छत्तीसगढ़ राज्य का गठन नवंबर 2000 में हुआ था। तब से लेकर 2025 तक, यानी पिछले 25 वर्षों में बस्तर क्षेत्र में मतांतरण (धर्मांतरण) को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं वो चौंकाने वाले हैं। सर्व आदिवासी समाज के जगदलपुर जिला अध्यक्ष दशरथ कश्यप द्वारा RTI के माध्यम से मांगी गई जानकारी ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन ने जो दस्तावेज उपलब्ध कराए हैं उनके अनुसार, नवंबर 2000 से फरवरी 2023 तक पूरे बस्तर जिले में केवल 364 लोगों ने ही मतांतरण की आधिकारिक सूचना जिला प्रशासन को दी है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि फरवरी 2023 से 2025 के बीच सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, एक भी व्यक्ति ने मतांतरण की जानकारी नहीं दी है। हालांकि, स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों का दावा है कि इस दौरान भारी संख्या में लोग दूसरे मतों की ओर आकर्षित हुए हैं। सरकारी रिकॉर्ड और वास्तविक संख्या में यह बड़ा अंतर यह बताने के लिए काफी है कि कागजी प्रक्रियाएं पूरी तरह प्रभावी नहीं हैं।
अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में हुए मतांतरण के आंकड़े
RTI से मिली जानकारी के अनुसार, विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में मतांतरण की सूचना देने वालों का डेटा इस प्रकार है:
अजीत जोगी सरकार (2000-2003)
इस दौरान 232 लोगों ने मतांतरण की सूचना दी थी।
भाजपा शासनकाल (2004-2018)
बीजेपी के 15 वर्षों के लंबे शासन में 131 लोगों ने मतांतरण की जानकारी प्रशासन को दी।
भूपेश बघेल सरकार (2018-फरवरी 2023)
इनके कार्यकाल में केवल एक व्यक्ति ने फरवरी 2020 में अपनी जानकारी प्रशासन के साथ साझा की। सरकारी प्रक्रिया के तहत मतांतरण की सूचना देने के लिए निर्धारित प्रारूप का पालन करना होता है। इसमें शपथ पत्र या सादे कागज पर जानकारी दी जाती है। हालांकि, प्रशासन इन सूचनाओं को रजिस्टर में दर्ज तो कर लेता है लेकिन आगे की कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं, इसकी जांच करने में कोई रुचि नहीं दिखाई गई।
आंकड़ों की कमी के चलते बढ़ रहा तनाव
बस्तर में तनाव का कारण भी यही है। जनजातीय समाज का आरोप है कि मिशनरियां वनवासियों को उनकी पारंपरिक जड़ों और प्रकृति से दूर कर रही हैं। वनवासी कल्याण आश्रम के रामनाथ कश्यप का कहना है कि मतांतरित होने के बाद भी कई लोग वनवासी समाज की दोहरी सुविधाओं (जैसे आरक्षण और विशेष सरकारी योजनाओं) का लाभ उठा रहे हैं जो मूल वनवासियों के हक को छीनने जैसा है।
बस्तर के कई गांवों में ईसाई बने वनवासियों और परंपरागत वनवासियों के बीच शव दफनाने को लेकर अक्सर हिंसक झड़पें होती हैं। इसके चलते कई बार हालात बहुत ही तनावपूर्ण हो जाते हैं।
मिशनरियां उठा रहीं फायदा
सर्व आदिवासी समाज के नेता राजाराम तोड़ेम का स्पष्ट कहना है कि प्रशासन की इस लापरवाही का सीधा लाभ मिशनरियों को मिल रहा है। जब सरकारी रिकॉर्ड में मतांतरितों की वास्तविक संख्या ही दर्ज नहीं है तो प्रशासन मिशनरी संस्थाओं के प्रभाव को नियंत्रित करने में खुद को असमर्थ पाता है। जनजातीय समाज का एक बड़ा वर्ग अब यह मांग कर रहा है कि पंचायत-वार सर्वे किया जाए। इससे यह साफ हो जाएगा कि हर गांव में कितने लोग मतांतरित हुए हैं और कितने नए प्रार्थना केंद्र बने। साथ ही मतांतरित आदिवासियों को मिलने वाली विशेष सुविधाओं की समीक्षा की जाए और आदिवासी संस्कृति को बचाने के लिए कड़े नियम बनाए जाएं ताकि बाहरी प्रभाव को रोका जा सके।

















