कोलकाता के रहने वाले निर्मलेंदु कहते हैं, “साल 1999 की बात है। मैं उस समय नौवीं कक्षा में पढ़ता था। पश्चिम बंगाल में वामपंथी (सीपीएम) सरकार का शासन था। कोलकाता के पाइकपाड़ा इलाके में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की एक मूर्ति स्थापित थी। उस दिन भाजपा के दस-बारह कार्यकर्ता मूर्ति के समीप इकट्ठा हुए थे। उन्होंने जगह साफ की, मूर्ति पर माला चढ़ाई और श्रद्धा के साथ भाषण दे रहे थे। तभी अचानक एक जीप में सवार सीपीएम के गुंडे वहां पहुंच गए।
भाजपा कार्यकर्ताओं में भगदड़ मच गई। गुंडों ने मूर्ति पर चढ़ी माला उतार दी, उसके चेहरे पर गंदगी पोत दी और मूर्ति पर पेशाब कर दिया। फिर वे जीप लेकर चले गए। पंद्रह मिनट बाद भाजपा के कार्यकर्ता वापस लौटे। उन्होंने चुपचाप मूर्ति की सफाई की, फिर से माला चढ़ाई और जहां से छूटा था, वहीं से भाषण जारी कर दिया-जैसे कुछ हुआ ही न हो।”
मैंने एक कार्यकर्ता से पूछ लिया, “आप लोग विरोध क्यों नहीं करते?” उन्होंने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में जवाब दिया, “जिंदा रहना पहले जरूरी है भाई। यहां विरोध का मतलब है हत्या।”
मेरे मन में तल्खी थी। स्कूल के साथ-साथ आधा पत्रकार बन चुका था, इसलिए मैंने तीखे लहजे में पूछा, “तो फिर इकट्ठे क्यों होते हो? घर पर ही रह लिया करो न?” उस आम बंगाली भाजपा कार्यकर्ता ने जो जवाब दिया, वह आज भी याद है। उसने कहा, “जब कोई साथ न दे, तब भी अकेले चलना—यह बंगाल की संस्कृति है। हम इकट्ठा इसलिए होते हैं कि हर बार यह संकल्प दोहरा सकें कि एक दिन इस अत्याचारी शासन को उखाड़ फेंकेंगे। और उस दिन पश्चिम बंगाल में सच्चे अर्थों में जनता का शासन आएगा। इसके लिए हम तीस साल, चालीस साल या पचास साल—जितना भी समय लगे, संघर्ष करने को तैयार हैं।”
आज, उस संकल्प ने रंग दिखाया है। पाइकपाड़ा के उस साधारण भाजपा कार्यकर्ता का सपना पूरा हो चुका है। दशकों के अथक संघर्ष, बलिदान और धैर्य के बाद पश्चिम बंगाल में वामपंथी आतंक का अंत हुआ। लोकतंत्र की जीत हुई।
यह कहानी सिर्फ एक मूर्ति की सफाई की नहीं है। यह उस अटूट इच्छाशक्ति की कहानी है, जो डर के साये में भी बुझती नहीं, बल्कि और प्रज्वलित होती है। यह उन अनगिनत अज्ञात कार्यकर्ताओं की कहानी है, जिन्होंने चुपचाप मूर्ति साफ करते हुए भी एक युग को बदलने का बीज बोया था।
















