मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह सत्ता, समाज और जनता के बीच पारदर्शिता का सेतु बनकर काम करता है। पत्रकार दिन-रात कठिन परिस्थितियों में रहकर सच्चाई को सामने लाने का प्रयास करते हैं। कभी प्राकृतिक आपदाओं के बीच, कभी युद्ध जैसे हालात में और कभी उग्र प्रदर्शन के बीच वे अपनी जान जोखिम में डालकर खबरें जुटाते हैं। ऐसे में यदि पत्रकार ही हिंसा, अभद्रता और हमलों का शिकार बनने लगें, तो यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र, प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक महिला पत्रकार के साथ कथित छेड़छाड़ और हमले की घटना इसी चिंता को फिर से सामने लेकर आई है।
महिला टीवी पत्रकार के साथ अभद्रता
20 जुलाई को जंतर-मंतर के पास चल रहे ‘संसद चलो’ आंदोलन की कवरेज के दौरान एक महिला टीवी पत्रकार और उनकी टीम को उग्र भीड़ का सामना करना पड़ा। पत्रकार के अनुसार, रिपोर्टिंग के दौरान प्रदर्शनकारियों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। कई बार रास्ता देने की अपील करने के बावजूद भीड़ पीछे नहीं हटी, जिससे वे और उनके कैमरापर्सन काफी देर तक वहीं फंसे रहे। स्थिति बिगड़ने पर कैमरापर्सन ने उन्हें सुरक्षित निकालने की कोशिश की और दोनों को अपनी गाड़ी तक पहुँचने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ा।
पत्रकार ने आरोप लगाया कि भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने उनके साथ छेड़छाड़ की और पीछे से शरीर को छूने व खींचने का प्रयास किया। भीड़ अधिक होने के कारण आरोपियों की पहचान करना मुश्किल था। किसी तरह गाड़ी तक पहुँचने के बाद भी परेशानी खत्म नहीं हुई। भीड़ ने वाहन को घेर लिया, शीशे तोड़ दिए, गाड़ी को नुकसान पहुँचाया और अभद्र भाषा के साथ अश्लील इशारे किए। बाद में गाड़ी पर पत्थरबाजी भी हुई। किसी तरह टीम वहाँ से निकली और पुलिस हेल्पलाइन 112 पर संपर्क कर मदद मांगी। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर सुरक्षा दी और मामले में छेड़छाड़ सहित विभिन्न धाराओं में केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी। घटना से जुड़े कई वीडियो की भी जांच की जा रही है। पुलिस ने पत्रकारों पर हमले के 10 वीडियो की पहचान की है।
















