कभी-कभी एक चित्र ही पूरा आख्यान बन जाता है …
बंगाल का भद्रलोक-कालीघाट।
निवर्तमान मुख्यमंत्री, ममता बनर्जी का घर।
एक ओर 15 साल के कुशासन के बाद ममता सरकार का सूरज अस्त हो चुका था। दूसरी ओर हरीश चटर्जी स्ट्रीट पर भगवा झंडा लेकर एक बच्चा मुस्कुराते हुए प्राचीन दुर्गा मंदिर की ओर बढ़ रहा था। ये बंगाल की करवट है। 34 वर्ष लंबे हिंसक वाम शासन और डेढ़ दशक तक तृणमूल की रक्तरंजित राजनीति को झेलने के बाद फिर से उठ खड़े हुए बंगाल ने मतदान के कीर्तिमान रचते हुए हर शिथिलता को तोड़ अपने संकल्प व जिजीविषा की ध्वजा फहरा दी है। इस बीच इस्तीफा न देने पर अड़ी ममता बनर्जी को 7 मई की शाम राज्यपाल आर.एन.रवि ने बर्खास्त कर दिया।
पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के निहितार्थों की विवेचना करने से पहले मन को कचोटती एक बात! यह क्या विडंबना है कि बंगाल की जिस माटी ने भारत माता को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाकर स्वर्णिम सिंहासन पर बैठाने का सपना देखा, जिस माटी ने यह नारा देने वाला सपूत दिया, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”, उसी माटी को अपने पहले भयमुक्त चुनाव के लिए स्वतंत्र भारत में आधी सदी प्रतीक्षा करनी पड़ी!
चुनाव केवल मतगणना की मेज पर रखी संख्याओं का जोड़-घटा नहीं होते। वे समाज के भीतर बहती उन अदृश्य धाराओं का मानचित्र होते हैं, जिन्हें लंबे समय तक सत्ता, प्रचार, भय, तुष्टिकरण और वैचारिक शोर दबाए रखते हैं। कभी-कभी जनता चुप रहती है, पर उसकी चुप्पी रिक्तता नहीं होती, वह एक धीमी तैयारी होती है। वह गीली मिट्टी की तरह लगती है, पर भीतर से लगातार पकती, दृढ़ होती जाती है। शिला बन रही होती है। और जब वह शिला बन जाती है, तब सत्ता के महलों की दीवारों पर पहला प्रहार वही करती है।
पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के परिणामों को केवल पांच चुनावी घटनाओं के रूप में पढ़ना भूल होगी। ये परिणाम भारत की लोकतांत्रिक चेतना, राष्ट्रवादी राजनीति, विपक्ष की थकान, वामपंथ की ऐतिहासिक क्षीणता और नई राजनीति के आकर्षक लेकिन अनिश्चित प्रयोगों का संयुक्त अध्याय हैं।

अपमान का प्रतिकार
पश्चिम बंगाल में भाजपा 207 और तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर दिखी। बंगाल ने इस बार केवल सरकार नहीं बदली, राजनीति की भाषा बदल दी है। बंगाल को इस पूरे परिदृश्य का केंद्र इसलिए कहना चाहिए क्योंकि यहां परिणाम केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं, स्मृति-स्थापन है। यह उस प्रदेश की वापसी है जिसे बार-बार बताया गया कि उसकी बंगाली अस्मिता और भारतीय राष्ट्रचेतना दो अलग-अलग नावें हैं। यह उस भूमि का उत्तर है जहां 15 अगस्त 1872 को तब के कलकत्ता में जन्मे महर्षि अरविंद ने स्वर्णिम सिंहासन पर विराजमान भारत माता का सपना देखा, बंकिम ने वंदे मातरम् की अग्नि जगाई, विवेकानंद ने आत्मगौरव को विश्वमंच पर रखा, रवींद्रनाथ ने मानवता को भारतीय संवेदना से जोड़ा, नेताजी ने राष्ट्र की स्वतंत्रता को रक्त और संकल्प से पुकारा, और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रीय एकत्व की कीमत अपने जीवन से चुकाई। ऐसी भूमि को यदि कोई राजनीति केवल प्रादेशिक भय, प्रशासनिक संरक्षण और सांस्कृतिक संकोच के घेरे में बांधना चाहती थी, तो वर्तमान जनादेश ने उस घेरे की रेखाएं मिटा दीं।

बंगाल की इस जीत को केवल सत्ता-विरोधी लहर कहना इतिहास के साथ अन्याय होगा। पंद्रह वर्षों की सत्ता से स्वाभाविक थकान थी, पर उससे बड़ा प्रश्न सत्ता के चरित्र का था। जनता ने लोक कल्याण, कल्याणकारी राज्य और शासन के बीच का अंतर समझा। कल्याणकारी योजनाएं जरूरी हैं, पर वे भय, भ्रष्टाचार, सिंडिकेट, ‘कट मनी’ के आरोपों, प्रशासनिक पक्षपात, सीमांत असुरक्षा, महिला सुरक्षा और राजनीतिक हिंसा से उठे प्रश्नों का स्थायी उत्तर नहीं हो सकतीं। पेट भरा हो पर आत्मा अपमानित हो, तो नागरिक अंततः चुप नहीं रहता। घर की दीवारों पर रंग चढ़ा हो पर नींव में पानी भर रहा हो, तो गृहस्वामी देर-सबेर कुदाल उठाता ही है।
इसीलिए बंगाल का परिणाम तुष्टिकरण के विरुद्ध सामाजिक आक्रोश का भी संकेत है। यह किसी समुदाय के विरुद्ध जनादेश नहीं है, यह उस राजनीतिक पद्धति के विरुद्ध जनादेश है जो नागरिक को पहले वोट-बैंक बनाती है, फिर संविधान की आड़ में अपना बचाव करती है। भारतीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि प्रत्येक पात्र नागरिक समान अधिकार रखता है। पर जब शासन की दृष्टि नागरिकता से हटकर समीकरणों पर टिक जाती है, तब समाज में असंतुलन जमा होता है। बंगाल में हिंदू आस्थाओं, प्रतीकों और सांस्कृतिक अधिकारों को लेकर जो असहजता का वातावरण लंबे समय से राजनीतिक विमर्श में दिखाई देता रहा, उसके विरुद्ध समाज का स्वाभाविक ध्रुवीकरण हुआ। इसे ‘सांप्रदायिकता’ कहना आसान है किंतु इसे आत्मसम्मान कहना अधिक न्यायपूर्ण है।

रास न आया बाहरी का नारा
बंगाल शक्ति की भूमि है। यहां मां काली और दुर्गा केवल पूजा की मूर्तियां नहीं, सामाजिक मानस की ऊर्जा हैं। यहां शाक्त परंपरा ने स्त्री-शक्ति, प्रतिरोध और सांस्कृतिक स्वाधीनता को लोक-जीवन में रचा है। ऐसे प्रदेश में यदि कोई राजनीतिक भाषा बार-बार हिंदू प्रतीकों को संदेह, उपहास या चुनावी सुविधा की वस्तु बनाए, तो प्रतिक्रिया केवल मंदिरों से नहीं आती; वह घरों, परिवारों, मुहल्लों, गांवों और मौन मतदाताओं की कतारों से आती है। बंगाल ने संभवतः यही कहा है कि उसकी सांस्कृतिक आत्मा को भारतीय राष्ट्रवाद से काटकर नहीं पढ़ा जा सकता। बंगाली होना और भारतीय राष्ट्रवादी होना विरोधी नहीं, एक ही भाव की दो लय हैं।


यही कारण है कि जब ममता बनर्जी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि भाजपा ‘बहिरागतो’ यानी बाहरी है जो बंगाल का माहौल खराब करना चाहती है, तो बंगाल की धरती को यह बात रास नहीं आई। यहां बाहरी नारे से आशय “जय श्रीराम” से था। ममता भूल जाती हैं कि बंगाल की ही कोख से सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसी विभूति का जन्म हुआ जो जब ‘राम की शक्ति पूजा’ की रचना करते हैं तो वह कालातीत हो जाती है। लोगों को खांचों में बांटते-बांटते जब आप उनके आदर्शों को भी खांचों में बांटने का दुस्साहस कर बैठते हैं तो लोग इसे स्वीकार नहीं करते।

और रही बात बाहरी की, तो यह भी अजीब धृष्टता है! उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं सुचेता कृपलानी मूलतः बंगाल की थीं और विवाह पूर्व उनका नाम सुचेता मजूमदार था। तो क्या उनके बंगाल मूल के कारण उत्तर प्रदेश ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने से रोका? अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित से लेकर सुषमा स्वराज तक, कोई भी दिल्ली में नहीं जन्मा, लेकिन क्या दिल्ली ने उन्हें इस आधार पर स्वीकार करने से इनकार किया? इस देश के लोगों ने इतने संकीर्ण खांचे में अपने नेताओं, अपने मार्गदर्शकों को देखा ही नहीं। अपने लोगों को बाहरी ठहराने और बाहरी-घुसपैठियों को पहचानपत्र, वोटर कार्ड देकर ‘बांग्ला’ बताने और उनके वोट से सत्ता हथियाने का खेल बंगाल को सहन नहीं हुआ। यही कारण है कि जैसे ही भयमुक्त वातावरण में चुनाव होना सुनिश्चित हुआ, लोगों ने बंगाली अस्मिता को संकीर्णता के भौंडे रंग से रंगने के हर षड्यंत्र को खारिज कर दिया।
मतदाता सूची, एसआईआर और मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटने का विवाद भी इस चुनाव का संवेदनशील अध्याय रहा। इस विषय पर शोर बहुत है, पर लोकतंत्र में शोर से पहले सिद्धांत देखना चाहिए। मतदाता सूची की शुचिता लोकतंत्र की रीढ़ है। पात्र नागरिक का नाम कटना अन्याय है, अपात्र प्रविष्टि का बने रहना भी लोकतंत्र के साथ छल है। कुछ रिपोर्टों में एसआईआर प्रक्रिया और मतदाता नामों के हटने को लेकर गंभीर आशंकाएं उठाई गईं, जबकि चुनावी प्रशासन ने संशोधन, अंतिम सूची और काटे गए नामों की सूची जैसी प्रक्रियाओं को सार्वजनिक ढांचे में रखा। इसीलिए इस विषय को राजनीतिक आरोप या प्रशासनिक विवाद की तरह देखना चाहिए, न कि बिना प्रमाण किसी अंतिम निष्कर्ष की तरह।

अनर्गल आरोप
लोकतंत्र का स्वास्थ्य केवल मतदान से नहीं, परिणाम स्वीकार करने की नैतिकता से भी मापा जाता है। पराजय के बाद यदि प्रत्येक संस्था संदिग्ध घोषित कर दी जाए, तो जनता के निर्णय पर भी परोक्ष प्रहार होता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार ममता बनर्जी ने परिणामों के बाद चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया और कहा कि लगभग 100 सीटें “लूट ली गईं”, लेकिन रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि उन्होंने आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने आरोपों को आधारहीन कहा। यही वह क्षण है जहां लोकतंत्र शिकायत और अविश्वास के बीच फर्क मांगता है। शिकायत अधिकार है, पर प्रमाणहीन अविश्वास लोकतंत्र की मिट्टी में नमक बोता है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस परिणाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा द्वारा पश्चिम बंगाल जैसे “विपक्षी गढ़” पर कब्जे के रूप में देखा। यह अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है, क्योंकि बंगाल केवल भौगोलिक प्रदेश नहीं, विपक्षी आत्मविश्वास का किला था। मीडिया ने याद दिलाया कि भाजपा ने पहले कभी पश्चिम बंगाल पर शासन नहीं किया था और तृणमूल 2011 से सत्ता में थी। इसका अर्थ है कि यह परिणाम केवल सीटों की संख्या नहीं, उस मानसिक दुर्ग का टूटना है जिसे तृणमूल ने बंगाली अस्मिता, कल्याणकारी राजनीति और भाजपा-विरोध की दीवारों से सुरक्षित मान लिया था।
बंगाल में भाजपा की विजय इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह संगठन और प्रतीक, दोनों की विजय है। भाजपा ने बूथ को विचार से जोड़ा, कार्यकर्ता को अभियान से जोड़ा, नेतृत्व को स्थानीय असंतोष से जोड़ा, और राष्ट्रवाद को बंगाल की सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ा। यह विजय केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं आई, यह उन छोटे कार्यकर्ताओं की लंबी तपस्या से आई जिन्होंने भय, उपहास और राजनीतिक हिंसा की स्मृतियों के बीच संगठन को जिंदा रखा। राष्ट्रवादी राजनीति जब केवल नारा नहीं रहती, बल्कि घर-घर की बातचीत, बूथ-बूथ का श्रम, और समाज के आत्मसम्मान की भाषा बनती है, तब परिणाम ऐसे ही आते हैं।

असम का स्पष्ट और दृढ़ जनादेश
असम का जनादेश इस कथा का दूसरा मजबूत स्तंभ है। यह केवल सत्ता की वापसी नहीं, सीमांत राज्य की राजनीतिक स्पष्टता है। असम ने कहा कि सीमा पर बसे समाज को केवल कल्याणकारी सुविधा नहीं चाहिए, उसे नागरिकता की स्पष्टता, अवैध घुसपैठ पर नीति, सांस्कृतिक संरक्षण, जनजातीय-सामाजिक संतुलन, कानून-व्यवस्था और निर्णायक प्रशासन चाहिए। सीमांत प्रदेशों में राष्ट्रीयता कोई दूर की वैचारिक वस्तु नहीं होती, वह भूमि, भाषा, पहचान, रोजगार और सुरक्षा का दैनिक अनुभव होती है।
असम में कांग्रेस की कठिनाई इसी बिंदु पर खुलती है। यदि कोई दल स्थानीय हिंदू, जनजातीय, भाषाई और सांस्कृतिक आशंकाओं को समझने के बजाय केवल अल्पसंख्यक समीकरणों में भविष्य खोजे, तो जनता उसे पढ़ लेती है। कांग्रेस की उम्मीदवार तय करने की रणनीति और मुस्लिम नेतृत्व को चुन-चुन कर आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति को उसके समर्थक प्रतिनिधित्व कह सकते हैं, पर उसके आलोचक इसे वोट बैंक की सियासत मानते हैं। समस्या प्रतिनिधित्व में नहीं, असंतुलन में है, समस्या किसी समुदाय की भागीदारी में नहीं, उस राजनीतिक मनोविज्ञान में है जो बहुसंख्यक समाज के स्वाभाविक प्रश्नों से आंख मिलाने में संकोच करता है।
कांग्रेस की त्रासदी
कांग्रेस की त्रासदी यही है कि वह अमेठी में पराजित होती है तो वायनाड की शरण में जाती है, पर इसे केवल भौगोलिक बदलाव समझना भूल होगी। यह सामाजिक आत्मविश्वास की कहानी है। एक समय जो पार्टी पूरे भारत की केंद्रीय धुरी थी, वह अब अपने ही ऐतिहासिक मतदाता से संवाद करने में असहज दिखती है। वह हिंदू समाज के प्रश्नों को छूते हुए सावधान रहती है, घुसपैठ और सीमांत असुरक्षा पर बोलते हुए अटकती है, कट्टरता पर टिप्पणी करते हुए अपने सलाहकारों की ओर देखती है, और राष्ट्रवाद के प्रश्न पर या तो उधार की भाषा बोलती है या बचाव की मुद्रा में चली जाती है। कोई पार्टी केवल स्मारकों से नहीं चलती, उसे भविष्य की भाषा भी चाहिए।

वामपंथ ने कांग्रेस की इस दुर्बलता को और गहरा किया। विचारहीन भाजपा विरोधी राजनीति, अवसरवादी गठबंधन और सांस्कृतिक भारत के प्रति पुरानी कड़वाहट ने कांग्रेस की रीढ़ को विचार से नहीं, संकोच से भर दिया। वामपंथ ने उसे यह भ्रम दिया कि भारत को समझने के लिए भारत की स्मृति, आस्था, लोक-चेतना और सभ्यतागत आत्मा से संवाद आवश्यक नहीं, केवल वर्ग-संघर्ष, अल्पसंख्यक भय और सत्ता-विरोध की आयातित भाषा काफी है। परिणाम सामने है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के कंधों पर अब इतिहास की शॉल है, पर पैरों में भविष्य की चाल नहीं।

वाम का अंतिम किला ध्वस्त
केरल में परिणाम एक अलग प्रकार का संदेश देते हैं। कांग्रेस-नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में आया तो एलडीएफ को गहरी पराजय का सामना करना पड़ा। केरल में विपक्ष ने सत्तारूढ़ गठबंधन को हराकर वाम राज के अंतिम मजबूत किलों में से एक को ढहा दिया। भाजपा ने केरल में तीन सीटें जीतकर प्रतीकात्मक लेकिन ऐतिहासिक प्रवेश भी दर्ज किया।
केरल में वाम की हार केवल सीटों की कमी नहीं, वैचारिक थकान का आईना है। जो विचार स्वयं को गरीबों, श्रमिकों और नैतिक राजनीति का प्रहरी बताता रहा, वह जब सत्ता में आता है तो मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर सोना तस्करी जैसे विवादों, भ्रष्टाचार के आरोपों, संरक्षण-तंत्र और वैचारिक दोमुंहेपन की कथाओं में घिरता दिखाई देता है। यहां “आध्यात्मिक ब्योरा” यह है कि हर विचार अंततः अपने कर्मों से फलित होता है। यदि भीतर लोभ है, तो बाहर क्रांति के पोस्टर कितने भी लाल हों, रंग उतरता ही है। कोई खजाना लुटाकर पल्ले के चार आने बचा ले और उसे पूंजी बताने लगे, तो उस पर दया भी आती है और व्यंग्य भी।

भारतीय वाम ने अपनी मृत्यु की पटकथा स्वयं लिखी। उसने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को समझने के बजाय वर्ग-संघर्ष के आयातित चश्मे से समाज को पढ़ा। उसे मंदिर में अंधविश्वास दिखा, पर समुदाय की स्मृति नहीं; उसे जाति दिखी, पर सांस्कृतिक सुधार की आंतरिक शक्ति नहीं, उसे पूंजीवाद का विरोध करना था, पर राज्य-नियंत्रित लाभ-तंत्र और संगठित भ्रष्टाचार के सामने उसकी नैतिक आवाज बैठती गई। सोवियत प्रयोग टूट चुका था, चीन राज्य-पूंजीवाद की अपनी कठोर संरचना में बदल चुका था, यूरोप का सांस्कृतिक वाम पहचान-राजनीति के चक्रव्यूह में उलझा था, और भारत का चुनावी वाम अपने अंतिम मजबूत गढ़ों में भी जनता का भरोसा खोता गया। रूस-यूक्रेन, पश्चिमी हस्तक्षेप और स्टालिन की विरासत जैसे वैश्विक संदर्भ पृष्ठभूमि में रहें तो भी मूल प्रश्न यही है, क्या भारतीय वाम भारत को भारतीय दृष्टि से पढ़ सका? उत्तर जितना छोटा है, परिणाम उतने ही बड़े हैं।

द्रविड़ चौसर में दरार
तमिलनाडु का परिणाम तीसरी दिशा खोलता है। टीवीके ने 108, द्रमुक ने 59, अन्नाद्रमुक ने 47, कांग्रेस ने 5 और पीएमके ने 4 सीटें जातीं। एपी ने अभिनेता से नेता बने विजय चंद्रशेखर की टीवीके पार्टी की उल्लखनीय जीत बताया तो इंडिया टुडे ने तमिलनाडु तथा बंगाल को “दोहरा राजनीतिक भूकंप” कहा। इसका अर्थ है कि तमिलनाडु में पुरानी द्रविड़ द्विध्रुवीय चौसर में दरार पड़ी है, लेकिन यह दरार अपने आप राष्ट्रवादी राजनीति का मार्ग नहीं बन जाती।
तमिलनाडु दशकों से द्रविड़ राजनीति का केंद्र रहा है, जो अक्सर ब्राह्मणवाद और कर्मकांडों के विरोध पर आधारित रही। हालांकि, जब राजनीतिक मंचों से सनातन धर्म के उन्मूलन जैसे कड़े शब्दों का प्रयोग हुआ, तो इसने एक बड़े वर्ग को विरोध में खड़ा कर दिया। स्टालिन द्वारा सनातन धर्म की तुलना बीमारियों (डेंगू-मलेरिया) से करने वाले बयान ने न केवल तमिलनाडु, बल्कि पूरे देश में एक तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। तमिलनाडु में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो मंदिरों और अपनी धार्मिक परंपराओं से गहरा जुड़ाव रखता है। सत्ता पक्ष की टिप्पणियों को इस वर्ग ने सीधे अपनी जीवनशैली और पूर्वजों की आस्था पर प्रहार माना। इसलिए तमिलनाडु की सत्ता के खिलाफ गए जनादेश को केवल भ्रष्टाचार या सत्ता विरोधी लहर जैसे स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

विजय का उभार केवल सेलिब्रिटी राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। दक्षिण भारत के राजनीतिक इतिहास में सिनेमा और सत्ता का संबंध पुराना है। पर हर चमक सूर्योदय नहीं होती; कभी-कभी वह मंच की रोशनी भी होती है। भारत का युवा वर्ग नए प्रतीकों की तलाश में है। वह थके हुए चेहरों, पुराने परिवारों और नीरस भाषणों से ऊब चुका है। ऐसे समय में मीडिया में बनावटी करिश्मा, चर्चित छवि, सामाजिक इंजीनियरिंग और नई राजनीति का आकर्षण बहुत तेज काम करता है। सावधानी यहां है, हर नया चेहरा राष्ट्रहित का पर्याय नहीं होता। आम आदमी पार्टी जैसे गढ़े हुए पुतलों की कलई उतरना याद रखना चाहिए। नई राजनीति का दावा करने वाला प्रत्येक प्रयोग जनता की ऊर्जा का प्रतिनिधि नहीं, कभी-कभी वह किसी बड़े वैचारिक खेल का मुखौटा भी हो सकता है।
पुडुचेरी ने छोटा लेकिन सार्थक संकेत दिया। यहां संदेश यह है कि जहां राष्ट्रीय दल स्थानीय नेतृत्व का सम्मान करते हैं, वहां स्वीकार्यता बनती है। भाजपा/एनडीए के लिए पुडुचेरी का समीकरण यही है कि हर प्रदेश का व्याकरण अलग है। कहीं प्रत्यक्ष नेतृत्व चाहिए, कहीं सहयोग, कहीं सांस्कृतिक संवाद चाहिए, कहीं प्रशासनिक भरोसा, कहीं संगठन की गहराई, तो कहीं गठबंधन की विनम्रता। राष्ट्रीय विस्तार का अर्थ स्थानीय आकांक्षाओं को व्यापक राष्ट्रीय फ्रेम में सम्मान देना है।

इसपर अंतरराष्ट्रीय कवरेज भी ध्यान देने योग्य है। आरटी ने भाजपा की क्षेत्रीय चुनाव में “अभूतपूर्व लाभ” की बात लिखी और बंगाल में पहली बार जीत को रेखांकित किया, उसने असम में भाजपा
की तीसरी बार वापसी और केरल में तीन सीटों की पहली उपलब्धि का भी उल्लेख किया। इंडिया टुडे ने उमर अब्दुल्ला की “ब्लडी हेल” प्रतिक्रिया को बंगाल और तमिलनाडु के राजनीतिक झटकों के संदर्भ में प्रस्तुत किया। यह प्रतिक्रिया केवल सोशल मीडिया की चुटकी नहीं थी, यह विपक्षी मानस में अचानक आई स्तब्धता का संकेत थी।
क्या यह 2029 तक असर डालने वाला राजनीतिक भूकंप है? सीधे-सीधे भविष्यवाणी करना राजनीति में मूर्खता होगी, पर संकेत को न समझना उससे भी बड़ी भूल होगी। बंगाल में भाजपा का प्रवेश, असम में उसकी स्थिरता, पुडुचेरी में गठबंधन की उपस्थिति, केरल में प्रतीकात्मक दरार और तमिलनाडु में पुराने ढांचे का टूटना, ये सभी मिलकर 2029 के लिए राजनीतिक पृष्ठभूमि बदलते हैं। विपक्ष की शक्ति की परीक्षा अब केवल दिल्ली की प्रेस कॉन्फ्रेंसों में नहीं होगी, उसे राज्यों के समाजशास्त्र, संगठन, स्थानीय नेतृत्व और वैकल्पिक शासन-दृष्टि में उत्तर देना होगा।
भाजपा की जीत का लोकतांत्रिक अर्थ यही है कि भारत का मतदाता राष्ट्रीयता को अब केवल नारे में नहीं, शासन में देखना चाहता है। उसके लिए राष्ट्रीयता सीमा की सुरक्षा भी है, नागरिकता की स्पष्टता भी है, सांस्कृतिक सम्मान भी है, कल्याणकारी सुविधा भी है, ढांचागत विकास भी है, महिला सुरक्षा भी है और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई भी है। वह केवल भाषण नहीं चाहता; वह ठोस परिणाम चाहता है। वह केवल पहचान नहीं चाहता, वह व्यवस्था चाहता है। वह केवल विकास नहीं चाहता; वह गरिमा चाहता है। भाजपा ने जहां-जहां इन बिंदुओं को संगठनात्मक श्रम और राजनीतिक रणनीति से जोड़ा, वहां जनता ने उसे सुना।

भाजपा की परीक्षा
भाजपा का मॉडल अब भी परीक्षा से मुक्त नहीं है। जनादेश अहंकार का प्रमाणपत्र नहीं, उत्तरदायित्व का भार है। पश्चिम बंगाल में इतनी बड़ी विजय के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न होगा, क्या वह प्रतिशोध के बजाय न्याय, शोर के बजाय शासन, और उत्सव के बजाय व्यवस्था को प्राथमिकता देगी? क्या वह राजनीतिक हिंसा की स्मृति से पीड़ित समाज को कानून-व्यवस्था का भरोसा दे सकेगी? क्या वह बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा का सम्मान करते हुए आर्थिक पुनर्जीवन, रोजगार, निवेश और प्रशासनिक पारदर्शिता ला सकेगी? जीत पहाड़ की चोटी है तो शासन उस चोटी पर टिके रहने की परीक्षा।
फिर भी यह मानना होगा कि भाजपा ने अपनी राजनीति में कुछ ऐसे तत्व साधे हैं जिन्हें विपक्ष ने या तो कम आंका या समझा ही नहीं, सुशासन, पारदर्शिता का दावा, रणनीतिक प्रबंधन, सहयोगियों को साथ रखने की क्षमता, अपेक्षाओं को नियंत्रित करने का कौशल, बूथ-स्तर तक संगठन की पकड़ और नेतृत्व की स्पष्टता। विपक्ष भय दिखाता रहा, भाजपा ने ढांचा बनाया। विपक्ष संविधान की पुस्तक लहराता रहा, भाजपा ने मतदाता की कतारों में कार्यकर्ता खड़ा किया। विपक्ष ने सामाजिक गणित पर भरोसा किया; भाजपा ने राजनीतिक केमिस्ट्री बनाने की कोशिश की। यही अंतर कई राज्यों में निर्णायक बनता दिखा।

इस पूरे परिदृश्य में विपक्ष की सबसे बड़ी विफलता यही है कि वह “भाजपा क्यों नहीं” तो बताता है, पर “भाजपा के स्थान पर क्या” इसका विश्वसनीय उत्तर नहीं देता। केवल तुष्टिकरण, जातिगत गुणा-भाग, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण, संस्थाओं पर अविश्वास, मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं और नरेंद्र मोदी-विरोध अब पर्याप्त नहीं। लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, पर विरोध अपने आप विकल्प नहीं बनता। विकल्प के लिए दृष्टि चाहिए, नेतृत्व चाहिए, संगठन चाहिए, और सबसे बढ़कर जनता के मन को सम्मान से पढ़ने की क्षमता चाहिए।
बंगाल की ऐतिहासिक एकजुटता इसलिए भारत के भविष्य में दर्ज होगी। यह केवल कमल का खिलना नहीं, यह उस मिट्टी का बदलना है जिसे लंबे समय तक एक ही फसल के लिए अभिशप्त मान लिया गया था। असम ने सीमा की चेतना को स्वर दिया। केरल ने वाम की थकान को उजागर किया। तमिलनाडु ने पुराने ढांचों की दरार दिखाई। पुडुचेरी ने स्थानीय नेतृत्व और राष्ट्रीय समन्वय का संतुलन दिखाया। इन सबके बीच बंगाल ने सबसे ऊंची आवाज में कहा कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान, लोकतांत्रिक सहभागिता और राष्ट्रवादी चेतना मिलकर इतिहास की दिशा मोड़ सकते हैं।
जनता केवल सरकार नहीं बदलती, वह राजनीति की भाषा बदलती है। दल बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, गठबंधन बनते और टूटते हैं, पर लोकतंत्र का अंतिम निर्णायक जनता ही रहती है। जब जनता शांत रहती है तो सत्ता उसे मौन समझती है; जब जनता बोलती है तो इतिहास उसे जनादेश कहता है। इस बार जनता ने केवल मत नहीं डाले, उसने कई पुराने दावों की धूल झाड़ी, कई बनावटी दुर्गों के दरवाजे खोले, और राष्ट्रवादी राजनीति को एक नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का संकेत दिया। जब जनता मैदान में उतरती है, तब इतिहास केवल लिखा नहीं जाता, दिशा बदल देता है।
कार्यकर्ताओं का सपना हुआ पूरा
कोलकाता के रहने वाले निर्मलेंदु कहते हैं, “साल 1999 की बात है। मैं उस समय नौवीं कक्षा में पढ़ता था। पश्चिम बंगाल में वामपंथी (सीपीएम) सरकार का शासन था। कोलकाता के पाइकपाड़ा इलाके में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की एक मूर्ति स्थापित थी। उस दिन भाजपा के दस-बारह कार्यकर्ता मूर्ति के समीप इकट्ठा हुए थे। उन्होंने जगह साफ की, मूर्ति पर माला चढ़ाई और श्रद्धा के साथ भाषण दे रहे थे। तभी अचानक एक जीप में सवार सीपीएम के गुंडे वहां पहुंच गए।
भाजपा कार्यकर्ताओं में भगदड़ मच गई। गुंडों ने मूर्ति पर चढ़ी माला उतार दी, उसके चेहरे पर गंदगी पोत दी और मूर्ति पर पेशाब कर दिया। फिर वे जीप लेकर चले गए। पंद्रह मिनट बाद भाजपा के कार्यकर्ता वापस लौटे। उन्होंने चुपचाप मूर्ति की सफाई की, फिर से माला चढ़ाई और जहां से छूटा था, वहीं से भाषण जारी कर दिया-जैसे कुछ हुआ ही न हो।”
मैंने एक कार्यकर्ता से पूछ लिया, “आप लोग विरोध क्यों नहीं करते?” उन्होंने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में जवाब दिया, “जिंदा रहना पहले जरूरी है भाई। यहां विरोध का मतलब है हत्या।”
मेरे मन में तल्खी थी। स्कूल के साथ-साथ आधा पत्रकार बन चुका था, इसलिए मैंने तीखे लहजे में पूछा, “तो फिर इकट्ठे क्यों होते हो? घर पर ही रह लिया करो न?” उस आम बंगाली भाजपा कार्यकर्ता ने जो जवाब दिया, वह आज भी याद है। उसने कहा, “जब कोई साथ न दे, तब भी अकेले चलना—यह बंगाल की संस्कृति है। हम इकट्ठा इसलिए होते हैं कि हर बार यह संकल्प दोहरा सकें कि एक दिन इस अत्याचारी शासन को उखाड़ फेंकेंगे। और उस दिन पश्चिम बंगाल में सच्चे अर्थों में जनता का शासन आएगा। इसके लिए हम तीस साल, चालीस साल या पचास साल—जितना भी समय लगे, संघर्ष करने को तैयार हैं।”
आज, उस संकल्प ने रंग दिखाया है। पाइकपाड़ा के उस साधारण भाजपा कार्यकर्ता का सपना पूरा हो चुका है। दशकों के अथक संघर्ष, बलिदान और धैर्य के बाद पश्चिम बंगाल में वामपंथी आतंक का अंत हुआ। लोकतंत्र की जीत हुई।
यह कहानी सिर्फ एक मूर्ति की सफाई की नहीं है। यह उस अटूट इच्छाशक्ति की कहानी है, जो डर के साये में भी बुझती नहीं, बल्कि और प्रज्वलित होती है। यह उन अनगिनत अज्ञात कार्यकर्ताओं की कहानी है, जिन्होंने चुपचाप मूर्ति साफ करते हुए भी एक युग को बदलने का बीज बोया था।
विधान सभा चुनाव परिणाम : भविष्य में सतर्कता की एक गहरी दस्तक भी

















