सितंबर 2025 में सोनिया गांधी ने ‘द हिंदू’ में ‘The Making of an Ecological Disaster in the Nicobar’ शीर्षक से एक भावुक संपादकीय लिखा। उन्होंने ग्रेट निकोबार मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को वनवासी समुदायों (निकोबरी और शोम्पेन) के अस्तित्व के लिए खतरा, अनोखे इकोसिस्टम का विनाश और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति असंवेदनशील बताया। उन्होंने दावा किया कि फॉरेस्ट राइट्स एक्ट, ट्राइबल राइट्स, सोशल इंपैक्ट असेसमेंट और कोस्टल रेगुलेशन जोन जैसे कानूनों की अनदेखी हो रही है।
26-28 अप्रैल 2026 को, बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने अंडमान-निकोबार का दौरा किया। उन्होंने ग्रेट निकोबार पहुंचकर स्थानीय निकोबरी समुदाय से मुलाकात की और प्रोजेक्ट को ‘प्रकृति और आदिवासियों पर अपराध’ करार दिया। विपक्ष इसे विकास के नाम पर विनाश बता रहा है, जबकि सरकार इसे राष्ट्रीय हित से जोड़ती है। यह बहस सिर्फ पर्यावरण या आदिवासी हितों की नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक भूमिका की भी है।
प्रोजेक्ट क्या है और इसके मुख्य घटक
ग्रेट निकोबार द्वीप पर करीब 81,000 से 92,000 करोड़ रुपये का यह प्रोजेक्ट भारत का महत्वाकांक्षी प्लान है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (आईसीटीटी) पहला चरण 2028 तक 4 मिलियन TEU होगी, जो बाद में 2058 तक 16 मिलियन TEU तक बढ़ाई जाएगी। ड्यूल-यूज (सिविल और मिलिट्री) एयरपोर्ट, 450 MVA गैस-सोलर पावर प्लांट और एकीकृत टाउनशिप शामिल है। कुल क्षेत्रफल करीब 166 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें ज्यादातर वन क्षेत्र आता है।
सरकार का कहना है कि यह ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ और ‘विकसित भारत’ का हिस्सा है। यह द्वीप मलक्का स्ट्रेट से मात्र 90 नॉटिकल मील दूर है, जहां विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। वर्तमान में भारत का 25% कार्गो (कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों से) ट्रांसशिप होता है, जिससे अरबों रुपये का नुकसान होता है। ग्रेट निकोबार में गैलेथिया खाड़ी (Galathea Bay) का 18-20 मीटर प्राकृतिक गहराई वाला पोर्ट इसे बदल सकता है।
वनवासी समुदायों पर असर – तथ्यों की जांच
सोनिया गांधी ने दावा किया कि निकोबरी गांव खाली कराए जाएंगे और शोम्पेन ट्राइबल रिजर्व का बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा। वास्तव में, प्रोजेक्ट क्षेत्र में वनवासी मुख्य रूप से बाहर रहते हैं। 1956 के अंडमान-निकोबार प्रोटेक्शन ऑफ एबोरिजिनल ट्राइब्स रेगुलेशन के तहत 92% क्षेत्र ट्राइबल रिजर्व है, लेकिन प्रोजेक्ट केवल लगभग 10% को प्रभावित करता है।
2004 के सुनामी के बाद कई निकोबरी परिवार राहत शिविरों में थे। अब मार्च 2026 का ड्राफ्ट ‘कॉम्प्रिहेंसिव ट्राइबल वेलफेयर प्लान’ उनके पुनर्वास, आवास और सुविधाओं के लिए 42.52 करोड़ रुपये का प्रावधान करता है। शोम्पेन पॉलिसी का पालन होने और ट्राइबल काउंसिल से परामर्श का दावा किया गया है, हालांकि कुछ नेता सहमति की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं और दबाव का आरोप लगाते हैं।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने फरवरी 2026 में पर्यावरण मंजूरी बरकरार रखी और कहा कि प्रोजेक्ट ‘स्ट्रैटेजिक इंपॉर्टेंस’ का है। हाई पावर्ड कमेटी और नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट ने भी मंजूरी दी। ट्रिब्यूनल ने ‘बैलेंस्ड अप्रोच’ पर जोर दिया, लेकिन विपक्ष अभी भी फॉरेस्ट राइट्स एक्ट और पूर्ण सहमति के मुद्दे उठा रहा है। कुछ क्षेत्रों में पुनर्वास की जरूरत पड़ेगी, लेकिन सरकार का दावा है कि बड़े पैमाने पर विस्थापन नहीं होगा।
पर्यावरणीय चिंताएं – वन कटाई और मुआवजा
दावा किया जा रहा है कि कथित तौर पर 15% भूमि पर वन कटाई होगी, जिसमें 8.5 लाख से 32-58 लाख पेड़ प्रभावित हो सकते हैं। यह वर्षावन इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचाएगा। compensatory afforestation हरियाणा के अरावली क्षेत्र (26,000 हेक्टेयर से ज्यादा) में प्रस्तावित है, जहां वन कवरेज कम है। एनपीवी (Net Present Value) जमा किया गया और हरियाणा को 3,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। कुछ भूमि पहले नीलामी के लिए चिन्हित थी, जो विवाद का विषय बना।
ट्रिब्यूनल ने सीआरजेड (Coastal Regulation Zon) मुद्दों को हल किया – टर्टल नेस्टिंग और कोरल रीफ्स की सुरक्षा के लिए पोर्ट साइट को समायोजित किया गया। वाइल्डलाइफ असेसमेंट (मैकॉ, डुगॉंग, सी टर्टल) पर सवाल हैं, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इन्हें पर्याप्त माना। द्वीप भूकंप जोन में है (2004 सुनामी और 2025 का 6.2 तीव्रता का भूकंप), इसलिए आधुनिक इंजीनियरिंग और डिजास्टर-रेजिलिएंट डिजाइन जरूरी हैं। प्रोजेक्ट में इको-टूरिज्म और सस्टेनेबल डेवलपमेंट के तत्व भी शामिल हैं, लेकिन कांग्रेस कहती है कि बड़े पैमाने पर विकास नाजुक इकोसिस्टम के लिए जोखिम पैदा करेगा।
रणनीतिक और आर्थिक महत्व – चीन की चुनौती का जवाब
यह प्रोजेक्ट सिर्फ विकास नहीं, बल्कि हिंद महासागर (IOR) में भारत की समुद्री शक्ति बढ़ाने का हिस्सा है। निकोबार मलक्का स्ट्रेट के पास है, जहां चीन का 80% तेल आयात और विश्व व्यापार का 25-30% गुजरता है। चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (ग्वादर, हम्बनटोटा आदि) भारत को घेरने की रणनीति है। ग्रेट निकोबार विकास परियोजना भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति (Act East Policy) को मजबूत करने और चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) रणनीति को काउंटर करने के लिए ‘डायमंड नेकलेस’ (Necklace of Diamonds), नौसेना निगरानी बढ़ाना, TRI-सर्विस कमांड मजबूत करना और QUAD में भारत की भूमिका बढ़ाना रणनीति का प्रमुख हिस्सा है।
आर्थिक रूप से, यह ट्रांसशिपमेंट पर निर्भरता कम करेगा, रोजगार पैदा करेगा और लॉजिस्टिक्स हब बनेगा। नीति आयोग ने इसे ‘स्ट्रैटेजिक प्रेजेंस’ बताया। ट्रिब्यूनल ने भी ‘नेशनल इंपॉर्टेंस’ माना है।
राजनीतिक आयाम और आगे का रास्ता
राहुल गांधी का दौरा बंगाल चुनावों के समय हुआ, जो राजनीतिक रंग देता है। कांग्रेस ने पहले भी कुछ रणनीतिक परियोजनाओं पर पर्यावरण के नाम पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष इसे ‘आदिवासी-पर्यावरण बनाम मोदी विकास’ का मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है।
वास्तविकता यह है कि विकास और सुरक्षा को पर्यावरण व वनवासी समाज के हितों के साथ संतुलित करना चुनौती है। ट्रिब्यूनल ने मंजूरी दी है, लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट में कुछ याचिकाएं लंबित हैं। सख्त निगरानी, पारदर्शी सहमति, बेहतर पुनर्वास और पर्यावरण सुरक्षा उपायों से आगे बढ़ना चाहिए।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत को हिंद महासागर में मजबूत बनाने का अवसर है। भावुक विरोध या अंध समर्थन दोनों ठीक नहीं। तथ्यों पर आधारित बहस हो। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सस्टेनेबल डेवलपमेंट तीनों को जगह मिले।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को क्यों नहीं पूरा होने देना चाहती कांग्रेस

















