महाराणा प्रताप जयंती : स्वाभिमानी अडिग प्रताप
June 24, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

महाराणा प्रताप जयंती : स्वाभिमानी अडिग प्रताप

महाराणा प्रताप का जीवन सामान्य अर्थों में किसी राजा की कथा नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्रनायक की कहानी है, जिसने अपने युग की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति, अकबर के सामने न केवल सैन्य प्रतिरोध किया, बल्कि वैकल्पिक शासन और जीवन पद्धति का आदर्श भी प्रस्तुत किया

Written byअनुराग सक्सेनाअनुराग सक्सेना
May 8, 2026, 11:47 pm IST
in भारत, विश्लेषण

जब-जब इस राष्ट्र की अस्मिता पर संकट आया, तब-तब किसी न किसी महायोद्धा ने जन्म लेकर इस भूमि की रक्षा की। 16वीं शताब्दी का भारत भी ऐसे ही संक्रमणकाल से गुजर रहा था, जब विदेशी सत्ता का विस्तार हो रहा था और भारतीय स्वाभिमान चुनौती के दौर में था। ऐसे समय में मेवाड़ की धरती से एक ऐसा सूर्य उदित हुआ, जिसने अपने तेज से पराधीनता के अंधकार को चुनौती दी, वह थे महाराणा प्रताप, एक तेजस्वी व्यक्तित्व, जो केवल पराक्रम का प्रतीक नहीं, बल्कि स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और आदर्श शासन-व्यवस्था का जीवंत उदाहरण है। प्रताप को केवल ‘महान योद्धा’ कहना पर्याप्त नहीं है, वे वास्तव में ‘गुड गवर्नेंस के जनक’ थे।

स्वाधीनता बनाम साम्राज्यवाद

16वीं शताब्दी का भारत राजनीतिक संक्रमण से गुजर रहा था। मुगल सत्ता अपने विस्तार के चरम पर थी और अधिकांश राजघरानों ने समझौते का मार्ग चुन लिया था। अकबर की महत्वाकांक्षा पूरे भारत को एक केंद्रीकृत साम्राज्य के अधीन लाने की थी। कई राजाओं ने अपनी सत्ता और वैभव को सुरक्षित रखने के लिए मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। किन्तु मेवाड़ की परंपरा सदैव स्वतंत्रता की रही थी। यह वही भूमि थी, जहां से महाराणा सांगा जैसे वीरों ने विदेशी शक्तियों को चुनौती दी थी। इसी परंपरा के उत्तराधिकारी के रूप में प्रताप का उदय हुआ। प्रताप ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए स्पष्ट कर दिया कि मेवाड़ की मिट्टी बिकाऊ नहीं है, और उसका स्वाभिमान किसी भी कीमत पर गिरवी नहीं रखा जा सकता।

प्रतिरोध की अमर गाथा

प्रताप के जीवन का सबसे चर्चित अध्याय है हल्दीघाटी का युद्ध। यह युद्ध केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के लिए भारतीय चेतना का उद्घोष था।18 जून 1576 को अरावली की घाटियों में जब प्रताप की सेना और मुगल सेना आमने-सामने हुईं, तब यह स्पष्ट था कि यह संघर्ष केवल भूभाग का नहीं, बल्कि विचारों का था, एक ओर साम्राज्यवाद, दूसरी ओर स्वाधीनता। प्रताप के पास सीमित संसाधन थे, जबकि मुगल सेना विशाल और सुसज्जित थी। फिर भी उन्होंने जिस साहस, नेतृत्व और रणनीति का परिचय दिया, उसने उन्हें अमर बना दिया।

संघर्ष काल में भी सृजन

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद प्रताप को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उन्हें जंगलों में रहना पड़ा, परिवार को कष्ट सहने पड़े, किन्तु उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा युद्ध और संघर्ष में बीता, किन्तु यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि वे केवल योद्धा नहीं थे। वे एक दूरदर्शी वास्तुकार , नगर नियोजक और संसाधन प्रबंधक भी थे। उनकी शासन शैली में ‘सुरक्षा, स्थायित्व और आत्मनिर्भरता’- तीनों का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

मुगलों के भीषण आक्रमणों को विफल करने के लिए किए गए सैन्य अभियानों के कारण महाराणा प्रताप को राज्य,जनता, शासन इत्यादि के लिए बेहद कम समय मिलता था, उसके उपरांत भी प्रताप ने मेवाड़ को मुगल थानों से मुक्त करने के संकल्प को क्रियान्वित करने के लिए निरंतर अभियान जारी रखते हुए भी सृजन की गतिविधियों को गति देने का कार्य किया। उन्होंने मेवाड़ के पर्वतीय प्रदेशों जैसे उदयपुर, कुंभलगढ़, गोगुंदा, मोही, दिवेर, मदारिया, हल्दीघाटी इत्यादि को अपने अधिकार में ले लिया गया, उसी के साथ अपने पुत्र अमर सिंह के साथ मिलकर संयुक्त अभियान करते हुए जहाजपुर के मुगल परगने को भेद कर मोरवाड़ा हाडोती की सीमा भेदने जैसा दुष्कर कार्य भी किया। पर्वतीय प्रदेशों के साथ मैदानी भाग एवं चित्तौड़ से पूर्व का समतल क्षेत्र भी मुगल विहीन कर दिया गया।

संघर्ष के दिनों में प्रताप वनवासी जीवन बिताते हुए भी निर्माण कार्यों की निरंतरता के प्रति सचेत रहे, उन्होंने हल्दीघाटी से 6 मील की दूरी पर स्थित चारों ओर पहाड़ों से घिरे पानी के स्रोत के पास स्थित पहाड़ी में ‘मायरा की गुफा’ को हल्दीघाटी के समय और उसके पश्चात भी शस्त्रागार के रूप में निर्मित एवं विकसित किया। यह गुफा गहरी है, अंधेरी है और तीन तलों में लंबी दूरी तक फैली हुई है यहां से 10-12 मील तक दूर देखा जा सकता है, परंतु अति निकट जाने पर भी यह गुफा दिखाई नहीं देती है। इस गुफा के आसपास जो निर्माण दिखाई देते हैं वह स्थाई प्रकृति के होने के उपरांत भी योजना पूर्वक इतने सामान्य बनाए गए कि देखने पर ऐसा न लगे कि महाराणा अपने शस्त्रागार को यहां संचालित कर रहे हैं।

इसी प्रकार कुंभलगढ़ से लगभग 14 मील की दूरी पर मचींद गांव की पहाड़ी पर एक गढ़ स्थित है जिस गढ़ को कुंभा द्वारा बनवाया गया था, यहां भी संकटकालीन स्थिति में रहने योग्य समस्त व्यवस्थाएं प्रताप के द्वारा विकसित की गई थी, ऐसा कहते हैं कि इस गुफा की सुरंग से कुंभलगढ़ तक जाया जा सकता था। करदा – बरवाड़ा के निकट रोहिड़ा गांव में, उदयपुर से 16 मील पश्चिम में उबेश्वर नामक तीर्थ स्थान के ढलान में और उदयपुर से 40 मील दूर पश्चिम में कमलनाथ नाम के पास आवरगढ़ नाम का किला ऐसे अन्य स्थान है जहां प्रताप ने विभिन्न प्रकार के निर्माण करवाए थे।

आवरगढ़ नाम के स्थान पर जो अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में है एक सुरक्षात्मक परकोटा बना हुआ है और पानी की पर्याप्त मात्रा है। महाराणा प्रताप हल्दीघाटी युद्ध के तुरंत पश्चात इस स्थान पर रहे थे। महाराणा प्रताप ने बगराना गांव के निकट हरिहर मंदिर का निर्माण करवाया था, इस अद्भुत मंदिर में काले संगमरमर की प्रतिमा हरि अर्थात विष्णु और हर अर्थात शिव को व्यक्त करती है। प्रताप के राज्य में शैव और वैष्णव मतों के इस प्रकार समन्वय का यह अभूतपूर्व उदाहरण है।

मेवाड़ चित्र कला शैली

चावण्ड में नवीन राजधानी बनाने का निर्णय

जब प्रताप सिंहासन पर बैठे तो उनके समक्ष दो प्रमुख समस्याएं थी पहली पिता उदय सिंह द्वारा नई राजधानी उदयपुर और उसके आसपास गिर्वा में बसी बस्तियों की समुचित व्यवस्था एवं सुरक्षा तथा उदय सागर के निर्माण से विस्थापित हो चुकी बस्तियों की पुनर्स्थापना।

दूसरी समस्या थी अकबर की साम्राज्यवादी नीति पर लगाम कसते हुए अपने कुल गौरव की रक्षा करना तथा मेवाड़ को अजेय, अभेद्य के रूप में स्थापित करना। प्रथम समस्या के समाधान के लिए उन्होंने मेवाड़ की संपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था को सामरिक आधार पर एक नई प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में स्थापित किया एवं ‘जहां राणा वही राजधानी’ की सफल परिपाटी स्थापित कर संघर्ष के साथ-साथ प्रशासन की नई परिपाटियां स्थापित की।

दूसरी समस्या के समाधान के लिए महाराणा प्रताप ने कुंभलगढ़ एवं गोगुंदा के मध्य केंद्र बनाकर अपने शेष राज्य को व्यवस्थित करने का प्रयास प्रारंभ किया। छप्पन क्षेत्र पर भी अधिकार कर यहां रहने वाली सभी जनजातियों को प्रशासनिक दृष्टि से संगठित किया और उन्हें मेवाड़ का प्रशासनिक अंग बना लिया। सामरिक दृष्टि से कुंभलगढ़ को केंद्र बनाकर समूचे गोड़वाड़ पर प्रशासनिक पहल प्रारंभ की और अरावली की सभी पहाड़ियों पर अपनी चौकियां स्थापित कर प्रशासनिक तंत्र का विस्तार किया। प्रताप ने प्रशासन के पुराने ढांचे को बदलकर क्षेत्रगत एवं सामरिक आवश्यकताओं के अनुरूप नवीन ढांचे का निर्माण किया जिसके द्वारा सीमित सुविधाओं, साधनों एवं जनशक्ति के आधार पर रक्षात्मक युद्ध करते हुए भी प्रशासन चलाया जा सके। 1582 ईस्वी के पश्चात चावंड में नई राजधानी एवं प्रशासनिक तंत्र का ढांचा जमाने की स्थिति बनी।

प्रताप के अंतिम 12 वर्ष जो उनके कूटनीतिक संघर्षशील जीवन को और भी दैदीप्यमान करते हैं वे चावंड में ही निकले । यहां तक कि प्रताप के जाने के उपरान्त भी उनके पुत्र महाराणा अमरसिंह जी ने भी 16 वर्षों तक चावंड को ही मेवाड़ की राजधानी रखा, अर्थात लगभग 28 वर्षो तक चावण्ड मेवाड़ का केन्द्र बिंदु रहा। महाराणा प्रताप ने तत्कालीन परिस्थितियों एवं मुगल सेना की प्रबलता को ध्यान में रखते हुए परंपरागत जागीरदारी प्रथा पर आधारित सैन्य प्रबंध जिसमें जागीरदार ही अपनी जागीर की आय के अनुसार सैन्य प्रबंध करते थे तथा विभिन्न जागीरों की सैन्य टुकड़ियों के मिलने पर राज्य की प्रधान सेना का निर्माण होता था उसे परिवर्तन करने का निर्णय किया। प्रताप ने राज्य की केंद्रीय सेना के गठन पर जोर दिया। सेना का संचालन स्वयं प्रताप की योजना के अनुसार होता था।

रचनात्मक कार्य

महाराणा प्रताप के काल में संस्कृत, डिंगल, मेवाड़ी एवं वागड़ी में कई प्रकार के साहित्यिक एवं वैज्ञानिक ग्रन्थों का सृजन हुआ। विशेष रूप से महाराणा प्रताप के दरबारी पंडित चक्रपाणि मिश्र द्वारा रचित ग्रंथ ‘विश्व वल्लभ’ जिसमें कृषि, वृक्ष विज्ञान एवं जल संसाधन विषयक विशिष्ट वर्णन किए गए हैं। इस ग्रंथ में वर्तमान के प्राणी शास्त्र, परिस्थितिकी विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, जीव विज्ञान आदि का समावेश किया गया है। पंडित चक्रपाणि मिश्र की दूसरी महत्वपूर्ण कृति ‘मुहूर्त माला’ ज्योतिष शास्त्र का प्रतिनिधित्व करने वाली अत्यंत महत्वपूर्ण रचना है। इसी क्रम में पंडित चक्रपाणि मिश्र की रचना ‘राज्याभिषेक पद्धति’ ऋग्वेद यजुर्वेद और सामवेद सहित ब्राह्मण मुहूर्त ग्रंथों और विष्णु धर्मोत्तर जैसे पुराने ग्रन्थों के आलोक एवं राज्याभिषेक की प्राचीन भारतीय पद्धति को मूल आधार बनाकर लिखी गई है।

प्रताप का सृजन काल (1582 – 1597 ईस्वी)

1586 ईस्वी से 1597 ईस्वी के इन लगभग 12 वर्षों के काल को प्रताप के स्वर्ण काल के रूप में जाना जा सकता है। इस युग में प्रताप ने शांति, स्थिरता, विकास एवं जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए कुशल प्रशासन करने हेतु अपनी प्रशासनिक नीति का निर्धारण किया जिनके महत्वपूर्ण लक्ष्य निम्न प्रकार थे –
1.मुगल शासित क्षेत्रों से अर्थ वसूली को स्थगित रखने तथा अपने हस्तगत क्षेत्र में सजग व्यवस्था
2.मांडलगढ़ व चित्तौड़ में अहस्तक्षेप नीति के साथ मालवा एवं गुजरात के व्यापारिक मार्गों पर तटस्थ बने रहते हुए मेवाड़ में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देना
3.मेवाड़ की विपन्नावस्था की समाप्ति हेतु कृषि, व्यापार, उद्योग धंधे एवं मानव संसाधनों की ओर ध्यान देना
4.वृक्षों का संरक्षण और जल संसाधनों का विकास करना
5.मुगल प्रतिरोध अथवा रक्षा के लिए सैन्य संगठन तथा सैन्य वृद्धि के लिए आर्थिक संसाधनों की वृद्धि करना
6.मेवाड़ के सर्व सामान्य तक राणा का सीधा संपर्क
इसी प्रकार इन दिनों में युद्धोत्तर नीति का निर्माण किया गया जो रक्षात्मक थी एवं उसका मूल उद्देश्य मुगल आधिपत्य को रोकना तथा जन धन की रक्षा करते हुए आक्रांता को यथा अवसर हानि पहुंचाते रहना था। अपनी रक्षा तथा मुगलों पर दबाव बनाए रखना इसका अंग था। संपूर्ण पर्वतीय प्रदेश की किलाबंदी करके शत्रु को घुसने नहीं देना इस नीति का आधार स्तंभ था। इसकी क्रियान्विति हेतु सारी व्यवस्था को सर्व सामान्य तथा वनवासी भील समुदाय के सहयोग के साथ महाराणा प्रताप ने संचालित किया था जिसके महत्वपूर्ण आधार बिन्दु निम्नलिखित थे –

स्थापत्य कला

प्रताप कालीन स्थापत्य, स्मारक, मूर्तिकला एवं चित्रकला के अवशेष प्रताप को वीर स्वाभिमानी तथा अपने कुल को गौरव प्रदान करने वाला तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षक एवं पोषक के रूप में सिद्ध करते हैं। भोमट एवं छप्पन के पर्वतीय क्षेत्र में कई स्थापत्य एवं स्मारक जो आज भग्नावशेष के रूप में है, प्रताप ने अपनी युद्ध नीति के अंतर्गत बनवाए। यद्यपि उनमें से कोई बड़ा दुर्ग या गढ़ नहीं था तथापि यह बहुत ही योजना पूर्वक तथा महत्वपूर्ण युद्ध नीति के अंग थे।

महाराणा प्रताप ने अपने शांति काल में चावंड में निसारदीन नाम के एक चित्रकार को राजाश्रय दिया तथा उनकी प्रेरणा से उसे चित्रकार ने जो चित्र बनाए उससे एक विशिष्ट शैली का आविष्कार हुआ, जिसे हम चित्रकला में चावंड शैली के नाम से जानते हैं। यह चित्रकला शैली कालांतर में विकसित होते हुए आज मेवाड़ चित्रकला शैली के नाम से विख्यात है।

जल प्रबंधन एवं संरक्षण

महाराणा प्रताप ने जल प्रबंधन तथा संरक्षण का विशिष्ट ध्यान रखा था। आवरगढ़ किले में पांच तालाब एवं बावड़ी बनाई गई है। दुर्ग के चारों ओर 10 फीट ऊंची प्राचीर बनी है, यहां कुछ निर्माण कार्य एवं जल संचयन का विस्तार किया गया था, जिनकी भराव क्षमता 1,51,34,5 9,000 लीटर है यह जल यहां प्रस्तावित निर्माण कार्य एवं कृषि तथा अकाल के दौर के लिए सुरक्षित भी रखा जाता था। चावंड के कटावाला नामक तालाब की लंबाई 100 फीट, चौड़ाई 65 फीट तथा गहराई 50 फीट है, यहां पर दीवारों पर चूने का प्लास्टर किया गया है। इसकी भराव क्षमता 18 करोड़ लीटर है। महाराणा प्रताप के समय में ही प्रथम बार पौराणिक आधार पर चल रहे भू विभाजन
1. जंगल प्रदेश 2. अनूप प्रदेश 3. मरू प्रदेश से आगे बढ़ते हुए उसमें साधारण तथा पर्वतीय प्रदेशों को जोड़ा गया। प्रताप ने ही इस वर्गीकरण की आज्ञा दी थी, इसका मूल उद्देश्य जल संधारण एवं वनस्पति विकास था,इसके प्रमुख आयाम इस प्रकार हैं –

भूमि की परख

  • प्रताप के काल में भूमि वर्गीकरण का नवीन आधार प्रस्तुत किया गया अब भूमि को अम्लीय, लवणीय तथा क्षारीय रस को आधार बनाकर वर्गीकृत किया गया, जिसका निर्धारण चख कर किया जाने लगा और इसी को आधार बनाकर कृषि एवं वृक्षारोपण का कार्य किया गया।
  •  कृषि क्षेत्र में उत्पादित शाक तरकारियों की पैदावार बढ़ाने एवं नस्ल संवर्धन के विशेष कार्य किए गए। बिना गुठली वाले फलों को उगाने के तरीके खोजे गए। तिल, जौ , दाल, सरसों की पैदावार बढ़ाने के प्रयोग हुए। वृक्ष संरक्षण एवं सुरक्षा की विधियों को पुनर्जीवित किया गया।

प्रताप ने न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा की, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों की भी रक्षा की। उन्होंने मंदिरों और सांस्कृतिक स्थलों को संरक्षण दिया और यह सुनिश्चित किया कि मेवाड़ की पहचान अक्षुण्ण रहे। उनके जीवन हमें नैतिक नेतृत्व, जनभागीदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण जैसे सिद्धांत को सिखाता है। महाराणा प्रताप का जीवन हमें यह विश्वास दिलाता है कि यदि संकल्प अडिग हो, तो परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, विजय अंततः सत्य और स्वाभिमान की ही होती है।

Topics: सांस्कृतिकसाम्राज्यवादसामाजिकमेवाड़ की आजादीपर्यावरणशासन और प्रशासनआत्मनिर्भरताविश्व वल्लभसांस्कृतिक चेतनावृक्ष विज्ञानपाञ्चजन्य विशेषनस्ल संवर्धनस्वाभिमाननैतिक नेतृत्वहल्दीघाटी का युद्धराष्ट्र की अस्मिताअडिग प्रतापस्वाधीनता
ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

जी 7, पश्चिम एशिया और भारत के सधे कदम

dr Shyama prasad Mukharjee mystirious death

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान : नेहरू की भूमिका, मौत के पीछे की साजिश, मां का पत्र और बेटी का रहस्योद्घाटन

महान वीरांगना रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावती: स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वालीं महान वीरांगना

संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार

राष्ट्र-चिंतक डॉ. हेडगेवार

बनाएं स्वामी विवेकानंद के सपनों का भारत

महाराणा प्रताप और इस्लामिक आक्रांता अकबर

हल्दीघाटी के मैदान में असल में हुआ क्या था, आखिर हल्दीघाटी किसके नाम रही? जानें सच

Load More

ताज़ा समाचार

Mahrang Baloch Sentenced to Life Imprisonment Pakistan Army Balochistan Protest

पाकिस्तान में तानाशाही हावी: बलूच एक्टिविस्ट डॉ. महरंग बलोच को उम्रकैद, उबाल पर बलूचिस्तान, सड़कों पर उतरा जनसैलाब!

उत्तराखंड पुलिस की फर्जी इंस्टाग्राम ID : सीनियर अफसर का बनाया ‘डीपफेक’ वीडियो, मोहम्मद लुकमान गिरफ्तार

आपातकाल का सच

हिटलर गांधी : स्वयंसेवकों का बलिदान, बचा संविधान

ncient shaligram fossils found in lapthal niti valley chamoli uttarakhand

उत्तराखंड: तिब्बत बॉर्डर पर शालिग्राम की खोज, रहस्यों से उठने लगा पर्दा

संभल में महज 5 मिनट में दबोचा मासूम का दुष्कर्मी: स्निफर डॉग ‘मैरी’ का हैरतअंगेज कारनामा, SP ने दिया ₹10,000 का इनाम

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

जी 7, पश्चिम एशिया और भारत के सधे कदम

फ्रांस में म्यूजिक फेस्टिवल में फिर हुआ बवाल

फ्रांस: म्यूजिक फेस्टिवल में फिर लड़कियों पर रहस्यमयी सिरिन्ज, चाकुओं से हमला और यौन उत्पीड़न

भगवंत मान वीडियो केस: फर्जी रिपोर्ट बनाने वाले 2 आरोपी 8 दिन की रिमांड पर, लैब पर बड़ा खुलासा, शिकायतकर्ता भी डरा!

rajnath singh cm pushkar dhami-visit dehradun tribute shok sabha

उत्तराखंड : पदम श्री निशानेबाज़ जसपाल राणा को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंची हस्तियां

मुंबई में चलती ट्रेन में युवक की हत्या

मुंबई: चलती लोकल ट्रेन में युवक की चाकू मारकर हत्या, आरोपी गिरफ्तार

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies