके घर से बुलाया गया। फिर घेरकर उसे चाकुओं से वार कर मौत के घाट उतार दिया गया। बिल्कुल उसी तरह जैसे बकरे को हलाल किया जाता है। सूर्या के दोस्त विक्की ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि असद ने सूर्या को मारने से पहले उससे पूछा, “क्या कभी बकरा हलाल होते देखा है?” इसके बाद आरोपियों ने सूर्या को चारों तरफ से घेर लिया। उस पर ताबड़तोड़ चाकू से कई वार किए गए। इसके बाद सभी वहां से भाग निकले। गंभीर रूप से घायल सूर्या को नोएडा के फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। यह हत्या बकरीद के दिन हुई, मुसलमानों में इस दिन कुर्बानी का रिवाज होता है। सरेआम एक युवक को बकरे की तरह ‘हलाल’ करने की क्रूरता ने घटना को और अधिक संवेदनशील बना दिया। पुलिस जांच में सामने आया कि फरहान ने चाकू उपलब्ध कराया और असद के अब्बा नवाब ने आरोपियों को उकसाया।
हत्याकांड के बाद सभी आरोपी फरार हो गए। पुलिस ने मुख्य आरोपी असद पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया। बाद में इंदिरापुरम में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में वह मारा गया। इस मामले में असद के अब्बा नवाब उसके साथ हत्या में शामिल फरहान और आतिफ और सारिक मेवाती को गिरफ्तार कर लिया गया है। आतिफ पीलीभीत का रहने वाला था, जहां उसका परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभार्थी रहा है। फरहान का परिवार पहले से आपराधिक पृष्ठभूमि वाला रहा है। उसके पिता और उसके भाइयों पर कई आपराधिक मामले पहले से दर्ज बताए जाते हैं।
प्रशासनिक सख्ती
प्रशासन ने ‘ऑपरेशन क्लीन स्वीप’ चलाया। खोड़ा क्षेत्र में तीन दिन तक ड्रोन, स्नाइपर डॉग्स और भारी पुलिस बल के साथ छापेमारी की गई। करीब 1600 अपराधियों का सत्यापन किया गया। असद के पिता नवाब के घर पर नोटिस चस्पा किया गया। इलाके के तीन मदरसों (रहमानिया, सुलताना अलअरफीन और तालीमत उलूम) को सील किया गया क्योंकि उनके पास आवश्यक पंजीकृत दस्तावेज नहीं थे। इस घटना के बाद से गाजियाबाद के अन्य थाना क्षेत्रों में अवैध तरीके से बनाए गए मदरसों के खिलाफ भी लगातार अभियान चलाया जा रहा है।
समाज के सामने खड़े सवाल
इस जघन्य घटना पर व्यापक निंदा की अपेक्षा थी, खासकर मुस्लिम समाज से। लेकिन यदि एक दो लोगाें की बात छोड़ दें तो किसी ने इसकी निंदा नहीं की। यहां तक कि स्थानीय मुसलमानों ने घटना के संबंध में अनभिज्ञता तक जता दी। हां, मदरसों पर की गई प्रशासनिक कार्रवाई कर उन्होंने जरूर सवाल खड़े किए।
ये वही मुसलमान हैं जो हजारों किलोमीटर दूर स्थित ईरान, फिलिस्तीन और अन्य मुस्लिम देशों में होने वाली घटनाओं को लेकर भारत की सड़कों पर उतर आते हैं, प्रदर्शन करते हैं, लेकिन जब बकरीद के दिन उनके क्षेत्र में एक हिंदू युवक को नृशंसता से मार दिया जाता है, तो चुप्पी साध लेते हैं।
अपराध एक व्यक्ति का होता है, किसी समुदाय का नहीं। लेकिन जब अपराधी किसी खास पृष्ठभूमि से बार-बार सामने आते हैं और उनका समुदाय चुप रहता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे अपराधियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। जिस समुदाय से वे आते हैं, उस समुदाय के लोगों को भी ऐसे अपराधियों का विरोध करने की जरूरत है। समाज में विश्वास और सौहार्द तभी कायम रह सकता है, जब हर वर्ग अपराध और हिंसा के खिलाफ एक समान आवाज उठाए। निर्दोष व्यक्ति के साथ हुई बर्बरता पर चुप्पी साध लेना न्याय और मानवता दोनों के खिलाफ है।
न्याय और सद्भाव की राह
इस बर्बर हत्याकांड ने अपराध नियंत्रण, पुलिस की त्वरित कार्रवाई और सामाजिक जिम्मेदारी के कई पहलुओं को उजागर किया है। योगी सरकार की सख्ती और ‘ऑपरेशन क्लीन स्वीप’ जैसे कदम सराहनीय हैं। लेकिन इस तरह की हिंसक प्रवृत्ति को रोकने के लिए शिक्षा, जागरूकता और सुदृढ़ कानून-व्यवस्था को साथ-साथ चलना होगा।
हर अपराधी को कानून का भय होना चाहिए, चाहे वह किसी भी समुदाय का हो। साथ ही समाज को अपने भीतर मौजूद असामाजिक तत्वों के खिलाफ खड़े होने का साहस भी दिखाना चाहिए। ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए गंभीर विमर्श और सामाजिक आत्ममंथन आवश्यक है।
















