उस दिन भीषण गर्मी थी। इसके बाद भी नागालैंड से आए जनजातियों का एक समूह ‘जय श्रीराम’, ‘वन्देमातरम्’ जैसे नारों के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा था। समूह का नेतृत्व करने वाले युवा जादोनांग की आकर्षक आवाज और हवा में उछलती बंद मुट्ठी बाकी युवाओं का जोश बढ़ा रही थी। उसे जो भी देख रहा था, वही चकित हो रहा था। लोग सवाल कर रहे थे क्या अभी भी नागालैंड में श्रीराम के भक्त हैं! जादोनांग का जवाब बहुत ही लाजवाब था। उन्होंने कहा,‘सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा मत करो। एक बार नागालैंड आओ। हम सब भी आप लोगों की तरह ही श्रीराम के वंशज हैं, लेकिन हमारे बहुत सारे लोगों को उनसे दूर कर दिया गया है। यह बताने के लिए हम लोग दिल्ली आए हैं।’
उस जत्थे के जाने के बाद छत्तीसगढ़ से आए जनजातियों का एक समूह ‘जो भोले नाथ का नहीं, वह हमारी जात का नहीं’, ‘संस्कृति बचेगी, तो हम बचेंगे’ जैसे नारों के साथ आगे बढ़ता दिखाई दिया।
‘…कोई किसी का धर्म परिवर्तन नहीं करा सकता’

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जनजातीय सांस्कृतिक समागम को संबोधित किया। प्रस्तुत हैं उसके मुख्यांश-
यह समागम जनजातियों के महाकुंभ और उनके अस्तित्व, अस्मिता और संस्कृति के आंदोलन को नई पहचान देने के रूप में जाना जाएगा। मैंने भगवान बिरसा मुंडा को नहीं देखा, लेकिन आज यहां उपस्थित जनजातियों में उनकी छवि दिख रही है, मैं उनको नमन करता हूं। भगवान बिरसा मुंडा ने जल, जंगल और जमीन को संरक्षित करने का सार्वभौमिक कार्य किया। प्रकृति पूजा ही सनातन संस्कृति का मूल आधार है। मोदी सरकार के गृह मंत्री के नाते मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि यूसीसी की कोई पाबंदी वनवासी समाज पर नहीं लगेगी और इससे वनवासी के किसी भी अधिकार का अतिक्रमण नहीं होगा। हमने गुजरात और उत्तराखंड में यूसीसी लागू किया है और विशेष प्रावधान कर यूसीसी से सारी जनजातियों को बाहर रखने का काम नरेन्द्र मोदी सरकार ने किया है।
हमारे संविधान निर्माताओं ने हर व्यक्ति को अपने मूल धर्म में सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया है। कोई किसी का धर्म-परिवर्तन नहीं करा सकता। भारत सरकार बिरसा मुंडा, रानी दुर्गावती, टंट्या भील, सिद्धू-कान्हू, अल्लूरी सीताराम राजू और अनेक जनजातीय वीरों के सम्मान में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रही है। जनजातीय समाज को उसकी जड़ों से काटने वाली शक्तियों के विरुद्ध सांस्कृतिक जागरूकता और संगठन आवश्यक है। वनवासी अगर ठान लें कि धर्म की रक्षा करने का संकल्प आज यहां लेना है तो यही संकल्प हमें हमारी संस्कृति और देश से जोड़कर रखेगा। ‘तू और मैं एक रक्त’-इसी मंत्र के साथ वनवासी कल्याण आश्रम ने मूक-सेवक बनकर जनजातीय सेवा का अखंड यज्ञ चलाया है। हमारी संस्कृति, हमारी भूमि, हमारे धर्म को सुरक्षित करने के लिए यह महाकुंभ बहुत बड़ा काम करेगा। हम भ्रांतियों से बचें, भेदभाव करने वालों को पहचानें और एकजुट होकर 2047 में विकसित और समृद्ध भारत बनाने की दिशा में आगे बढ़ें।
यह नजारा था 24 मई को दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिला मैदान में आयोजित ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ का। मैदान में जिस तेजी से गर्म हवाएं चल रही थीं, उससे भी अधिक तेज यह नारा गूंज रहा था-‘वनवासी-नगरवासी, सभी भारतवासी।’ इसके साथ ही रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा से सजे-धजे जनजातीय समाज के लोग ढोल-मांदर की थाप पर झूम रहे थे। कहीं पूर्वोत्तर की संस्कृति अपनी विशिष्ट छटा बिखेर रही थी, तो कहीं मध्य भारत के वनांचलों की लोकपरंपराएं आकर्षण का केंद्र बनी हुई थीं। कहीं अंदमान निकोबार द्वीप समूह से आए लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान बता रहे थे। भाषाएं अलग थीं, वेश अलग थे, लोकगीत और परंपराएं भी भिन्न थीं, लेकिन सबके मन में एक ही भाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था, अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और राष्ट्र के प्रति अटूट गौरव का भाव।

भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ और ‘जनजाति जागृति समिति’ द्वारा आयोजित इस समागम में आए 1,50,000 से अधिक जनजातियों ने संदेश दिया कि वे भले ही पहाड़ और जंगल में रहते हैं, लेकिन वे सांस्कृतिक और पारंपरिक रूप से सजग हो चुके हैं और उनकी आवाज को अनसुनी नहीं की जा सकती। और सबसे बड़ी बात यह रही कि दिल्ली के लोगों ने उन जनजातियों का स्वागत खुलकर किया। उनके आतिथ्य के लिए दिल्ली वासियों ने अपने दैनिक कामकाज को छोड़कर दिन-रात मेहनत की। किसी ने उनके लिए भोजन की व्यवस्था की, किसी ने आवास की, किसी ने परिवहन की, तो किसी ने उन्हें दिल्ली दर्शन कराने की जिम्मेदारी ली।
आतिथ्य से गद्गद् त्रिपुरा से आए राजाबासी नौतिया कहते हैं, “50 साल की उम्र में पहली बार ट्रेन में बैठने का मौका मिला। ढाई दिन में दिल्ली पहुंचा। मन में दिल्ली और दिल्ली के लोगों के लिए अनेक सवाल उठ रहे थे, लेकिन दिल्ली के लोगों ने मेरा मन जीत लिया। त्रिपुरा से दिल्ली बहुत दूर है। इस कारण अनेक भ्रम भी पैदा होते रहते हैं, लेकिन वे भ्रम भी टूट गए। पहली बार दिल्ली अपनी लगी।” यानी ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ ने राजाबासी नौतिया जैसे हजारों लोगों को अपनेपन का अहसास कराया। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता रही।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह। उन्होंने यूसीसी आदि पर विचार रखे। (देखें बाॅक्स) यूसीसी पर अमित शाह के आश्वासन के बाद बहुत देर तक सभा स्थल पर तालियां बजती रहीं। तालियां बजाने वालों में एक थे हेमलाल मुर्मू। ओडिशा से आए हेमलाल कहते हैं,“यूसीसी को लेकर जनजातियों के बीच भ्रम पैदा किया जा रहा है कि इससे तुम्हारी सदियों पुरानी परंपरा खत्म हो जाएगी। आज गृृहमंत्री के मुंह से यह सुनकर बहुत अच्छा लगा कि यूसीसी से जनजातियों को कोई खतरा नहीं है।”

इससे पहले समागम को संबोधित करते हुए वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा, “भगवान बिरसा मुंडा ने जब देखा कि ब्रिटिश सरकार और चर्च दोनों, हमारी संस्कृति को समाप्त कर रहे हैं, तब उन्होंने कन्वर्जन रोकने का संकल्प लिया और अंग्रेजों से संघर्ष किया। आज जनजाति समाज को भगवान बिरसा के जीवन से प्रेरणा लेकर कन्वर्जन और कुरीतियों का विरोध करना चाहिए।” उन्होंने कहा, “भगवान बिरसा कहते थे कि ईसाइयों के मोहजाल में मत पड़ो। आज पूरे वनवासी समाज को उनकी यह बात ध्यान में रखकर आगे बढ़ना है।” उन्होंने कहा,“सनातन समाज का वीर है जनजातीय समाज, लेकिन आज इस समाज के अधिकारों पर हमले हो रहे हैं, उनके अधिकार छीने जा रहे हैं, इस पर सरकार को विचार करना चाहिए।”
सभा में ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत ने कहा, “पूरे देश में जनजातियों का कन्वर्जन किया जा रहा है, यह एक कैंसर है। इसे ठीक करना जनजाति समाज और सरकार की जिम्मेदारी है।” उन्होंने यह भी कहा, “जिन लोगों ने पूर्वजों की परंपरा छोड़ दी है, पूजा-पद्धति को त्याग दिया है, वे हमारे नहीं हो सकते हैं।” उन्होंने कहा, “हम लोग भगवान राम के वंशज हैं। वनवास के समय भगवान राम हमारे घरों में रहे, गांवों में रहे। जनजातियों ने अहंकारी रावण को परास्त करने में भगवान राम का साथ दिया। आज कुछ लोग ऐसे वनवासी समाज के लिए कह रहे हैं कि तुम्हारा कोई धर्म नहीं है। यह वनवासियों को सनातन से दूर करने का षड्यंत्र है। इससे हमें सावधान रहना होगा।”

समागम के प्रारंभ में ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा ने जनजातियों से आग्रह किया वे कि अपनी संस्कृति, पूजा-पद्धति और परंपरा के लिए सजग रहें, क्योंकि इनके बिना हमारी कोई पहचान नहीं बचेगी। उन्होंने यह भी कहा कि जनजातियों के साथ हो रहे अन्याय जब तक खत्म नहीं होंगे, तब तक ऐसी रैलियां और समागम होते रहेंगे।
जनजाति सुरक्षा मंच की केंद्रीय समिति के सदस्य और राष्ट्रीय जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष हर्ष चौहान ने कहा कि अंग्रेज जनजातियों से लड़ नहीं सकते थे। इसलिए उन्होंने षड्यंत्रपूर्वक जनजातियों के लिए ‘ट्राइब’ शब्द दिया और कहा कि ये आदि मानव हैं, जंगल में रहते हैं, इन्हें हम जीना सिखाएंगे। इनका अपना कोई धर्म नहीं है, जबकि सनातन संस्कृृति के मूल में जनजाति संस्कृृति है। उन्होंने कहा कि जो हमारी संस्कृृति को छोड़ चुके हैं, जो कहते हैं कि हमारा कोई धर्म नहीं है, हम उनके विरोधी हैं।

15 दिन की यात्रा के बाद पहुंचे दिल्ली
जनजाति सांस्कृतिक समागम में अंदमान-निकोबार द्वीप समूह से भी एक दल पहुंचा था। इसमें छोटानागपुरी मूल की 12 जनजातियों के कुल 133 प्रतिभागी शामिल थे। ये सभी तीन गुटों में बंट कर दिल्ली आए। दो दल में शामिल लोग 15 दिन की लंबी यात्रा के बाद दिल्ली आए थे। पहले दल में 82 लोग थे। ये लोग पानी के जहाज से चैन्ने पहुंचे और फिर रेलगाड़ी से दिल्ली आए। 43 सदस्यों का दूसरा दल पानी के जहाज से कोलकाला पहुंचा। वहां से रेलगाड़ी से दिल्ली आया। आठ लोग हवाई जहाज से दिल्ली आए। ये लोग सबसे पहले सुदूर कचाल द्वीप, जो निकोबार द्वीप समूह का जनजातीय आरक्षित द्वीप है, से 8 मई, 2026 को निकले और पूरे डेढ़ दिन की यात्रा करके राजधानी श्री विजयपुरम (पोर्ट ब्लेयर) पहुंचे। पांच दिन बाद 14 मई को ये लोग चैन्ने के लिए समुद्री मार्ग से चले। ऐसे ही दूसरा दल समुद्र मार्ग से कोलकाता के लिए चला। भजन—कीर्तन करते हुए इन लोगों ने समुद्री यात्रा पूरी की। चैन्ने पहुंचने पर इन लोगों का स्थानीय कार्यकर्ताओं ने भव्य स्वागत किया। कार्यकर्ताओं ने ही इनके लिए भोजन तथा आवास की व्यवस्था की और ऐतिहासिक महाबलिपुरम जैसे स्थलों का दौरा करवाया। शाम के समय इन लोगों ने जनजातीय भजन-कीर्तन और लोक-नृत्य का प्रदर्शन किया। ऐसे ही कोलकाता में भी हुआ। वहां के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उनका ख्याल रखा और प्रसिद्ध दक्षिणेश्वरी काली मंदिर के दर्शन कराए। पहली बार दिल्ली आए इन लोगों के चेहरे पर प्रसन्नता की जो खुशी थी, उसे शब्दों में नहीं बांध जा सकता।
वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तेची गुबिन ने सरकार से मांग की कि जो लोग जनजाति और अल्पसंख्यक के नाम पर दोहरा लाभ रहे हैं, उन्हें आरक्षण की सूची से हटाया जाए। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति अपनी परंपरा या आस्था को छोड़ता है, तो जाति के नाम पर उसे आरक्षण नहीं मिल सकता है। ऐसा ही प्रावधान अनुसूचित जनजातियों के लिए भी होना चाहिए। इसके बाद ही कन्वर्जन रुक सकता है।
जनजाति सुरक्षा मंच की केंद्रीय समिति की सदस्य बुधरी ताती ने कहा कि यदि हमारा धर्म सुरक्षित नहीं है, तो हम भी सुरक्षित नहीं हैं। हम अपने धर्म को नई पीढ़ी तक पहुंचाएं और जो इस धर्म का विरोध करे, उसका जमकर विरोध करें।
‘जनजाति जागृति समिति’ के अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के विधिक सलाहकार और पूर्व न्यायाधीश प्रकाश उईके ने कहा कि मिशनरियों के कहने पर बिरसा मुंडा को जेल में डाला गया था। उन्होंने जल, जंगल, जमीन और संस्कृति को बचाने के लिए अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया था। जनजाति समाज उनके आदर्शों का पालन कर अपनी संस्कृति को बचाने के लिए आज दिल्ली में एकत्रित हुआ है।
अंत में अंदमान निकोबार द्वीप समूह से आईं उन कमला की बात, जो कष्ट भरी यात्रा के बाद समागम में आई थीं। कमला इस बात से खुश थीं कि देश की राजधानी दिल्ली में पहली बार इतने जनजाति आए और उनके साथ हो रहे अन्यायों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा हुई। वे कहती हैं, “अब उम्मीद जगी है कि भारत सरकार जनजातियों की हर समस्या का निदान निकालेगी।”

















