पश्चिम बंगाल में इस बार सिर्फ सरकार नहीं बदली, दशकों से चले आ रहे भय, हिंसा और राजनीतिक आतंक के खिलाफ जनता ने निर्णायक आवाज उठाई है। यह जनादेश उन लोगों की जीत है, जिन्होंने लंबे समय तक खामोशी, दबाव और रक्तरंजित राजनीति का सामना किया।
लेकिन इस बदलाव की राह आसान नहीं थी, इसके लिए यहां के लोगों को कितनी पीड़ा झेलनी पड़ी, संघर्ष करना पड़ा, बलिदान देना पड़ा, तब जाकर लोगों को यह परिणाम मिला है।
आजादी की एक कीमत होती है, जो चुकानी पड़ती है। हमने चुकाई है, इसलिए हमारे लिए यह अनुभूत तथ्य है। ये शब्द हर उस बंगाली के हैं जिसने भयावह वामपंथी शासन और तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी को झेला है।
असल मायनों में बंगाल के इस जनादेश को यदि ‘आजादी’ कहें, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जनमत को बंधक बनाने वाले जब जीतेंगे, तब रक्त स्नान कर खुशी का इजहार करेंगे और जब हार जाएंगे, तब रक्त बहाकर मातम मनाएंगे, जैसा इस बार भी देखने को मिल रहा है। अभूतपूर्व सुरक्षा इंतजामों के बाद भी ममताराज का खात्मा करने वाले सुवेन्दु अधिकारी के पीए की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है?
मोहम्मद अली जिन्ना के निर्देशों पर पश्चिम बंगाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट ऐक्शन डे’ के नाम पर कोलकाता की सड़कों पर खूनी खेल खेला था। दंगों में हजारों निर्दोष हिंदुओं का कत्लेआम किया गया था। सुहरावर्दी ने पुलिस तक को कोई कार्रवाई नहीं करने दी थी। यह सिर्फ और सिर्फ सारे बंगाल को पाकिस्तान में मिलाने की साजिश के चलते किया गया था। वही प्रवृत्ति बंगाल के राजनीतिक चरित्र के डीएनए में प्रवेश कर गई और समय-समय पर बंगाल की राजनीति में सिर उठाती रही।
डॉ. बिधान चंद्र राय, ज्योति बसु (शुरुआती कार्यकाल) और बुद्धदेव भट्टाचार्य के शासनकालों के अलावा बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य बार-बार रक्तरंजित होता रहा। इंसानी रक्त से सत्ता की बुनियाद को सींचने का यह प्रपंच बार-बार होता रहा। चाहे सिद्धार्थ शंकर रे का कार्यकाल हो, जो व्यवस्थित तौर पर राजनीतिक विरोधियों को ‘ठिकाने’ लगाने के लिए जाना गया; चाहे 34 साल का वाम राज हो, जो राजनीतिक हत्याओं और जनमत लूटने के व्यवस्थागत प्रयोग के लिए जाना गया; या उसके बाद डेढ़ दशक का ममता राज हो, जो मुस्लिम तुष्टीकरण, कटमनी और सिंडिकेट राज के खौफ को सत्ता की सीढ़ी बनाने के लिए जाना गया; बंगाल के मानस में यह बात बार-बार ठूंसी गई कि बंगाल की भौगोलिक आजादी को अपनी आजादी समझने की भूल न करे।
रक्त और भय की राजनीति
इस संदर्भ में कह सकते हैं कि यह बंगाल के लिए दूसरी ‘आजादी’ है। लेकिन जिस तरह 1947 में मिली आजादी के लिए लाखों-लाख लोगों को रक्त बहाना पड़ा था, बंगाल की इस आजादी की नींव भी बड़ी संख्या में बलिदानियों के खून से सिंची है। कोलकाता के साल्ट लेक इलाके में रहने वाली अर्पणा बसु कहती हैं, “हां, बंगाल के लिए यह आजादी ही है। इसकी हमने भारी कीमत चुकाई। 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता राज ने जिस रक्त से स्नान कर जीत का जश्न मनाया, वह रक्त हमारा ही था।”
यह मामला अपने आप में अजूबा था। जब जीत का जश्न मनाने के लिए 60 के आसपास लोगों की हत्या कर दी गई थी, ममता को वोट न देने वालों के घरों में घुसकर महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था, जगह-जगह आगजनी की गई थी, मारपीट की गई थी।

भवानीपुर की रहने वाली चिन्मिता बिश्वास कहती हैं, “अगर किसी समाज के मनोबल को तोड़ना हो तो उसकी महिलाओं पर अत्याचार करो, लगता है यह ममताराज का सूत्र वाक्य था। संदेशखाली की महिलाओं को खुलेआम पार्टी कार्यालय में बुलाकर उनके साथ सामूहिक बलात्कार करवाना, आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड में बलात्कारी का साथ देना, भीड़ को उकसाकर घटनास्थल को तहस-नहस करके महत्वपूर्ण साक्ष्य मिटाना क्या नहीं बताता कि बंगाल की महिलाओं ने इस आजादी के लिए कितनी कुर्बानी दी?”
वह कहती हैं, “पश्चिम बंगाल में ममता ने खौफ का ऐसा मजबूत किला खड़ा कर रखा था, जिसे हिला पाना असंभव जैसा था क्योंकि लोगों को पता था कि अगर बात लीक हुई तो जान जाएगी, बहू-बेटियों की इज्जत से हाथ धोना पड़ेगा। चुनाव आयोग ने पिछले विधानसभा चुनाव में हजार से अधिक कंपनियां तैनात की थीं, उसके बाद भी ममताराज में रक्तरंजित जश्न मना। इस कारण इस बार न केवल ढाई हजार के आसपास कंपनियां तैनात की गईं बल्कि 700 के आसपास कंपनियां चुनाव के बाद भी तैनात रहेंगी।”
कार्यकर्ताओं का संघर्ष
अध्यापन के क्षेत्र से जुड़े देबाशीष नंदी कहते हैं, “संदेह नहीं कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि आम लोगों ने हिम्मत दिखाई और भयमुक्त होकर मतदान किया। जिस तरह शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक की हत्या हुई, उसे देखकर आप समझ सकते हैं कि लोगों ने कितना बड़ा खतरा मोल लिया और लोगों के मन में ममताराज को पलटने की कितनी तेज इच्छा थी। ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने मिलकर बंगाल का सत्यानाश कर दिया। यहां का जंगलराज बिहार से भी खतरनाक और व्यापक था।”
बंगाल की इस आजादी में भाजपा-संघ को बड़े बलिदान देने पड़े हैं। निशाने पर भाजपा-संघ इसलिए रहे क्योंकि ममता जानती थीं कि अगर उनकी सत्ता को किसी से सच्चा खतरा है, तो वह भाजपा-संघ की जोड़ी ही है। इसीलिए इस आजादी की एक बड़ी कीमत इनसे जुड़े लोगों को उठानी पड़ी।
पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर देबंजन कहते हैं,“यह आजादी ऐसे नहीं मिली। इसके लिए हमने लगातार संघर्ष किया, अपना खून बहाया। बंगाल की यह लड़ाई बंगाल की नहीं, देश की थी। वैसे ही, जैसे जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर के लिए जान की बाजी लगा रहे थे, तब वह लड़ाई कश्मीर के लिए नहीं, इस देश के लिए थी। बंगाल की भी यह लड़ाई सभ्यतागत लड़ाई थी। अच्छी बात है कि हमने इसका आरंभिक दौर जीता है, अब भारत और बंगाल के खोए ‘स्व’ की स्थापना करनी है।”
इसलिए जब आज हम बंगाल की इस ‘आजादी’ का उत्सव मना रहे हैं तो समय है उन बलिदानियों को स्मरण करने का भी, जिन्होंने इसके लिए अपने रक्त से भारत की सांस्कृतिक-राजनीतिक स्वतंत्रता को दिशा देने वाली माटी को सींचा है।

















