जो मन के सारे संशयों को मिटाए और छिपे हुए सच को सामने लाए, वही ‘शास्त्र’ (सच्चा ज्ञान) है। पढ़िये क्या कहता है आज का श्लोक
श्लोक –
अनेक-संशयोच्छदि, परोक्षार्थस्य दर्शकम्।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः।।
भावार्थ-
अनेक-संशयों का उच्छेद करने वाला, परोक्ष (भूतकाल) का परिज्ञान कराने वाला, सभी के लिए नेत्र के समान महत्त्वपूर्ण यदि कोई वस्तु है, तो वह ‘शास्त्र’ है। जिसके पास शास्त्ररुपी नेत्र नहीं, वह वस्तुतः अंधा ही होता है।
आज क्यों है प्रासंगिक-
सूचना क्रांति के आज के दौर में फेक न्यूज का भी अंबार है। आज के समय में यह श्लोक बेहद प्रासंगिक है। सोशल मीडिया के जरिये समाज में भ्रम के जाल को प्रमाणिक ज्ञान से ही तोड़ा जा सकता है। डिजिटल दुनिया में विवेक ही आज का असली नेत्र है।

















