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होम भारत

‘महंगाई काबू में और देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत स्थिति में’- प्रो. गौरव वल्लभ

महंगाई, रुपये की गिरावट और वैश्विक संकट के बीच भारत की अर्थव्यवस्था

Written byतृप्ति श्रीवास्तवतृप्ति श्रीवास्तव
Jun 3, 2026, 12:59 pm IST
inभारत, साक्षात्कार

आज भारत में पेट्रोल, डीजल, दूध, ईएमआई और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी आम आदमी की चिंता का विषय बनी हुई है। वैश्विक स्तर पर युद्ध, सप्लाई चेन में बाधाएं और भू-राजनीतिक तनाव भी भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों से संयम और स्मार्ट आर्थिक व्यवहार अपनाने की अपील की गई। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था किसी बड़े संकट की ओर बढ़ रही है, या फिर यह परिस्थिति भारत के लिए ‘आपदा में अवसर’ साबित हो सकती है। इन्हीं मुद्दों पर प्रोफेसर ऑफ फाइनेंस और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य  प्रो. गौरव वल्लभ से पाञ्चजन्य सहयोगी तृप्ति श्रीवास्तव ने बातचीत की

क्या भारत आर्थिक संकट के कगार पर है?
भारत किसी बड़े आर्थिक संकट में नहीं है। मौजूदा दबाव वैश्विक परिस्थितियों के कारण है, न कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल कमजोरी के कारण।

वर्तमान आर्थिक दबाव के पीछे तीन प्रमुख वैश्विक कारण हैं। पहला, पश्चिम एशिया संकट, जिसमें ईरान, अमेरिका और एज्राएल से जुड़ा तनाव शामिल है। दूसरा, रूस-यूक्रेन युद्ध, जिसका असर अब भी यूरोप की अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है। तीसरा, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता आर्थिक तनाव, विशेषकर कमोडिटी और व्यापार से जुड़े मुद्दों को लेकर।

इन वैश्विक घटनाओं के कारण समुद्री मार्ग, सप्लाई चेन, बीमा लागत और परिवहन लागत प्रभावित हुई हैं। इसका असर कच्चे तेल, सोना, मोबाइल, कागज, कपास और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ा है।

भारत के आयात पर दबाव क्यों बढ़ा है?
भारत के कुल आयात बिल में कच्चे तेल और सोने की बड़ी हिस्सेदारी है। भारत अपने कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 87 प्रतिशत आयात करता है और नए सोने का लगभग 99 प्रतिशत आयात होता है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि के कारण भारत का आयात बिल बढ़ता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो भारत को उसी मात्रा के तेल के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील “पैनिक” नहीं, बल्कि “प्रिपेयर्डनेस” यानी तैयारी की रणनीति है।

प्रधानमंत्री की अपील का अर्थ क्या है?
प्रधानमंत्री की अपील का अर्थ यह नहीं है कि लोगों पर खर्च या खरीदारी की रोक लगाई जा रही है। बल्कि यह एक प्रिवेंटिव इकोनॉमिक मॉडल (संकट आने से पहले ही समाधान करके अर्थव्यवस्था को नुकसान से बचाना) है, जिसमें नागरिकों से कहा जा रहा है कि वे विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने के लिए कुछ बेहतर विकल्प अपनाएं।

उदाहरण के लिए, सप्ताह में एक दिन सार्वजनिक परिवहन का उपयोग किया जा सकता है। लोग कार-पूलिंग कर सकते हैं। अनावश्यक यात्राएं कम की जा सकती हैं। कुछ बैठकें ऑनलाइन की जा सकती हैं। विदेशी पर्यटन की जगह घरेलू पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
सोने की निवेश-खरीद को कुछ समय के लिए टाला जा सकता
है। यदि नागरिक ऐसे छोटे-छोटे बदलावों से आयात बिल में 10 प्रतिशत भी बचत कर दें, तो इसका देश पर बड़ा सकारात्मक असर पड़ सकता है।

निवेश के तौर पर सोना खरीदने को लेकर क्या सलाह है?
भारतीय समाज में सोना निवेश और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, लेकिन जब दुनिया में युद्ध या अनिश्चितता बढ़ती है, तो सोने की कीमतें बढ़ जाती हैं, क्योंकि इसे सुरक्षित निवेश माना जाता है।

निवेश का मूल सिद्धांत है कि कम कीमत पर खरीदें और ऊंची कीमत पर बेचें। इसलिए यदि कोई व्यक्ति केवल निवेश के लिए सोना खरीदना चाहता है, तो वह कुछ समय रुककर खरीदारी करे। ऐसा इसलिए, क्योंकि जब वैश्विक अनिश्चितता कम होगी, तो सोने की कीमतें घट सकती हैं।

हालांकि शादी-विवाह या पारिवारिक आवश्यकता के लिए सोना खरीदने पर कोई रोक नहीं है। यह सलाह केवल उनके लिए है, जो निवेश के उद्देश्य से सोना खरीदना चाहते हैं।

विदेश यात्रा की बजाय घरेलू पर्यटन पर जोर क्यों दिया जा रहा है?
प्रधानमंत्री ने विदेशी यात्राओं को कम करने और घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की अपील की है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि विदेश यात्रा पर कोई प्रतिबंध है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति विदेश घूमने की जगह भारत में ही शिलांग, उदयपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, उत्तर-पूर्व या छत्तीसगढ़ जैसी जगहों पर जाता है, तो इससे दो लाभ होंगे। पहला, विदेशी मुद्रा की बचत होगी। दूसरा, घरेलू पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

रुपये की गिरावट को कैसे देखा जाना चाहिए?
यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक घटना है, लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है। वर्तमान परिस्थितियों में दुनिया की लगभग सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं दबाव में हैं। रुपये की कमजोरी मुख्य रूप से वैश्विक अनिश्चितता और कच्चे तेल के आयात बिल के कारण है। जैसे ही वैश्विक स्थिति स्थिर होगी या दुनिया इस परिस्थिति के साथ जीने की आदी हो जाएगी, रुपये की स्थिति बेहतर हो सकती है। भारत ने रुपये को संभालने के लिए “मैनेज्ड फ्लेक्सिबिलिटी विद बैलेंस्ड अप्रोच” यानी संतुलित नीति अपनाई है। सरकार और रिजर्व बैंक हर दिन बाजार में दखल नहीं देते, लेकिन जब रुपये पर ज्यादा दबाव बढ़ता है, तब जरूरत के अनुसार कदम उठाए जाते हैं, ताकि स्थिति नियंत्रण में बनी रहे।

भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बताने वाले प्रमुख आधार क्या हैं?
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। दुनिया की बड़ी संस्थाएं भी भारत की आर्थिक वृद्धि को मजबूत मान रही हैं। महंगाई काबू में है और देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत स्थिति में है।
जनधन योजना, मुद्रा लोन, यूपीआई और जीएसटी जैसे सुधारों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। स्टार्टअप और यूनिकॉर्न कंपनियों की बढ़ती संख्या भी आर्थिक ताकत को दर्शाती है। पिछले वर्षों में हुए सुधार, देश की बड़ी घरेलू मांग और लोगों की भागीदारी ने भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया है।

 डीडॉलराइजेशन और स्थानीय मुद्रा में व्यापार को आप कैसे देखते हैं?
ब्रिक्स और अन्य मंचों पर डीडॉलराइजेशन यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा हो रही है। हर देश चाहता है कि उसकी मुद्रा मजबूत हो और व्यापार उसकी अपनी मुद्रा में हो। भारत भी रुपये में व्यापार को बढ़ावा देना चाहता है। हालांकि रुपये पर मौजूदा दबाव का मुख्य कारण डीडॉलराइजेशन नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव और आयात बिल में वृद्धि है।

अमेरिका और विकसित देशों की तुलना में भारत की स्थिति बेहतर क्यों मानी जा रही है?
वैश्विक एजेंसियां अमेरिका, यूरोप और जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए कम विकास दर का अनुमान लगा रही हैं, जबकि भारत के लिए अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि का अनुमान है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं। पहला, भारत की बड़ी घरेलू खपत। दूसरा, लगातार आर्थिक सुधार। तीसरा, आर्थिक ढांचे की मजबूती। भारत एक कंजम्पशन-ड्रिवन इकॉनमी (उपभोग-आधारित अर्थव्यवस्था) है। इसमें देश की तरक्की का बड़ा आधार लोगों की खरीदारी और रोजमर्रा के खर्च होते हैं। जब लोग ज्यादा सामान खरीदते हैं और सेवाओं पर खर्च करते हैं, तो बाजार और अर्थव्यवस्था दोनों तेजी से बढ़ते हैं। देश के 140 करोड़ लोगों की मांग खुद अर्थव्यवस्था को गति देती है।

आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक बाजार के बीच संतुलन कैसे होना चाहिए?
भारत को बंद अर्थव्यवस्था नहीं बनना चाहिए। भारत के लिए सही रास्ता है – स्ट्रेटेजिक ग्लोबलाइजेशन प्लस सेलेक्टिव सेल्फ रिलायंस (रणनीतिक वैश्वीकरण और चयनात्मक आत्मनिर्भरता)। अर्थात जहां लाभकारी हो, वहां भारत को वैश्विक बाजार से जुड़ा रहना चाहिए, लेकिन कुछ रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ानी चाहिए। कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना, इथेनॉल ब्लेंडिंग, इलेक्ट्रिक वाहन, सार्वजनिक परिवहन, वैकल्पिक ईंधन और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य आयात बिल को धीरे-धीरे कम करना है।

 भारत के लिए आने वाले 10 वर्ष में संभावनाओं वाले क्षेत्र कौन-से हैं?
आने वाले 10 वर्ष में कई क्षेत्र संभावनाओं से भरे हुए हैं। सबसे पहला क्षेत्र डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग (रक्षा विनिर्माण) है। भारत में रक्षा उत्पादन तेजी से बढ़ सकता है। दूसरा क्षेत्र वैकल्पिक ईंधन का है। इसमें हाइड्रोजन, रिन्यूएबल ऊर्जा (नवीकरणीय ऊर्जा), ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन) और बैटरी तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। तीसरा क्षेत्र छोटे न्यूक्लियर पावर स्टेशन (परमाणु ऊर्जा केंद्र) हैं, जो भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम हो सकते हैं। चौथा क्षेत्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का है। भारत के पास बड़ा उपभोक्ता आधार और विशाल डेटा है, इसलिए इस क्षेत्र में काफी संभावनाएं हैं। पांचवां क्षेत्र सेमीकंडक्टर और चिप मैन्युफैक्चरिंग (अर्धचालक और चिप निर्माण) का है, जहां केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि बौद्धिक क्षमता भी जरूरी होगी। छठा क्षेत्र पर्यटन का है। उत्तर-पूर्व, छत्तीसगढ़ और भारत के अन्य क्षेत्रों में पर्यटन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। सातवां क्षेत्र ऑरेंज इकॉनमी (रचनात्मक एवं सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था) का है। इसमें कंटेंट क्रिएशन (सामग्री निर्माण), भारतीय संस्कृति, भोजन, परिवार व्यवस्था, परंपरा और धार्मिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जुड़ी अर्थव्यवस्था को बड़ा अवसर माना जा रहा है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों का बोझ आम आदमी पर कितना पड़ रहा है?
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम अपेक्षाकृत कम बढ़े हैं। कीमतों का बोझ तीन स्तरों पर बांटा जाता है। पहला, सरकार। दूसरा, ऑयल मार्केटिंग कंपनियां। तीसरा, उपभोक्ता। सरकार और तेल कंपनियों ने पहले ही बड़ा हिस्सा अपने ऊपर लिया है, इसलिए उपभोक्ताओं पर पूरा बोझ नहीं डाला गया। सरकार आम आदमी की जीवन गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ने देगी।

Topics: अर्थव्यवस्थावित्तीय स्थितिविदेशी मुद्रा भंडारकच्चे तेलडॉलरसोना आयातupiचयनात्मक आत्मनिर्भरतामहंगाईअंतर्राष्ट्रीय व्यापावैश्विक व्यापारवैश्विक अनिश्चितताGSTडिजिटल भुगतानJan Dhan Yojanaपाञ्चजन्य विशेषस्टार्टअप्ससप्लाई चेन
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