भारत पर क्यों दबाव बना रहा हिन्द रजब फाउंडेशन? क्या ऐसा हो सकता है?
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भारत पर क्यों दबाव बना रहा हिन्द रजब फाउंडेशन? क्या ऐसा हो सकता है?

क्या ऐसा हो सकता है कि विदेश का कोई गैर सरकारी संगठन, भारत में आकर भारत सरकार पर यह दबाव डाले कि वह किसी तीसरे व्यक्ति को गिरफ्तार करे? यह एक जटिल विषय है, और साथ ही यह किसी भी सरकार के आंतरिक कामकाज में दखल भी है

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 8, 2026, 04:58 pm IST
inविश्व
 मध्य गाजा पट्टी के मघाज़ी शरणार्थी शिविर में, इज़राइल-हमास संघर्ष के बीच, फ़िलिस्तीनी बच्चे एक घर पर हुए इज़राइली हमले की जगह पर खड़े हैं। (फाइल फोटो- रॉयटर्स/एएनआई)

 मध्य गाजा पट्टी के मघाज़ी शरणार्थी शिविर में, इज़राइल-हमास संघर्ष के बीच, फ़िलिस्तीनी बच्चे एक घर पर हुए इज़राइली हमले की जगह पर खड़े हैं। (फाइल फोटो- रॉयटर्स/एएनआई)

क्या ऐसा हो सकता है कि विदेश का कोई गैर सरकारी संगठन, भारत में आकर भारत सरकार पर यह दबाव डाले कि वह किसी तीसरे व्यक्ति को गिरफ्तार करे? यह एक जटिल विषय है, और साथ ही यह किसी भी सरकार के आंतरिक कामकाज में दखल भी है और क्या यह भी प्रश्न उठता है कि क्या कोई गैर सरकारी संगठन के पास ऐसी मांग के अधिकार हैं?

यह मामला पिछले कई दिनों से सुर्खियों में है। यह मांग की है बेल्जियम स्थित एक गैर सरकारी संगठन हिन्द रजब फाउंडेशन ने। हिन्द रजब फाउंडेशन फिलिस्तीन लोगों के खिलाफ कथित रूप से किये गए युद्ध अपराधों और मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए जिम्मेदार इज़राएली सैनिकों और अधिकारियों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी कार्यवाही कराने का दावा करता है।

इस संस्था को साल 2024 में लेबनान-बेल्जियम कार्यकर्ता दियाब अबू जहजाह ने शुरू किया था। जहां एक ओर यह संस्था कहती है कि वह फिलिस्तीन में अत्याचार और युद्ध अपराध करने वाले इजरायलियों के खिलाफ कार्य करने के लिए समर्पित है तो वहीं यह भी महत्वपूर्ण है कि इस संस्था के संस्थापक पर आतंकवाद के समर्थन और यहूदी विरोधी गतविधियों में भाग लेने के आरोप लगते रहे हैं।

इसके साथ ही इजरायल और कुछ पश्चिमी नागरिक समूहों का कहना है कि यह केवल निर्दोष यहूदी नागरिकों को कानूनी उत्पीड़न का शिकार बनाता है। वह उनपर झूठे मुकदमे करने के लिए प्रेरित करता है। जेरूसलम पोस्ट के अनुसार इसका संस्थापक एक आतंकवादी था, और वह अपनी जवानी में हिज़्बुल्ला के साथ जुड़ा था और वह 2006 में लेबनान युद्ध मे भाग लेने के लिए लौटा था।

इसके अनुसार उसने पहले अरब यूरोपियन लीग की स्थापना की थी और उसी पर न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख के जरिए पता चलता है कि उसने कहा था कि उसने इजरायल के खिलाफ हिजबुल्ला का दामन थाम लिया है। यह भी कहा जा रहा है कि अबू जहजाह ने यह भी माना था कि उसने बेल्जियम मे शरण लेने के लिए हिजबुल्ला लीडरशिप के विषय में झूठ बोला था। उसने कहा था कि अधिकतर शरणार्थियों का कोई इतिहास होता है। उसके हिजबुल्ला नेताओं के साथ विवाद हुए थे और यह केवल उसकी पेपर क्लियर करवाने के लिए राजनीतिक चाल थी। जब 2006 में दूसरा लेबनान युद्ध आरंभ हुआ तो उसने खुद कहा था कि वह लेबनान जाएगा और फिर उसमें जियोनिस्टो के साथ लड़ाई में मर भी सकता है।

उसने खुलकर यहूदियों के खिलाफ लिखा था। उसने मौत को महिमामंडित करते हुए लिखा था, “जब अंधेरे और खून की नदियों के बीच एक तलवार चमकेगी और बहादुर कहेंगे कि मरने के लिए यह कितना सुंदर दिन है।“ इतना ही नहीं हिजबुल्ला से जुड़े समाचार आउटलेट ‘अल-अख़बार’ पर पहले उसका एक लेखक प्रोफ़ाइल हुआ करता था, लेकिन अब उसे हटा दिया गया है।

अमेरिकी, ब्रिटिश और डच सैनिकों की हत्या का समर्थन

उसने पहले इराक युद्ध में भाग लेने को लेकर अमेरिकी, ब्रिटिश और डच सैनिकों की हत्याओं का भी समर्थन किया था। फ्लेमिश अखबार ‘हेट लात्स्ते नीउव्स’ के अनुसार उसने कहा था, “मैं किसी भी अमेरिकी, ब्रिटिश या डच सैनिक की मौत को एक जीत मानता हूँ।” हालांकि बाद में हिन्द रजब की वेबसाइट पर उसने यह दावा किया था कि उसने किसी हत्या का समर्थन नहीं किया था, बल्कि लोगों की प्रतिरोध की शक्ति का जश्न मनाया था।

भारत में क्यों है चर्चा?

अब प्रश्न यह उठता है कि बेल्जियम आधारित इस संस्था की भारत में क्यों चर्चा हो रही है? वह भारत सरकार पर किस बात का दबाव डाल रही है? क्यों इस संस्था के उठाए गए कदम को लेकर पाकिस्तान तक में भारत की नकारात्मक चर्चा हो रही है?

दरअसल भारत में कई इजरायली सैनिक आते हैं और वे कई बार काफी महीनों के लिए रहते हैं। ऐसे में इस संस्था का एक इज़राएली सैनिक ईतान गिलबोया को लेकर यह दावा है कि चूंकि वह इजरायल का एक रिजर्व सैनिक है और उसने गाजा में आवासीय परिसरों को तोड़ने में भूमिका निभाई है और साथ ही उसने खुद ही ऐसे वीडियो जारी किये थे, तो वह एक युद्ध अपराध है तो उसे गिरफ्तार करना चाहिए।

यह फाउंडेशन भारत सरकार पर जेनेवा कन्वेन्शन एक्ट, 1960 के अंतर्गत युद्ध अपराधों के आरोपों पर इस सैनिक को गिरफ्तार करने की मांग कर रहा है। फाउंडेशन ने भारतीय पुलिस सेवा, विदेश मंत्रालय और आव्रजन ब्यूरो के साथ एक विस्तृत शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें उस सैनिक को गिरफ्तार करने की मांग की है। फाउंडेशन के अनुसार यह सैनिक इन दिनों हिमाचल प्रदेश में छुट्टियां मना रहा है।

फाउंडेशन की मानें तो उसने भारत सरकार को विस्तृत खोजी रिपोर्ट भेजी है, जिसमें उसने जियो लोकेशन, सोशल मीडिया पोस्ट्स और सैन्य दस्तावेजों के माध्यम से आरोप लगाया है कि उसने गाजा के खान यूनिस और रफ़ाह इलाकों में पूरे आवासीय क्षेत्र को नष्ट करने की कार्यवाही में अग्रणी भूमिका निभाई थी। इसलिए उसे गिरफ्तार किया जाए।

अब ऐसे में प्रश्न एक बार फिर से यह उठता है कि गैर लाभकारी संगठन, जिनकी खुद की विश्वसनीयता संदिग्ध होती है, और जिनकी मानसिकता के विषय में यह पता ही होता है कि वे कैसे किसी एक समुदाय के घोर विरोधी हैं, तो ऐसे में कैसे इस मांग को उचित ठहराया जा सकता है? क्या कोई गैरलाभकारी संस्था किसी और देश में किसी और देश के सैनिक के खिलाफ ऐसा कुछ कर सकती है?

Topics: भारत सरकारइजरायली सैनिकहिन्द रजब फाउंडेशन
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