समुद्र का संविधान: क्या कोई देश महासागर पर कब्जा कर सकता है? जानें UNCLOS के नियम और गहराता वैश्विक संघर्ष
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समुद्र का संविधान: क्या कोई देश महासागर पर कब्जा कर सकता है? जानें UNCLOS के नियम और गहराता वैश्विक संघर्ष

होर्मुज से दक्षिण चीन सागर तक छिड़ी वर्चस्व की जंग। जानिए क्या कहता है समुद्र का 'संविधान' और क्यों बेअसर हो रहे अंतर्राष्ट्रीय नियम।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Shivam Dixit
May 8, 2026, 09:00 pm IST
inविश्व, विश्लेषण, संविधान
iran rejected trump ceasefire, attacks euphoria ship in hormuz

Constitution of the Sea UNCLOS : क्या आपने कभी सोचा है कि जिस समुद्र से दुनिया का 90% व्यापार होता है, उसका असली मालिक कौन है? वहीं होर्मुज जलसंधि के बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो समुद्र पर नियम /कानूनों को बनाती हो?

क्या कोई अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून वास्तव में शक्तिशाली देश को नियंत्रित करते हैं?

ईरान द्वारा जहाज को रोकना, अमेरिका द्वारा अंतर्राष्ट्रीय जल में जहाज को जब्त करना, दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक गतिविधियां और आर्कटिक महासागर में रूस अमेरिका चीन की बढ़ती प्रतिस्पर्धा आदि यह घटनाएं यह बताती है कि इस समय समुद्र केवल व्यापार का माध्यम नहीं, एक वैश्विक शक्ति संघर्ष का केंद्र बन चुका है।

आज की दुनिया में समुद्र का महत्व वैसा ही है, जैसा कभी प्राचीन काल में रेशम मार्ग का हुआ करता था। विश्व व्यापार का लगभग 90% भाग समुद्री मार्ग से होता है, आज सैन्य रणनीति , राजनैतिक रूप से समुद्र का महत्त्व सामने आ रहा है इसीलिए कहा जाता है कि जिस राष्ट्र का समुद्र पर प्रभाव होगा, वही भविष्य की विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगा।

ऐसे में प्रश्न उठता है क्या कोई देश समुद्र पर कब्जा कर सकता है ? समुद्री संसाधनों और समुद्री मार्गों पर किसका अधिकार होगा ? क्या भविष्य में समुद्र को लेकर संघर्ष और बढ़ेंगे ?

समुद्र का संविधान-यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ़ सी UNCLOS)

वास्तव में समुद्र को लेकर यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ़ सी अर्थात समुद्र का संविधान है। इसकी स्थापना 1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्गत बनी एक अंतरराष्ट्रीय संधि से हुई, जो समुद्र से जुड़े सभी विवादों का समाधान करती है. इसलिए ऐसे समुद्र का संविधान कहते हैं, यह बताती है कि समुद्री सीमाएं कहां तक होगी, समुद्री संसाधन पर किसका अधिकार होगा, जहाज के आवागमन के नियम क्या होंगे तथा उससे जुड़े देशों के अधिकार और दायित्व क्या होंगे।

वास्तव में इसका मूल सिद्धांत है महासागर संपूर्ण मानवता की सांझी धरोहर है।  कोई भी देश संपूर्ण समुद्र पर अपना स्वामित्व या अपना दावा नहीं कर सकता। समुद्री क्षेत्र को निम्न भागों में बांटा हुआ है-

आधार रेखा (बेस लाइन )

आधार रेखा, समुद्र तट के साथ न्यूनतम ज्वार रेखा होती है। सभी समुद्री सीमाओं की माप यही से शुरू होती है

आंतरिक जल (इंटरनल वाटर)

आधार रेखा के भीतर स्थित जल क्षेत्र को कहते, जिसमे बंदरगाह , खाड़ी और  नदी के मुहाने आदि आते हैं। यहां राज्य की पूर्ण संप्रभुता होती है। यह उसकी भूमि की तरह ही क्षेत्र माना जाता है। यहां किसी भी बाहरी जहाज को स्वत : प्रवेश करने का अधिकार नहीं होता।

प्रादेशिक सागर (Territorial Sea)

आधार रेखा से 12 नॉटिकल मील तक संबंधित देश की संप्रभुता  होती है, यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ सी का अनुच्छेद 17 कहता है कि  विदेशी जहाजों को यहां इनोसेंट पैसेज का अधिकार होगा अर्थात जहाज बिना रुके गुजरेंगे लेकिन उसे देश की सुरक्षा को खतरा नहीं पहुंचा सकते।

सन्निहित क्षेत्र (Contiguous Zone)

यह 24 नॉटिकल मील तक होता है। यहां संबंधित देश सीमा शुल्क, कर  और आव्रजन आदि नियम लागू कर सकते हैं।

विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ)

यह 200 नॉटिकल मील तक होता है।  संबंधित देश को यहां तेल गैस निकालने का,मत्स्य  पालन करने का, समुद्री संसाधनों के उपयोग का एवं समुद्री परियोजनाओं का अधिकार होता है, लेकिन यह पूर्ण स्वामित्व नहीं है। यहां अन्य देशों को जहाज चलाने, समुद्री केवल बिछाने और  हवाई उड़ान की स्वतंत्रता बनी रहती है।

उच्च समुद्र (High Sea )

यह विशेष आर्थिक क्षेत्र के बाहर का समुद्री क्षेत्र होता है।  यहां पर किसी भी देश का अधिकार नहीं होता है। अनुच्छेद 87 कहता है कि सभी देशों को यहां मुक्त  नौवहन का अधिकार होगा और इसे सब की साझी विरासत माना। जाएगा।

इंटरनेशनल मेरीटाइम आर्गेनाईजेशन (IMO )

इंटरनेशनल मेरीटाइम आर्गेनाईजेशन संयुक्त राष्ट्र संघ की एक समुद्री संस्था है। इसके कार्य समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना, जहाज के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक बनाना, तेल रिसाव, प्रदूषण को रोकना एवं  समुद्री दुर्घटनाओं को कम करना। इसके कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान है सोलस कन्वेंशन  (Safety of Life at Sea) जहाजों, चालक दाल और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु बनाया गया है।

मारपोल कन्वेंशन (Marine Pollution Convention) समुद्र में तेल रसायन प्लास्टिक और जहाज से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए नियम निर्धारित करता है। कोलरेजस  कन्वेंशन (Convention on the International Regulations for Preventing Collisions at Sea) समुद्री यातायात के नियम तय करता है जिससे जहाज की टक्कर रोकी जा सके और सुरक्षित नौवहन  सुनिश्चित हो।

इंटरनेशनल मेरीटाइम आर्गेनाईजेशन नियम बनाते हैं, कूटनीतिक दबाव डालते  है और सहयोग को बढ़ावा देता है ,लेकिन इसके पास अपनी कोई सेना नहीं है यह किसी भी देश को दंडित नहीं कर सकता। इसलिए यह केवल कागजों पर लिखे हुए नियम लगते है।

फिर प्रश्न उठता है कि क्या कोई देश समुद्र पर कब्जा कर सकता है ?

UNCLOS  के अनुसार कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय समुद्र मार्ग में खुले समुद्र पर कब्जा नहीं कर सकता।  इसका अनुच्छेद 38 कहता है कि जहाज, विमान को बिना रुकावट गुजरने का अधिकार है। इसलिए कोई भी देश मनमानी ढंग से उस पर टोल नहीं लगा  सकता , पूर्ण नाकेबंदी नहीं कर सकता।

तो फिर प्रश्न उठता है कि विवाद क्यों बढ़ रहे हैं ? दरअसल यहां पर कानून बनाम शक्ति का संघर्ष शुरू होता है।  जैसे दक्षिणी चीन सागर में चीन ने 9 डैश लाइन के आधार पर इस क्षेत्र पर दावा किया, लेकिन 2016 में हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय  ने कहा कि चीन का दवा UNCLOS  के अनुरूप नहीं है। फिर भी चीन यहां कृत्रिम द्वीप  बना रहा है, सैन्य अड्डे  स्थापित कर रहा है।  इससे  समझ में आता कि  शक्ति के आगे कई बार कानून कुछ कर नहीं पाते। यही समस्या आर्कटिक  महासागर को लेकर जो भविष्य का संघर्ष क्षेत्र रूस अमेरिका और चीन के बीच बन सकता है। बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग से बर्फ पिघल रही है, नए समुद्री मार्ग बना रहे हैं, विशाल तेल और गैस संसाधन सामने आ रहे हैं।  इसलिए भविष्य में आर्कटिक महासागर सबसे बड़े भू राजनीतिक संघर्ष  क्षेत्र बदल सकता है।  यही स्थिति  मलक्का जल संधि आदि को लेकर भी है है

क्या इससे भविष्य में समुद्री संघर्ष बढ़ेंगे ?

हां, अवश्य बढ़ेंगे क्योंकि ऊर्जा, संसाधनों की प्रतिस्पर्धा हो रही है।  समुद्री व्यापार मार्ग का महत्व बढ़ रहा है।  गहरे समुद्र में खनिज संसाधन खोजे जा रहे हैं।  आर्कटिक क्षेत्र एक नया  मार्ग हैं, जहाँ  चीन रूस अमेरिका की प्रतिस्पर्धा है।  इसलिए आने वाले समय में इंडो पेसिफिक क्षेत्र भविष्य की वैश्विक राजनीति का केंद्र बन जाएगा।

21वीं सदी में समुद्र वैश्विक शक्ति, व्यापार संसाधनों का संघर्ष  केंद्र बन चुका है।   यह संघर्ष मुक्त व्यापर ,  कानून और शक्ति के बीच का है ,हालांकि UNCLOS  और IMO  जैसी संस्थाएं महासागर को सब की साझा धरोहर बनाए रखने का प्रयास करती है, लेकिन वह तभी सफल मानी जाती है जब बड़ी शक्तियां इन अंतरराष्ट्रीय नियमों का संस्थाओं का सम्मान करें।  वास्तव में समुद्र किसी एक व्यक्ति की, किसी एक देश की जागीर नहीं बल्कि पूरी मानवता की धरोहर है, किंतु जब शक्तिशाली देश  उसे प्रभुत्व का माध्यम बना लेते हैं तब अंतरराष्ट्रीय कानून की सबसे कठिन परीक्षा आरंभ होती है।

Topics: Global TradeMaritime securityHormuz StraitUNCLOSInternational Maritime LawUnited Nationssouth china sea
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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