असम: हिंदुत्व की छत्रछाया, सामाजिक न्याय का संकल्प और महिला कल्याण की भावना ने भाजपा को सत्ता सौंपी
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होम भारत असम

असम: हिंदुत्व की छत्रछाया, सामाजिक न्याय का संकल्प और महिला कल्याण की भावना ने भाजपा को सत्ता सौंपी

असम की जीत मूल्यगत राजनीति की जीत है, इस जीत ने बताया कि अल्पसंख्यक जीत की गारंटी नहीं है।

Written byप्रदीप पंडितप्रदीप पंडित
May 7, 2026, 08:38 pm IST
inअसम
असम चुनाव में भाजपा ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। भाजपा के प्रदेश कार्यालय में पार्टी की जीत के उल्लास में मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा।

असम चुनाव में भाजपा ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। भाजपा के प्रदेश कार्यालय में पार्टी की जीत के उल्लास में मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा।

विकसित राष्ट्रवाद और उदार हिंदुत्व की छत्रछाया तले सामाजिक न्याय के संकल्प और महिला कल्याण की भावना ने असम में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता सौंपी है। फिर से हिमंता पर विश्वास जताया। यह वह विश्वास है जिसे आरंभ से ही उनके समर्थक सौ सीटों से अधिक विजय की घोषणा के साथ व्यक्त करते रहे हैं, जिसे पाञ्चजन्य पहले लिख चुका है।

मूल्यगत राजनीति की जीत

असम की जीत मूल्यगत राजनीति की जीत है, इस जीत ने बताया कि अल्पसंख्यक जीत की गारंटी नहीं है। इस जीत ने बताया कि राज्य की जनता से पहचान, नागरिकता और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस को व्हीलचेयर पर आने पर मजबूर कर दिया है । यह मतदान हिमंत विश्व शर्मा की जाति, माटी और भेति (पहचान, जमीर और मातृभूमि ) पर किया गया मतदान है ।असम ने इस बार पहले से कह रखा था कि जो भी असम संस्कृति को अपने भाव-संकल्प की चादर से ओढ़ेगा, अहोम संस्कृति को अपनाएगा, शांति की गारंटी देगा, प्रदेश उसका साथ देगा। हिमंत ने कदम दर कदम यही किया और समूची पार्टी ने उनका साथ दिया।

चुनाव की शुरुआत से ही भाजपा के साथ रही जनता

असमिया को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलवाने की बात हो या बागुडुंबा जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का मसला, लचित बरफुकन के 400वें जन्मदिन को प्रदेश स्तर पर मनाए जाने के साथ गृह मंत्री अमित शाह की पैनी दृष्टि और रणनीति से, जनता चुनाव के आरंभ से ही भाजपा से दूर नहीं गई। चुनाव को संघर्षमय दिखाने की गरज से कुछ लोग चाय बगान क्षेत्र को कांग्रेस के साथ बता दे रहे थे। पहले कभी यहां के कामगार साथ थे भी, लेकिन हिमंता के मुख्यमंत्री बनने के बाद वहां का समाज और उनकी समझ सरकार की नई गतिशील योजनाओं के साथ जुड़ गए।

भगवान शंकरदेव के आख्यान को नहीं समझी कांग्रेस

जनजातीय हलका हो या बोडो, किसी ने भी हिमंत की तरफ पीठ नहीं की और कांग्रेस “शरण नाम धर्म:” के भगवान शंकरदेव के आख्यान को समझ नहीं पाई। असम संस्कृति कृष्ण भक्ति से ओतप्रोत है, नामधर उसके प्रमाण हैं। यहाँंजाति-पाति नहीं, सामुदायिक प्रार्थना महत्वपूर्ण है। यह असम का भाव प्रदेश है। असमिया दर्शन के इस भाव को समझते हुए ही हिमंता आसू से यात्रा आरंभ कर कांग्रेस के गलियारे के बाद वहां पहुंचे, जहां वे स्वयं पहुंचना चाह रहे थे या कहें कि असम उन्हें पहुंचाना चाह रहा था।

एक नई सुबह और उजियारे की ओर बढ़ता असम

मैं पहले दिन से असम चुनाव को बारीकी से देख रहा हूं। मैंने पाया कि हिमंत ने प्रदेशवासियों को ऐतिहासिक गौरव को फिर से स्थापित किया ही, उन्हें यकीन भी दिलाया कि ब्रह्मपुत्र एक नई सुबह और एक उजियारे की तरफ बढ़ रही है। अपनी सरकार की उपलब्धियों के साथ उन्होंने मोदी सरकार के वृहद और अपनत्वी नीतियों को अनवरत प्रचारित किया है। क्रियान्वित किया। इसे वहां के सचिवालय से कोई भी प्रमाणित कर सकता है। माना कि हिमंत का आगमन कांग्रेस से हुआ, लेकिन उनका भाव-प्रदेश संभवतया तब भी भाजपा की अवधारणा का रहा होगा। जैसे यास्क कहते हैं, “पुरा नवम् मठति, पुरा नवम् भवति, ”पुराना नया हो जाता है।

संवाद में निपुण हिमंत

मार्क बुवर ने कहा है कि संवाद से बड़ी घटना धरती पर उदित नहीं हुई और संवाद में हिमंत निपुण हैं। यह उन्होंने इस चुनाव में साबित किया। इसलिए वह हर वर्ग से उसके मन की जमीन तक पहुंचकर अपनी बात सम्प्रेषित कर लेते हैं। महिलाओं से, युवाओं से, जनजातियों से अर्थात सभी से उनके हक की परिधि में खड़े होकर बात करते हैं। यही वजह है कि मोदी संकल्प को असम में सिद्धि बनाने में गौरव गोगोई और उनकी कांग्रेस कोई अवरोध नहीं खड़े कर पायी।

एक ही गोद से उपजीं भारतीय भाषाएं

लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता और असम के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई में कांग्रेस को अपनी पार्टी का उज्जवल भविष्य दिखाई दे रहा था। लेकिन पहली कुश्ती में ही धोबी पछाड़ खा गए। जोरहट जहां से वह सांसद हैं, वहां से विधानसभा चुनाव स्वयं भी हार गए और समूची पार्टी को भी हरवा दिया। जोरहट वह क्षेत्र है जहां से उनके पिता तरुण गोगोई ने सार्वजनिक जीवन में पहला कदम रखा था, वहीं से 23,000 वोटों से गौरव हारे। वजहें बिल्कुल साफ हैं कि कांग्रेस अपने बुनियादी विचारों से हटी ही नहीं अल्पसंख्यक और आरोपवाद को शॉर्टकट समझने लगी। उसने हिंदी हृदय-प्रदेश को असम से काटने की वर्षों गुस्ताखी की। बिना यह जाने कि भारतीय भाषाएं एक ही गोद की संवेदना से उभजी भाषाएं हैं ,फिर असमिया को अलग कैसे खड़ा कर पाएंगे।

आप देखें कि आप, तू, किताब, पानी, वार्ता, नमस्कार, उपहास, उपाधि जैसे अनेक शब्द जस के तस दोनों भाषाओं में हैं। इसलिए सिर्फ इस चुनाव में ही नहीं भविष्य के भी सभी चुनावों में अल्पसंख्यकवादिता की रोटी नहीं सेकी जा सकेगी। इस पार्टी के प्रवक्ता, अध्यक्ष और अन्यान्य नासमझी में ध्रुवीकरण के सवाल उठाते हैं। वे समझना ही नहीं चाहते कि मोदी की सुशासन के अवधारणा क्या है। नॉर्थ ईस्ट के लिए केंद्र की नई विकासवादी नीतियां कौन सी हैं? महिलाओं को राजनीति में तवज्जो देने का विचार भाजपा का नारा भर नहीं है, जिसका विरोध कांग्रेसी गाल बजाते करते रहे। रोजगार पर नवयुवकों को बहकाने की कोशिशें हुईं बिना इस बात की सूचना प्राप्त किए कि हिमंत सरकार अपने वादे से ज्यादा युवक-युवतियों को रोजगार उपलब्ध करा चुकी है, और काम होना है उसके लिए राज्य और केंद्र कृतसंकल्पित है।

कांग्रेस को मुस्लिम लीग करार दिया गया

कांग्रेस असम में बमुश्किल 19 सीटें जीत पाई। इसमें से 18 सीटों पर उसके मुस्लिम प्रत्याशी को जीत मिली। कभी वह इसी वोट बैंक को एआईयूडीएफ के साथ शेयर करती रही। इस बार अलग लड़ी और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी को सीटों पर सिमट गई। बदरुद्दीन ने नतीजों के बाद कांग्रेस को मुस्लिम लीग करार दिया। चुनाव के समय हिमंत ने मियां पार्टी कहा। बड़ा शोर मचाया विपक्ष ने। उन्होंने बांग्लादेशी बंगला बोलते मुस्लिमों के लिए मियां कहा। यह इतना प्रभावी रहा कि अपर और नार्थ असम में कांग्रेस मददाताओं के मन तक नहीं पहुंच पाई। यह आश्चर्य का विषय है कि उनके भीतर भी हिमंत की वापसी का निनाद सुनाई नहीं दे रहा था। उनकी तरफ से दिल्ली की बस्तियों की महिलाओं को चाय बागान तक भेजा गया, जो एक निरर्थक परेड में बदल गया। इसी तरह मुस्लिम अल्पसंख्यकों की आवाज अजमल विधानसभा में 16 सीटों की अपनी जमीन से गिरकर दो पर सिमट गए। इन राजनीतिक नतीजों के विश्लेषण में महज ईवीएम और ध्रुवीकरण जैसे आरोपों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, मगर पराजित कांग्रेसियों ने ईवीएम में गड़बड़ी और ध्रुवीकरण दोनों आरोप उछाल दिए हैं।

मानवीय समुदाय में भारतीय दर्शन की परिकल्पना

“द हार्ट ऑफ हिंदूजिज्म” के लेख में हिबर्ट जनरल में कहा गया कि भारत में धर्म को रूढ़ी और हठधर्मिता का स्वरूप प्राप्त नहीं है। वर्णन वह मानवीय व्यवहार की एक ऐसी क्रियात्मक परिकल्पना है जो आध्यात्मिक विकास के विभिन्न स्थितियों में जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में अपने आप को अनुकूल बना लेती है। हिंदू दर्शन भारतीय दर्शन की रुचि किसी काल्पनिक एकांत में नहीं मानवीय समुदाय में रही है। इसी उजाले के प्रण में असम का चुनाव हुआ। इसका परिणाम भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक विजय और कांग्रेस की भोथरी नीतियों की शिकस्त में दिखाई दे रहा है। 126 सदस्यों वाली विधानसभा के लिए सर्वाधिक हुए मतदान में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार हिमंत की अगुवाई में पूर्ण बहुमत हासिल किया। भाजपा ने 90 में से 82 सीटें अपने नाम की। इसके सहयोगी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट और असम गण परिषद दोनों को दर्जन सीटें प्राप्त हुईं। इस तरह एनडीए की तालिका कुल 126 सीटों में से 102 सीटों की हो गई। निश्चित ही यह पहचान नारी शक्ति और विकसित असम की पुरातन भाजपा दृष्टि की विजय है। इस पर उन लोगों को विचार करना ही चाहिए कि आप में रेंगने का सामर्थ्य भी नहीं और आप फन निकाले खड़े हो ।

कवि शंकर कुरुप की ये बात भी याद रखें

चुनावी समय में बरती गई भाषा किसी और लेख का विषय होगी। लेकिन मलयालम के कवि शंकर कुरुप ने कहा है हे मानव!जबसे मैंने तुम्हारी भाषा सीखी तब से वह विश्वमोहक भाषा भूल गया जिसमें स्नेह छोड़कर कोई शास्त्र नहीं, आनंद छोड़कर कोई अर्थ नहीं, रूप छोड़कर कोई छंद नहीं। आखिर धीरे-धीरे यह कौन सी भाषा आ गई है, जिसने स्नेह, सौहार्द और आनंद को त्यागकर विद्वेष और विकृति को अपना लिया है। उम्मीद तो नहीं है, पर रखी जानी चाहिए कि इस लोकतांत्रिक यज्ञ के असम में संपन्न होने के उपरांत ,सभी केंद्र की तरह हिमंत का नए और विकसित असम के उद्यम में साथ देंगे।

 

Topics: हिंदुत्वहिमंत विश्‍व शर्मासामाजिक न्यायभाजपा की जीतजन का मनअसम चुनाव परिणाममहिला कल्याण
प्रदीप पंडित
प्रदीप पंडित
हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता में 37 वर्ष का अनुभव। जनसत्ता, संडे मेल, दैनिक भास्कर, स्वदेश ग्वालियर और दिल्ली से प्रका​शित राष्ट्रीय पत्रिका शुक्रवार के संपादक। अनेक रेडियो नाटक, दर्जनों टेली फिल्म, उपन्यास, प्रतिप्रश्न, हिन्दी अकादमी दिल्ली से 1988-89 में साहि​​​त्यिक कृति पुरस्कार से सम्मानित। भारतीय ज्ञानपीठ की अनेक पुस्तकें संपादित। टैगोर और स्टीफन स्पेंडर के अनुवाद और अनेक पुस्तकें। [Read more]
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