अमेरिकी नौसैनिक रणनीतिकार अल्फ्रेड थायर महान (Alfred Thayer Mahan) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में लिखा था जो महासागरों को नियंत्रित करता है, वही दुनिया की दिशा तय करता है।
स्टेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव, ईरान अमेरिका और इसराइल संघर्ष, तेल टैंकरों की रुकावट और वैश्विक बाजारों में फैली घबराहट से संकट व्यापक हो चुका है। ऐसा लग रहा है कि पूरी दुनिया का अर्थशास्त्र एक संकरे जलमार्ग की सांसों पर टिक गया हो। यह संकट वर्तमान का है, लेकिन वास्तविक दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौती पूर्व की ओर अर्थात मलक्का जलसंधि में आकार ले रही है।
आज वैश्विक व्यापार, एशियाई देश एवं चीन के औद्योगिक शक्ति जिस मार्ग पर सबसे अधिक निर्भर है वह है मलक्का जलसंधि। यही कारण है कि 21वीं सदी की समुद्री राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे पश्चिम एशिया से इंडो पेसिफिक की तरफ स्थानांतरित हो रहा है। अमेरिका इसे केवल समुद्री मार्ग नहीं मानता, वह इसे चीन को संतुलित करने वाले रणनीतिक दबाव के रूप में मानता है और हाल में ही अमेरिका इंडोनेशिया रक्षा समझौता, इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में बढ़ती उसकी सैन्य उपस्थिति, इसी रणनीति का हिस्सा है।
चीन के लिए मलक्का के मायने
चीन के लिए मलक्का जलसंधि केवल व्यापारिक नहीं बल्कि उसकी आर्थिक जीवन रेखा है। चीन का लगभग 75% से 80% तेल आयात इसी मार्ग से होता है , यही कारण है कि बीजिंग वर्षों से मलक्का डिलेमा की चर्चा करता रहा है। चीन को भय है कि किसी बड़े संघर्ष की स्थिति में उसकी ऊर्जा आपूर्ति एवं व्यापार बाधित हो सकते हैं। जहां 20वीं सदी में अटलांटिक महासागर दुनिया की राजनीतिक केंद्र था, वहीं 21वीं सदी में इंडो पेसिफिक वही भूमिका निभा रहा है। इसलिए आने वाले समय में यहां संकट बढ़ सकते हैं।
क्या है भारत की स्थिति
इस समुद्री प्रतिस्पर्धा के बीच भारत की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, अंदमान निकोबार आइलैंड भारत को मलक्का के पश्चिमी प्रवेश द्वार के निकट एक स्वाभाविक रणनीतिक लाभ प्रदान करता हैं। इसलिए भारत ने सागर नीति, अंदमान एवं निकोबार कमान और सबसे महत्वपूर्ण ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है।
सागर और महासागर क्या हैं
सागर (SAGAR ) 2015 में सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीज़न अर्थात क्षेत्र के सभी देशों के लिए सुरक्षा और विकास और इंडो पेसिफिक में संतुलन स्थापित प्रारम्भ किया गया। इसके पांच प्रमुख स्तंभ है समुद्री सुरक्षा सहयोग, व्यापार और आर्थिक एकीकरण, क्षमता निर्माण और आपदा प्रबंधन, सतत विकास एवं संपर्क और आधारभूत संरचना का विकास। अब सागर से आगे बढ़कर महासागर (MAHASAGAR)की बात की जा रही है अर्थात म्युचुअल एंड हॉलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एक्रॉस द रीजन।
अंडमान निकोबार कमांड क्यों महत्वपूर्ण
अंडमान निकोबार कमांड भारत की एकमात्र ट्राई सर्विस कमांड है। थल सेना , नौसेना एवं वायु सेवा सहित कार्य करती है। इसकी स्थापना 2001 में की गई थी। इसका मुख्यालय पोर्ट ब्लेयर में है। यह भारत मलक्का से गुजरने वाली समुद्री गतिविधियों पर नजर रखता है और हिंद महासागर में भारत की सैन्य पहुंच , वायु एवं नौसैनिक संचालन को बढ़ावा देता है। साथ ही साथ विभिन्न आपदाओं में राहत कार्य करने में भी आसानी होती है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
ग्रेट निकोबार दीप परियोजना यह भारत की इंडो पेसिफिक रणनीति समुद्री सुरक्षा ब्लू इकोनामी और वैश्विक व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं का संगम है। ग्रेट निकोबार आईलैंड अंदमान निकोबार द्वीप समूह का द्वीप है जिसका क्षेत्रफल लगभग 910 वर्ग किलोमीटर है। यह इंडोनेशिया के सुमात्रा दीप से लगभग 90 समुद्री मील की दूरी पर एक बड़ा रणनीतिक बिंदु है। नीति आयोग द्वारा यह परियोजना 2021 में शुरू की गई, इसका कार्यान्वयन अंडमान निकोबार दीप समूह एकीकृत विकास निगम द्वारा किया जा रहा है। परियोजना की लागत लगभग ₹72,000–81,000 करोड़ है। इसके तहत विभिन्न घटको का विकास किया जा रहा है।
विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम होगी
अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) गैलेथिया खाड़ी में तैयार किया जायेगा , इसका उद्देश्य वैश्विक कार्गो ट्रैफिक संभालना एवं सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करना है। नागरिक एवं सामरिक दोनों के उपयोग के लिए ग्रीन फील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट का विकास किया जाएगा होगा। इसका उद्देश्य द्वीपों की कनेक्टिविटी बढ़ाना , पर्यटन विकास , रक्षा एवं सामरिक उपयोग एवं युद्ध या आपदा की स्थिति में सैन्य विमान संचालन, त्वरित सैनिक तैनाती, राहत अभियान किया जा सकता है। आधुनिक टाउनशिप होगी , सम्भावना है कि 2050 तक 6.5 लाख जनसँख्या हो जाएगी, यहाँ ऊर्जा आपूर्ति के लिए गैस सोलर पावर प्लांट होगा। इसमें आवासीय क्षेत्र, अस्पताल, स्कूल, डिजिटल नेटवर्क, प्रशासनिक ढाँचा व्यावसायिक केंद्र शामिल होंगे। इसका उद्देश्य ग्रेट निकोबार को दीर्घकालिक आर्थिक एवं शहरी केंद्र बनाना है।
तटीय परिवहन प्रणाली के तहत तटीय द्रुत परिवाहन सिस्टम (Coastal Mass Rapid Transport System) का विकास किया जायेगा, जो द्वीप के विभिन्न हिस्सों को जोड़ेगा। फ्री ट्रेड ज़ोन एवं क्रूज़ टर्मिनल किया जाएगा जिसका उद्देश्य निवेश आकर्षित करना, पर्यटन बढ़ाना एवं व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देना है। यह परियोजना मैरिटाइम इंडिया विजन 2030 और अमृत काल विजन 2047 के अनुरूप विकसित की जा रही है।
ग्रेट निकोबार परियोजना क्यों महत्वपूर्ण
भारत के लिए ग्रेट निकोबार परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि मलक्का जलसंधि हिंद महासागर- प्रशांत महासागर की विश्व राजनीति, व्यापार ,ऊर्जा, सुरक्षा एवं सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। इस परियोजना से निर्माण, लॉजिस्टिक्स, सेवाक्षेत्र, पर्यटन में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन की संभावना है। विश्व के प्रमुख समुद्री मार्ग के तहत अधिकतर व्यापार यहीं से हो रहा है, चीन जापान दक्षिण कोरिया एशियाई देश का व्यापार इसी क्षेत्र से पहुंचता है।
यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है। वैश्विक बाजार का 25 से 30% एवं प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख जहाज यहीं से गुजरते हैं। चीन के लिए तो यह जीवन रेखा है, चीन का लगभग 75 % से अधिक तेल आयात यहीं से होता है एवं व्यापार यहीं से होता है। इसलिए संघर्ष की स्थिति में भारत को महत्वपूर्ण प्राकृतिक रणनीतिक लाभ देगा। इससे भारत समुद्री गतिविधियों की निगरानी, समुद्री सुरक्षा और स्वयं की इंडो पेसिफिक में उपस्थित को मजबूत कर सकता है। अगर आप भारत को सामुद्रिक शक्ति बनना है ब्लू इकॉनमी एवं मैरिटाइम पावर बनना चाहता है, तो उसके लिए यह परियोजना बहुत जरूरी है।
वैश्विक सप्लाईचेन में भारत की भूमिका
आज भारत का कंटेंनर व्यापार सिंगापुर, कोलंबो पर आधारित है। ग्रेट निकोबार परियोजना से भारत ट्रांसशिपमेंट हब बन सकता है, लॉजिस्टिक लागत कम हो सकती है। वैश्विक सप्लाईचेन में भारत की भूमिका बढ़ सकती है, जहां चीन अपनी शक्ति को बढ़ा रहा है। भारत इस ग्रेट निकोबार परियोजना से रणनीतिक संतुलन बना सकता है। अंडमान निकोबार कमान जो त्रिस्तरीय सेवा कमान है उसे मजबूती प्रदान कर सकता है। वर्तमान में ईरान इजरायल अमेरिकी संघर्ष समझ में आ गया है कि समुद्र बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ऊर्जा संसाधन है, समुद्री व्यापार है, खनिज है और रणनीतिक चौक पॉइंट है।
ग्रेट निकोबार परियोजना की चुनौतियां
हालांकि ग्रेट निकोबार परियोजना की चुनौतियां भी हैं, पर्यावरण की चिंताएं हैं जैव विविधता हैं, जनजाति अधिकार को लेकर प्रश्न बन रहे हैं। इसलिए भारत सरकार के सामने चुनौती है कि वह विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए। इस परियोजना के कारण लगभग 10 लाख पेड़ों की कटाई की आशंका व्यक्त की गई है, वन्य जीव जैसे लेदरबैक समुद्री कछुए, निकोबार क्रैब ईटिंग मकॉक जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों का आवास है, उन पर प्रभाव पड़ सकता है। शोम्पेन और निकोबारी जनजातीय पर सांस्कृतिक प्रभाव, खतरा एवं भूमि अधिकार को लेकर चिंता उठाई गई है। यह एक उच्च भूकंप क्षेत्र और 2004 में यहां सुनामी भी आ चुकी है, इसलिए ऐसी परियोजना पर प्रश्न चिन्ह उठाया जा रहे हैं।
चिंता को दूर करने के उपाय
सरकार ने भी इन चिंताओं को दूर करने के लिए उपाय बताए हैं। जंगल और समुद्र के बीच संपर्क बनाए रखने के लिए आठ वन्य जीव गलियारों का निर्माण किया है जिसका उद्देश्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुरक्षित करना है जिससे पारिस्थितिक विघटन को कम से कम जिया जा सके। सरकार ने कहा कि पेड़ों की कटाई चरणबद्ध तरीके से की जाएगी और जिससे पेड़ों में रहने वाले प्रजाति को सुरक्षित स्थान पर जाने का समय मिल जाएगा और वन्य जीव पर प्रभाव भी कम होगा। जैव विविध संरक्षण के लिए सरकार ने नेटिंग साइट की निगरानी, वन्य जीव आवागमन और तटीय पारिस्थितिकी संरक्षण के उपाय जायेंगे। सरकार ने मैंग्रोव क्षति को सीमित करने एवं प्रवाल भित्ति पर दुष्प्रभाव को कम करने के लिए पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार करने की बात कही है।
तटीय क्षेत्र पर प्रभाव का अध्ययन होगा
सरकार ने भी कहा कि है परियोजना पर्यावरणीय प्रभाव आकलन 2006 की अधिसूचना के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है, जिसके अंतर्गत वन , समुद्र, जैव विविधता एवं तटीय क्षेत्र पर प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा। जनजाति सुरक्षा के लिए विशेष उपाय जायेंगे, शोम्पेन और निकोबारी जनजाति पर पड़ने वाले प्रभाव हेतु विशेष निगरानी इकाई स्थापित करने का प्रस्ताव किया गया। परियोजना से उत्पन्न कचरे को पुनर्चक्रण , पुनरुपयोग और मुख्य भूमि तक सुरक्षित परिवहन द्वारा निपटने का प्रस्ताव किया गया। सरकार ने भी कहा कि वृक्ष कटाई की भरपाई हेतु प्रतिपूरक वनीकरण किया जाएगा। ग्रेट निकोबार परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा , आर्थिक विकास और इंडो पेसिफिक के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। ग्रेट निकोबार परियोजना से केवल बंदरगाह बनाना नहीं है बल्कि यह सिद्ध करना होगा विकास प्रकृति भी साथ साथ चल सकते है।
वैश्विक नेतृत्व
ग्रेट निकोबार परियोजना भारत की उस दीर्घकालिक सोच का प्रतीक है जिसमें हिंद महासागर केवल भौगोलिक सीमा नहीं बल्कि आर्थिक समृद्धि सामरिक सुरक्षा और वैश्विक नेतृत्व के रूप में देखा जा सकता है। इसलिए यदि मलक्का जलसंधि 21वीं सदी की समुद्री राजनीति का हृदय है, तो ग्रेट निकोबार भारत की वह चौकी है जहां से भविष्य में हिंद प्रशांत रणनीति आकार लेगी।

















