जनजाति सांस्कृतिक समागम के दौरान पाञ्चजन्य संवाददाता नैन्सी बाजपेई ने पद्मश्री बुधरी ताती से बातचीत की। जनजाति सुरक्षा मंच से जुड़ीं बुधरी ताती लंबे समय से बस्तर के जनजातीय समाज के बीच काम कर रही हैं। उन्होंने जनजातीय समाज की चुनौतियों, नक्सलवाद, कन्वर्जन, आयुर्वेद जैसे विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं उनसे संवाद के प्रमुख अंश-
जनजाति सांस्कृतिक समागम में देशभर से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे, इसकी आवश्यकता क्या थी?
देशभर के जनजातीय समाज में अब अपने अधिकारों और पहचान को लेकर जागरूकता बढ़ी है। मैं 21 मई को बस्तर से निकली। हमारे साथ लगभग डेढ़ हजार लोग ट्रेन से दिल्ली आए। इनमें बुजुर्ग, महिलाएं, युवा सभी शामिल थे। कई लोग पहली बार अपने गांव से बाहर निकले। जब मैंने उनसे पूछा कि दिल्ली क्यों जा रहे हो, तो उन्होंने कहा कि हम अपने समाज, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा के लिए जा रहे हैं। यह देखकर लगा कि समाज अब जागरूक हो रहा है।
जनजातीय समाज की प्रमुख मांगें क्या हैं?
जनजातीय समाज चाहता है कि उसकी परंपराएं, देवी-देवता, लोककथाएं, लोकनृत्य और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे। आज कई लोग समाज को बरगलाकर उसकी जड़ों से दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर आज हम अपनी परंपराओं और संस्कृति के लिए आवाज नहीं उठाएंगे, तो धीरे-धीरे सब खत्म हो जाएगा।
क्या जनजातीय समाज को लगता है कि उनकी सुविधाएं और अधिकार उन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं?
हां, लोगों में यह भावना है कि जनजातीय समाज के लिए जो योजनाएं और सुविधाएं आती हैं, उनका पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल पाता। आरक्षण और दूसरी सुविधाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचे, यह समाज की बड़ी मांग है। समाज का कहना है कि जनजातियों के अधिकार और सुविधाएं उन्हीं तक सीमित रहें, जिनके लिए वे बनाई गई हैं। ‘डीलिस्टिंग’ को लेकर भी लोगों में चर्चा और जागरूकता बढ़ी है। लोग चाहते हैं कि जो अधिकार जनजातीय समाज के लिए निर्धारित हैं, वे वास्तव में उन्हीं तक पहुंचें।
आपके अनुसार जनजाति समुदाय को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए क्या करना चाहिए?
जनजातीय समाज की मांग है कि उनके लिए निर्धारित अधिकार, आरक्षण और सुविधाओं का लाभ केवल वास्तविक जनजातीय समुदाय तक पहुंचे। इसी उद्देश्य से देशभर के विभिन्न राज्यों से लोग दिल्ली में एकत्र हुए। उनका कहना है कि वे मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और आस्था को खोकर नहीं।
देश के सभी जनजातीय क्षेत्रों में लोगों ने सदियों से अपनी संस्कृति और परंपराओं को सुरक्षित रखा है। लेकिन अब कई ताकतें लोगों को उनकी जड़ों से दूर करने और उन्हें बरगलाने का प्रयास कर रही हैं। जो लोग अपनी परंपराओं से दूर हो रहे हैं, वे धीरे-धीरे अपनी पहचान भी खोते जा रहे हैं। जनजातीय समाज की लोककथाएं, लोकनृत्य, देवी-देवता, पारंपरिक कलाएं और सांस्कृतिक मूल्य ही उन्हें मुख्यधारा से जोड़े रखते हैं। अगर आज इनके संरक्षण के लिए आवाज नहीं उठाई गई, तो आने वाले समय में यह विरासत धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है। इसलिए समाज अब अपनी संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए संगठित होकर आवाज उठा रहा है।
नक्सलवाद खत्म होने के बाद बस्तर में क्या बदलाव दिखाई दे रहा है?
पहले नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को रोकने की कोशिश की जाती थी। पुल, सड़क, स्कूल, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का विरोध किया जाता था। यहां तक कि बच्चों की शिक्षा तक प्रभावित होती थी, क्योंकि स्कूल बनने नहीं दिए जाते थे। लोगों के बीच भय और असुरक्षा का माहौल बना रहता था। अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। नक्सलवाद के प्रभाव में कमी आने के बाद लोगों को लगने लगा है कि उनका क्षेत्र सुरक्षित हो रहा है। आज बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक खुलकर कह रहे हैं कि वे अब चैन की नींद सो पा रहे हैं। पहले विकास और सामान्य जीवन दोनों पर डर का साया था, लेकिन अब लोगों में भरोसा बढ़ा है कि उनके क्षेत्र में सुरक्षा और विकास दोनों संभव हैं। सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी सुविधाएं अब जनजातीय क्षेत्रों तक पहुंच रही हैं, जिससे लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है।
क्या आपको लगता है कि अगर नक्सलवाद नहीं होता तो आज इतनी बड़ी संख्या में बस्तर के जनजाति समाज के लोगों को दिल्ली आने की जरूरत नहीं पड़ती?
यह बात काफी हद तक सही है। पहले लोगों में भय और दबाव था, इसलिए वे खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते थे। अब गृहमंत्री अमित शाह के संकल्प से नक्सल-मुक्त भारत हुआ है, तो समाज खुलकर अपने अधिकारों और संस्कृति की बात कर पा रहा है। लोगों में आत्मविश्वास आया है।
छत्तीसगढ़ में कन्वर्जन को लेकर लगातार चर्चा होती है। इसे आप किस रूप में देखती हैं?
हम 1984 से समाज के बीच काम कर रहे हैं। कई जगह शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर लोगों को प्रभावित कर ईसाई मिशनरियों द्वारा कन्वर्जन किया जाता रहा है। लोगों से कहा जाता है कि उनके पास जाने से बीमारी दूर हो जाएगी, परिवार संपन्न हो जाएगा। लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है। यह जनजाति समुदाय के लोगों को उनकी परंपराओं, देवी-देवताओं और संस्कृति से दूर करने का प्रयास है।
क्या समाज में अब कन्वर्जन को लेकर जागरूकता बढ़ी है?
हां, अब लोगों में जागरूकता बढ़ रही है। जिस तरह नक्सलवाद के खिलाफ माहौल बना, उसी तरह अब समाज अपनी संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए भी खड़ा हो रहा है। मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में इसमें बड़ा बदलाव दिखाई देगा। जैसे देश नक्सल-मुक्त हुआ है, वैसे ही जल्द देश कन्वर्जन-मुक्त भी होगा।
कन्वर्जन और आरक्षण को लेकर सर्वोच्च न्यायाल की टिप्पणी के बाद क्या जनजातीय समाज में कोई बदलाव दिखाई दे रहा है?
मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर अब समाज में जागरूकता बढ़ रही है और आने वाले समय में इसका बड़ा प्रभाव दिखाई देगा। पहले लोगों के मन में इस तरह की व्यापक सोच नहीं थी, लेकिन अब जनजातीय समाज अपने अधिकारों, पहचान और भविष्य को लेकर गंभीरता से सोचने लगा है।
आपने आयुर्वेद और पारंपरिक उपचार पद्धतियों पर भी काम किया है। उसका अनुभव कैसा रहा?
हमारे जंगलों में कई प्रकार की औषधियां उपलब्ध हैं। हमने पीलिया, एनीमिया और कमजोरी जैसी समस्याओं में पारंपरिक उपचार और पोषण के जरिए लोगों को स्वस्थ होते देखा है। कई महिलाओं ने गांवों में अंकुरित अनाज, जड़ी-बूटियों और पारंपरिक खानपान के जरिए लोगों की मदद की है।
आज के समय में आयुर्वेद और प्राकृतिक जीवनशैली कितनी महत्वपूर्ण है?
आज लोग प्राकृतिक जीवनशैली से दूर हो गए हैं। पहले लोग जंगल, मिट्टी और प्राकृतिक चीजों से जुड़े रहते थे, इसलिए कम बीमार पड़ते थे। अब जरूरत है कि लोग फिर से आयुर्वेद, प्राकृतिक भोजन और पारंपरिक जीवनशैली की ओर लौटें। इससे स्वास्थ्य बेहतर रहेगा और अनावश्यक दवाइयों पर निर्भरता भी कम होगी।


















