तीसरी बार भाजपा सरकार
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होम भारत असम

तीसरी बार भाजपा सरकार

असम चुनाव में हिंदू पूरी तरह भाजपा के साथ खड़े दिखे। यही कारण है कि किसी भी हिंदू-बहुल क्षेत्र से कांग्रेस का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाया। कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार गौरव गोगोई अपने वार्ड और अपने बूथ में भी हार गए। कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति ही उसे ले डूबी। बदरुद्दीन अजमल के शब्दों में, ‘अब कांग्रेस मुस्लिम हो गई है।’

Written byदिव्य कमल बारदोलईदिव्य कमल बारदोलई
May 11, 2026, 11:18 pm IST
inअसम, विश्लेषण
गुवाहाटी में जीत की खुशी मनाते असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, राज्य भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया आदि।

गुवाहाटी में जीत की खुशी मनाते असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, राज्य भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया आदि।

गुवाहाटी में जीत की खुशी मनाते असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, राज्य भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया आदि।
भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग ने असम की राजनीति में इतिहास रच दिया। राजग ने राज्य की 126 में से 102 सीटों पर जीत हासिल की। अपनी लगातार तीसरी जीत में भाजपा ने 82 सीटें हासिल की हैं, जो बहुमत के आंकड़े से 18 अधिक हैं। यानी भाजपा को खुद का बहुमत है, ऐसा राज्य में पहली बार हुआ है। इसके विपरीत यह चुनाव कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) दोनों के लिए एक आपदा साबित हुआ। इस चुनाव ने कांग्रेस पार्टी को ‘मुस्लिम पार्टी’ तक सीमित कर दिया। कांग्रेस असम के उस मुख्य क्षेत्र में एक भी सीट नहीं जीत पाई, जहां हिंदू असमिया, जनजाति और चायबागान समुदाय के लोग निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस से एकमात्र हिंदू विधायक ‘नौबोइचा’ निर्वाचन क्षेत्र से जीते हैं, जहां मुस्लिम आबादी काफी ज्यादा है। नौबोइचा सुरक्षित क्षेत्र है। यहां कोई मुसलमान चुनाव नहीं लड़ सकता था। इसलिए कांग्रेस ने यहां एक हिंदू उम्मीदवार को उतारा था।

मुसलमान मतदाताओं का कांग्रेस की ओर जाने से एआईयूडीएफ लगभग सिमट गई है। 16 विधायकों वाली इस पार्टी के पास अब केवल दो विधायक रह गए हैं। 2021 में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस और एआईयूडीएफ ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन कांग्रेस को एहसास हुआ कि इस गठबंधन से सिर्फ एआईयूडीएफ को फायदा होता है। इसलिए इस बार दोनों ने गठबंधन नहीं किया। दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को असम में मुसलमानों का भारी समर्थन मिला था। इसे देखते हुए कांग्रेस ने एआईयूडीएफ से समझौता नहीं किया। इसका भारी नुकसान एआईयूडीएफ को हुआ।

जनादेश की धारा और भारत का वैचारिक मोड़

कांग्रेस बनी मुस्लिम लीग!

इस चुनाव में कांग्रेस के 19 उम्मीदवार जीते हैं। उनमें से 18 मुसलमान और एक हिंदू हैं। आजादी के बाद कांग्रेस ने असम पर लगभग 60 साल तक राज किया, लेकिन शुरू से ही इस पार्टी ने मुसलमानों को खुश करने वाली राजनीति की। यही कारण है कि कांग्रेस को बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए सीमा खोलने में भी कोई हिचक नहीं हुई। इस कारण असम में आबादी के स्वरूप में भारी बदलाव आया और राज्य के 9 जिले मुस्लिम-बहुल हो गए। कांग्रेस ने न तो कभी राज्य के मूल निवासियों के बारे में सोचा और न ही उनकी समस्याओं की परवाह की। नतीजतन, असम में उग्रवाद और अशांति बढ़ गई, और कांग्रेस ने असम को एक अंधकारमय दौर में धकेल दिया।

कांग्रेस के प्रति लोगों के गुस्से के कारण ही 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में असम में पहली बार भाजपा सरकार बनी और मुख्यमंत्री बने सर्बानंदा सोनोवाल। भाजपा सरकार ने असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा किए गए कब्जों के खिलाफ बेदखली अभियान शुरू किया, तो कांग्रेस ने घुसपैठियों का ही बचाव किया और वादा किया कि अगर वह असम में सत्ता में आती है, तो वह बेदखल किए गए घुसपैठियों को फिर से बसाएगी। इस कारण असम के हिंदू मतदाताओं के मन में कांग्रेस के प्रति गुस्सा बढ़ता गया। बदरुद्दीन अजमल ने कहा, ‘‘कांग्रेस उसी गड्ढे में गिर गई जो उसने हमारे लिए खोदा था। कांग्रेस अब खत्म हो चुकी है और असम में वह ‘मुस्लिम लीग’ बन गई है।’’

जीत का जश्न मनाते भाजपा समर्थक

ऊपरी असम से गायब कांग्रेस

ऊपरी असम यानी डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, गोलाघाट, जोरहाट और सोनारी जिलों में कांग्रेस एक भी सीट जीतने में असफल रही। केवल सिबसागर में ही पार्टी की सहयोगी ‘रायजोर दल’ बहुत कम अंतर से एक सीट जीतने में सफल रही। ब्रह्मपुत्र के उत्तरी तट पर कांग्रेस को केवल एक सीट नौबोइचा आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से सफलता मिली। धेमाजी, बिश्वनाथ चारियाली और सोनितपुर जैसे जिलों में भाजपा को भारी समर्थन मिला। दक्षिणी असम में भी यही स्थिति रही। भाजपा ने सभी हिंदू-बहुल सीटें जीत लीं। बराक घाटी में भाजपा को नौ और कांग्रेस को चार मिलीं। बोडो मतदाताओं ने कांग्रेस से पूरी तरह से मुंह मोड़ लिया। बोडो क्षेत्र में पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली, और वह भी ऐसे निर्वाचन क्षेत्र से जहां 60 प्रतिशत से अधिक मतदाता हैं। कार्बी आंगलोंग और दिमा हसाओ के पहाड़ी जिलों में भी जनजाति मतदाताओं ने कांग्रेस को नकार दिया। ऊपरी और उत्तरी असम के चायबागान समुदायों ने, जिन्हें लंबे समय से ‘स्विंग निर्वाचन क्षेत्र’ माना जाता रहा है, कांग्रेस को एक भी सीट नहीं दी। कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार गौरव गोगोई भी जोरहाट सीट से भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी से चुनाव हार गए।

कांग्रेस के साथ मियां-मुसलमान

मियां-मुसलमान शुरू से ही कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक रहे हैं। कुछ समय के लिए उन्होंने एआईयूडीएफ का समर्थन किया, लेकिन भाजपा के उभार के बाद मियां वोट बैंक ने एक बार फिर कांग्रेस पर अपना भरोसा जताना शुरू कर दिया है। यह बात 2024 के लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिली थी। 2023 में असम में निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद मुस्लिम मतदाता राज्य के लगभग 23 निर्वाचन क्षेत्रों तक ही सीमित रह गए, कांग्रेस पार्टी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही रही। नव-निर्वाचित भाजपा विधायक पल्लव लोचन दास ने कहा कि कांग्रेस अब असम के लोगों की आकांक्षाओं से जुड़ी हुई नहीं है। अब वह एआईयूडीएफ की जगह लेने वाली, पूरी तरह से एक मुस्लिम पार्टी बन गई है। वरिष्ठ भाजपा विधायक प्रशांत फुकन ने कहा कि कांग्रेस अब केवल ‘मियां’ इलाकों में ही जीवित है।

कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार गौरव गोगोई ने अपना नामांकन दाखिल करने से पहले मंदिर में पूजा करने के बजाय जोरहाट की एक मस्जिद में नमाज अदा करना ठीक समझा था। हिंदुओं ने इसे ठीक नहीं माना और यही कारण है कि गौरव उस सीट से हार गए, जहां 95 प्रतिशत से अधिक हिंदू मतदाता हैं। कांग्रेस ने 20 अल्पसंख्यक-बहुल सीटों पर चुनाव लड़ा और 19 पर जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस के एक निलंबित मुस्लिम विधायक शेरमन अली ने टीएमसी के टिकट पर जीत दर्ज की।

एआईयूडीएफ बिनाकांडी और डोलगांव केवल दो सीट को जीतने में सफल रही। बिनाकांडी में एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल खुद चुनाव लड़ रहे थे। इन दोनों सीटों पर कांग्रेस की सहयोगी एजेपी चुनाव लड़ रही थी। विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस खुद इन दोनों सीटों पर चुनाव लड़ती तो एआईयूडीएफ के लिए जीतना मुश्किल हो जाता। इस चुनाव में जीतने वाले 24 विपक्षी विधायकों में से केवल दो ही हिंदू हैं। भाजपा विधायक मानव डेका कहते हैं, ‘‘अगले पांच वर्ष तक हर शुक्रवार को असम विधानसभा विपक्ष-विहीन रहेगी, क्योंकि सभी विपक्षी विधायक नमाज अदा करने चले जाएंगे।’’

भाजपा की जीत के कारण

असम में 2016 में पहली बार सरकार बनाने के बाद भाजपा ने जंगल और सरकारी जमीन पर घुसपैठियों द्वारा किए गए अतिक्रमण को हटाना शुरू कर दिया। साथ ही, धार्मिक स्थलों और सत्रों से जुड़ी जमीन से भी अतिक्रमण हटाया गया। गुरु शंकरदेव के जन्मस्थान बटाद्रवा सत्र में घुसपैठियों द्वारा किए गए अतिक्रमण को भी हटाया गया। इन सब कारणों से हिंदू भाजपा के प्रति आकर्षित हुए और इस कारण 2021 में भी वहां भाजपा की सरकार बनी। 2021 के बाद भी भाजपा सरकार ने अतिक्रमण विरोधी अभियान जारी रखा। पिछले पांच वर्ष में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के नेतृत्व में सरकार ने घुसपैठियों द्वारा कब्जाई गई लगभग 1.50 लाख बीघा जमीन को खाली करवाया है। विश्व धरोहर स्थल काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से भी अतिक्रमण हटाए गए हैं। इन कार्रवाइयों ने असम के मूल निवासियों के मन में भाजपा सरकार के प्रति विश्वास की भावना जगाई। और इस भरोसे का नतीजा यह है कि भाजपा ने 102 सीटें जीती हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा कहते हैं, ‘‘असम में 103 सीटें ऐसी हैं, जहां हिंदू मतदाता जनादेश तय करते हैं। उनमें से हमने 102 सीटें जीती हैं। हमारी योजना शुरू से ही स्पष्ट थी कि हम ये सीटें जीत सकते हैं। हर निर्वाचन क्षेत्र में जीत का अंतर अलग-अलग था, लेकिन जनादेश केवल भाजपा के पक्ष में था।’’

विकास से हुआ विस्तार

असम में भाजपा सरकार विकास के ऐसे-ऐसे कार्य कर रही है, जिनकी पहले लोगों ने उम्मीद भी नहीं की थी। सड़क, नेशनल हाईवे, पुल, रेल, हवाई यात्रा समेत ढांचागत सुविधाओं को बढ़ाने का काम हो रहा है। डिब्रूगढ़ में टूटी सड़कों को इस तरह बना दिया गया है, उन पर अब वायु सेना के जहाज भी उतर रहे हैं। ब्रह्मपुत्र नदी पर नए पुल बनाए गए हैं, 10 साल में असम में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 24 हो गई। कभी हिंसा से प्रभावित राज्य, उग्रवादी समूहों के साथ कई शांति समझौतों के बाद शांत हो गया है। असम में निवेश आने लगा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा कहते हैं, ‘‘असम के विकास के लिए प्रधानमंत्री मोदी जी के जुनून और राज्य के लोगों की सेवा के लिए भाजपा के लगातार प्रयासों को असम के लोगों ने पुरस्कृत किया है।’’

इसके साथ ही, भाजपा सरकार की महिला-केंद्रित योजनाओं ने महिला मतदाताओं के बीच सरकार की विश्वसनीयता को बढ़ाया। दिलचस्प बात यह है कि असम में 2.50 करोड़ मतदाताओं में से 1.25 करोड़ महिलाएं हैं। 2021 में शुरू की गई मासिक भत्ता योजना ‘अरुणोदय’ से महिलाओं को बहुत फायदा हुआ, जिसके तहत लगभग 40 लाख महिलाओं को 1250 रु दिए गए। इसके अलावा, ‘उद्यमिता आसोनी’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं को छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए 10,000 रु. का एकमुश्त अनुदान दिया गया। 1.65 लाख सरकारी नौकरियां पूरी तरह से पारदर्शी और योग्यता के आधार पर दी गईं। 2 लाख युवाओं को व्यवसाय शुरू करने के लिए 20,0000 रु का अनुदान दिया गया। ये कुछ ऐसी योजनाएं हैं, जिन्होंने सत्ताधारी दल के लिए चुनावी परिदृश्य को बदल दिया।

अंत की ओर वामपंथ !

4 मई तक केरलम् एक मात्र ऐसा राज्य था, जहां वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे कामरेड पिनरई विजयन। अब केरलम् में कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) की सरकार बनने जा रही है। इसके साथ ही भारत में अब ऐसा कोई राज्य नहीं रहा, जहां वामपंथ की सरकार हो। 1977 के बाद से यह पहला अवसर है जब देश के किसी भी राज्य में वाममोर्चा की सरकार नहीं है। एक समय केरलम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में वामपंथी सरकारें होती थीं।

केरलम् ही ऐसा राज्य है, जहां 1957 में पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की सरकार बनी थी। इलमकुलम मनक्कल शंकरन यानी ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में बनी इस सरकार को मामूली बहुमत ही मिला था, लेकिन यह दुनिया में कहीं भी लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई पहली वामपंथी सरकार थी। ऐसे केरलम् में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही है, पर गत 10 वर्ष से वहां एलडीएफ की सरकार थी। उसके नेता दावा कर रहे थे कि इस बार भी उनकी सरकार बनने जा रही हे, लेकिन जनता ने उन्हें फिर से अवसर नहीं दिया। इस बार केरलम् में माकपा को केवल 26 सीटें मिली हैं, वहीं भाकपा को आठ और आएसपी को तीन सीेटें मिली हैं।

इससे पहले 2011 में पश्चिम बंगाल वामदलों के हाथ से निकल गया था। उस वर्ष ममता बनर्जी की आंधी चली और चुनाव में वामपंथ की 34 वर्ष से चल रही सरकार समाप्त हो गई थी। 2026 में पश्चिम बंगाल में माकपा को केवल एक सीट मिली है। त्रिपुरा में भी वामपंथियों ने गहरी जड़ें जमा ली थीं। इस कारण वहां 25 वर्ष तक वामपंथी सरकार रही। 2018 में भाजपा की रणनीति के सामने वामपंथी टिक नहीं पाए और त्रिपुरा की सत्ता से बाहर हो गए। वहां भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने बिप्लब कुमार देब।

पश्चिम बंगाल में 1977 में पहली बार वाममोर्चा सरकार सत्ता में आई थी। कामरेड ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने थे। वे लगभग 23 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद बुद्धदेब भट्टाचार्य ने 2000 से लेकर 2011 तक वाममोर्चा सरकार का नेतृत्व किया। दोनों के नेतृत्व में किसी राज्य में वाम दल का सबसे लंबा अटूट शासन रहा। हालांकि, पश्चिम बंगाल में वामपंथ का लंबा इतिहास रहा है। इसकी शुरुआत एमएन रॉय के समय से हुई, जिन्होंने 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। 1964 में भाकपा का विभाजन हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के रूप में नई पार्टी का जन्म हुआ।

कभी केंद्र की राजनीति में वामपंथियों का दबदबा था। सोनिया-मनमोहन सरकार के समय इन लोगों ने अपने हिसाब से सरकार से चलाई। यही नहीं, सोनिया गांधी के नेतृत्व में बनी ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद’ में वामपंथी भरे हुए थे। ये वामपंथी अपने नेताओं के इशारे पर कई ऐसे नियम-कानून बनवा चुके थे,जिनकी आड़ में हिंदुओं की परेशानी बढ़ने वाली थी। सही समय पर केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में राजग सरकार बनी और इसके बाद वामपंथी सिकुड़ने लगे।

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Topics: असमिया मूलपाञ्चजन्य विशेषउद्यमिता आसोनीअसम विधानसभाहिंदू बहुल क्षेत्रएआईयूडीएफसीमा सुरक्षाभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसमहिला सशक्तिकरणतुष्टिकरण की राजनीतिमुस्लिम लीगराजनीतिक दल  भाजपाबदरुद्दीन अजमलमियां-मुसलमान वोटराजगघुसपैठ विरोधीहिमंत बिस्व सरमा
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