नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई के 13वें दिन गुरुवार को उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं और धर्म के मामलों को कोर्ट में चुनौती देने लगेंगे, तो इससे धर्म और समाज पर असर पड़ सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने कहा कि इससे सैकड़ों याचिकाएं आएंगी और हर रिवाज पर सवाल उठने लगेंगे।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हमारा समाज धर्म से गहराई से जुड़ा है। ऐसे में अगर हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाएगा तो भारतीय समाज पर असर पड़ेगा।
जस्टिस नागरत्ना ने क्या कहा
वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि व्यक्ति के धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक कामों के जवाब में किया गया कोई भी काम संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संवैधानिक सुरक्षा का विषय नहीं हो सकता है और इसलिए अनुच्छेद 26 के तहत धर्म का मामला नहीं हो सकता। उनकी इसी दलील पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कोर्ट को जो बात परेशान करती है, वह मुश्किल सवाल है कि धार्मिक रीति-रिवाजों को कैसे चुनौती दी जाती है। क्या सुधार पंथों के अंदर होना चाहिए या सरकारों के दखल से या कोर्ट के फैसले से।
दाऊदी बोहरा समुदाय की बहिष्कार परंपरा का उदाहरण
छह मई को कोर्ट ने उस तरीके पर सवाल उठाया था, जिसमें एक समूह ने उच्चतम न्यायालय के 1962 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित बहिष्कार की परंपरा को सही ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा था कि उस फैसले की समीक्षा के लिए पुनर्विचार याचिका या क्यूरेटिव याचिका दायर की जा सकती है, क्योंकि अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका कानूनसम्मत नहीं है। 5 मई को कोर्ट ने याचिकाकर्ता इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन को फटकार लगाते हुए उसकी 2006 की याचिका को कानून का दुरुपयोग बताया था। कोर्ट ने पूछा था कि आपने यह याचिका क्यों दायर की, क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच कर रही सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
















