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अपनी शर्तों पर साझेदारी

भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता बदलती वैश्विक व्यापार व्यवस्था में भारत की नई रणनीति को दर्शाता है। यह समझौता केवल टैरिफ तक सीमित नहीं, बल्कि निवेश, सेवाओं, मोबिलिटी और नियामक सहयोग को भी समाहित करता है।

Written byडॉ. अश्विनी महाजनडॉ. अश्विनी महाजन
May 13, 2026, 01:51 pm IST
inभारत, मत अभिमत
भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता पर हस्ताक्षर करने के बाद केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैक्ले

भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता पर हस्ताक्षर करने के बाद केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैक्ले

हाल ही में भारत-न्यूजीलैंड व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, मोबिलिटी और नियामक सहयोग शामिल किए गए हैं। यह समझौता केवल पारंपरिक टैरिफ घटाने से संबंधित नहीं है, बल्कि इसमें एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम दर्जे के उद्योगों), नवाचार एवं मानकों को भी शामिल किया गया है।

व्यापार समझौतों के बदलते स्वरूप

गौरतलब है कि वर्तमान में दुनिया में व्यापार समझौतों के कई प्रकार देखने को मिलते हैं। उनमें से एक प्रकार बहुपक्षीय समझौतों का है। ‘गैट’ समझौते के आधार पर, 1995 में विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया, जो एक बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था थी, जिसमें उस समय भी 123 देश शामिल थे। उसके बाद और देश भी इस व्यवस्था में शामिल होते हुए विश्व व्यापार संगठन का हिस्सा बनते गए। आज विश्व व्यापार संगठन के 166 सदस्य हैं।

इसके अलावा कई बार क्षेत्रीय व्यापार समझौते भी किए जाते हैं, जिनमें उस क्षेत्र के कई देश शामिल हो जाते हैं। उत्तरी अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच ‘आसियान’ मुक्त व्यापार क्षेत्र, यूरोपीय संघ (ईयू) और दक्षिणी अफ्रीकी सीमा शुल्क संघ आदि इसके उदाहरण हैं।सीमा शुल्क संघ (कस्टम्स यूनियन) भी क्षेत्रीय समझौतों का एक प्रकार है, जिसमें सदस्य देश आपस में लगने वाले टैरिफ (शुल्क) हटा देते हैं और बाहर से आने वाले माल पर एक समान टैरिफ लागू करते हैं। क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौते का उदाहरण है। इसमें आसियान के दस देश, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं।
ट्रांस-पैसिफिक भागीदारी के लिए व्यापक और प्रगतिशील समझौता भी क्षेत्रीय व्यापार समझौते का उदाहरण है। कई बार देश क्षेत्रीय व्यापार संघों के साथ भी व्यापार समझौते करते हैं। दुनिया में इसके कई उदाहरण मिलते हैं, जैसे भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता।

बढ़ती अहमियत

इसके अतिरिक्त कई बार बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौते भी देखने को मिलते हैं, जिनमें अलग-अलग क्षेत्रों के कई देश शामिल होते हैं। इसके अलावा कई व्यापार समझौते द्विपक्षीय (यानि दो देशों के बीच) होते हैं। भारत-न्यूजीलैंड व्यापार समझौता उसी प्रकार का समझौता है। इससे पहले भारत ने कई देशों के साथ इस प्रकार के द्विपक्षीय समझौते किए हैं, जिनमें भारत-यूके व्यापार समझौता, भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापार समझौता, भारत-जापान मुक्त व्यापार समझौता और अब भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता आदि कुछ उदाहरण हैं।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से अमेरिका द्वारा विश्व व्यापार संगठन के नियमों का उल्लंघन करते हुए अनाप-शनाप टैरिफ बढ़ाने, संगठन में अपने हिस्से का शुल्क नहीं देने और मंत्रीस्तरीय सम्मेलनों में अनिर्णय की स्थिति आदि के चलते दुनियाभर के देशों का विश्व व्यापार संगठन से मोहभंग होता जा रहा है। सभी बड़े राष्ट्रों के ध्यान में आ रहा है कि विश्व व्यापार समझौतों को नए सिरे से देखने की जरूरत है। ऐसे में द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के प्रति देशों का आकर्षण लगातार बढ़ता जा रहा है। यही नहीं, क्षेत्रीय समझौतों की तुलना में अधिक द्विपक्षीय समझौते किए जा रहे हैं।

वर्ष 2019 में भारत क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) में शामिल होने जा ही रहा था कि यह ध्यान में आया कि इस समझौते से देश में कृषि, डेयरी और उद्योग को भारी नुकसान हो सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सख्त निर्णय लेते हुए आरसीईपी से बाहर रहने का निर्णय लिया। गौरतलब है कि इस समझौते की बातचीत में दस आसियान देश, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और भारत समेत 16 देश शामिल थे। चीन को छोड़कर आरसीईपी में शामिल सभी देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय समझौते हो चुके हैं। चीन द्वारा अनुचित तौर-तरीके अपनाने के कारण भारत उससे किसी भी प्रकार का व्यापार समझौता नहीं करना चाहता।

समझौते के लाभ

भारत के तमाम निर्यातों को न्यूजीलैंड में आयात शुल्क से 100 प्रतिशत छूट मिलेगी और इससे भारत से वस्त्र एवं परिधान, चमड़े से बनी वस्तुएं और जूते, दवाएं और इंजीनियरिंग उत्पादों को लाभ मिलेगा। भारत द्वारा न्यूजीलैंड के 95 प्रतिशत निर्यातों को आयात शुल्क से छूट दी गई है और 30 प्रतिशत वस्तुओं पर तो तुरंत प्रभाव से छूट मिली है। शेष वस्तुओं पर आयात शुल्क धीरे-धीरे घटाया जाएगा।
जैसा कि भारत पिछले कई समझौतों में कुछ संवेदनशील क्षेत्रों को मुक्त व्यापार समझौते से बाहर रखता रहा है, उसी तर्ज पर डेयरी, चीनी, खाद्य तेल, मसाले और रबर इत्यादि को इस समझौते से भी बाहर रखा गया है, ताकि घरेलू किसानों और उत्पादकों का संरक्षण किया जा सके।

माना जा रहा है कि इस समझौते से भारत द्वारा प्रदत्त 118 प्रकार की सेवाओं को न्यूजीलैंड में पहुंच मिल सकेगी, जिसमें आईटी और डिजिटल सेवाएं, वित्तीय और पेशेवर सेवाएं, पर्यटन एवं शिक्षा सेवाएं आदि शामिल हैं। न्यूजीलैंड ने इस समझौते में भारत में आने वाले वर्षों में 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता भी जताई है, जो इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्रौद्योगिकी, मैन्युफैक्चरिंग और कृषि मूल्य श्रृंखलाओं में किए जाने की संभावना है।

मोबिलिटी और वीजा सुविधाओं को भी इसमें शामिल किया गया है, जिसमें भारत से कुशल पेशेवरों, विद्यार्थियों और योग एवं आयुष में अभ्यास करने वालों को आसान वीजा की सुविधा मिलेगी। काम के लिए वीजा, वर्किंग हॉलिडे स्कीम और शिक्षा के बाद काम करने के अधिकार आदि इसमें शामिल किए गए हैं।हालांकि न्यूजीलैंड के कृषि उत्पादों जैसे सेब, कीवी, मांस और समुद्री खाद्य आदि को भारत में निर्यात करने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन ये सभी आयात कोटा से बंधे होंगे। आयात शुल्क हटाते समय इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि किसानों और डेयरी क्षेत्र को नुकसान न हो।

इस समझौते के बाद भारत और न्यूजीलैंड का कुल व्यापार, जो अभी 1.3 अरब डॉलर है, कुछ वर्षों में 20 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। गौरतलब है कि अभी तक भारत का विदेश व्यापार कुछ पारंपरिक साझेदारों तक ही सीमित है। इस समझौते से भारत के विदेशी व्यापार दायरे को बढ़ाने का अवसर भी मिलेगा। इसके साथ ही मानक, कस्टम प्रक्रियाओं और पारदर्शिता में सुधार करते हुए गैर-टैरिफ बाधाओं को भी दूर किया जाएगा।

भारत के लगभग हर व्यापारिक साझेदार के साथ हुए द्विपक्षीय समझौतों से यह स्पष्ट होता है कि भारत प्रभावी बातचीत के माध्यम से मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पारंपरिक ढांचे के अलावा अब वह इन समझौतों में निवेश, आवाजाही और आर्थिक सहयोग को भी शामिल कर रहा है।

इससे यह संकेत मिलता है कि भारत न केवल विकासशील देशों के साथ, बल्कि विकसित देशों के साथ भी समान स्तर पर अधिक आक्रामक तरीके से बातचीत कर रहा है। भारत-ब्रिटेन, भारत-ईयू, भारत-ऑस्ट्रेलिया और अब भारत-न्यूजीलैंड समझौते इसके ताजा उदाहरण हैं।

हम देखते हैं कि भारत-अमेरिका प्रस्तावित एफटीए अभी भी अधर में है, जिससे स्पष्ट होता है कि भारत उन शर्तों को मानने की जल्दबाजी में नहीं है जो उसके हित में नहीं हैं। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के लगाए गए टैरिफ को रद्द किए जाने के बाद भारत ने भी बातचीत की गति धीमी कर दी है, और इन नए घटनाक्रमों के बाद संभव है कि भारत को और अधिक रियायतें मिलें।
न्यूजीलैंड के साथ व्यापार समझौता एक बार फिर यह साबित करता है कि भारत अब अपने हितों की सुरक्षा करते हुए विकसित देशों के साथ भी मजबूती से आगे बढ़ रहा है। यह विकसित भारत की सोच को पुष्ट करता है और आपूर्ति श्रृंखलाओं के विस्तार तथा निर्यात-आधारित विकास को गति देता है।

Topics: दवाएंकृषिडिजिटल सेवाएंविकसित भारतआयुषitटैरिफ कोटाinfrastructureगैर-टैरिफपाञ्चजन्य विशेषInnovationmanufacturingआयात शुल्कयोगआर्थिक कूटनीतिwtoइंजीनियरिंग उत्पादMSME
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