खाड़ी संकट के बीच होर्मुज स्ट्रेट बंद है और इस कारण से दुनियाभर में तेल की किल्लत हो रही है और उससे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। हालात को देखते हुए भारत अपने पुराने सहयोगी रूस के साथ तेल आयात को बढ़ा दिया है। जुलाई के बाद अगस्त में यह आयात 3 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच सकता है। यह बात Kpler नाम की ग्लोबल डेटा और एनालिटिक्स कंपनी के विश्लेषण में कही गई है। Kpler के लीड एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने बताया कि रूसी कच्चा तेल भारत के लिए सबसे अच्छा विकल्प बना हुआ है।
लाल सागर में दिक्कत का असर
अभी लाल सागर के रास्ते शिपिंग ठीक चल रही है तो भारतीय रिफाइनरी को सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट (यंबू) पाइपलाइन से अच्छा सपोर्ट मिल रहा है। यह पाइपलाइन हाल में रोजाना 3 लाख से 5 लाख बैरल कच्चा तेल सप्लाई कर रही है। लेकिन अगर अगस्त में सुरक्षा स्थिति खराब हुई और लाल सागर में सप्लाई रुक गई तो रिफाइनरी को यह मात्रा कहीं और से पूरा करनी पड़ेगी। सबसे आसान विकल्प फिर रूसी कच्चा तेल ही रहेगा।
पिछले कुछ महीनों में भारत का रूस से कच्चा तेल आयात बहुत बढ़ गया है। यह 1 मिलियन बैरल प्रति दिन से बढ़कर करीब 2.6 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गया है। जुलाई में भी आयात रिकॉर्ड के करीब चल रहा है। दिक्कत पड़ने पर रिफाइनरी रूसी तेल के साथ-साथ वेस्ट अफ्रीका के स्पॉट कार्गो भी खरीदेंगी जहां उपलब्ध होंगे। साथ ही छोटे समय के लिए अपने स्टॉक से भी तेल निकालकर इस्तेमाल करेंगी।
रूस पर बढ़ती निर्भरता
भारत ने पिछले सालों में अपने कच्चे तेल के स्रोत काफी विविध कर लिए हैं। अब रूस, वेनेजुएला, अफ्रीका और अटलांटिक बेसिन के सप्लायर्स से ज्यादा तेल आ रहा है। इससे जोखिम कम हुआ है। मुख्य सवाल यह है कि रूस ज्यादा मात्रा में निर्यात जारी रख पाएगा या नहीं। यूक्रेन के हमलों की वजह से रूस की तेल सुविधाओं पर असर पड़ रहा है। जुलाई में रूस का कुल कच्चा तेल निर्यात पिछले महीने से 4 लाख बैरल प्रति दिन कम रहा।
फिर भी लाल सागर में दिक्कत से सप्लाई थोड़ी तंग तो होगी, लेकिन बड़ी कमी नहीं आएगी। रूसी तेल भारत के लिए सबसे मजबूत बैकअप बना हुआ है। अगर बाजार की स्थिति ठीक रही और रूस के पास निर्यात के लिए तेल उपलब्ध रहा तो आयात 3 मिलियन बैरल प्रति दिन या उससे भी ऊपर जा सकता है। सुमित रितोलिया कहते हैं कि जुलाई में रूस से आयात करीब 2.6 मिलियन बैरल प्रति दिन चल रहा है, जो भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 55 प्रतिशत है।
इसे भी पढ़ें: क्यों ईरान में मौत की सजा पाए कैदी कर रहे होंठ सिलाकर विरोध?
इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। हॉर्मुज और लाल सागर अभी भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन रूस की ब्लैक सी निर्यात सुविधाएं, खासकर नोवोरोसियस्क टर्मिनल, अब भारत के लिए उतने ही या ज्यादा जरूरी हो गए हैं।
सऊदी अरब अभी भी बड़ा सप्लायर है, लेकिन हाल के महीनों में भारत को उसका औसत निर्यात सिर्फ 4 लाख बैरल प्रति दिन रहा है, जो रूस से बहुत कम है। लाल सागर में सऊदी तेल रुकने का असर रूस के ब्लैक सी निर्यात रुकने जितना बड़ा नहीं होगा।
रेड सी वाले रास्ते में वैकल्पिक रूट उपलब्ध हैं जैसे सऊदी की पाइपलाइन, SUMED पाइपलाइन, सूएज कैनाल या अफ्रीका के चक्कर। लेकिन ब्लैक सी से आने वाले तेल के लिए ऐसे विकल्प सीमित हैं। नोवोरोसियस्क न सिर्फ भारत जाने वाले रूसी उराल्स तेल का हब है, बल्कि कजाकिस्तान के CPC तेल का भी जो यूरोप जाता है। अगर यहां लंबे समय तक दिक्कत हुई तो वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो सकती है।














