भारत की विकास यात्रा में बराबर की भागीदार स्त्रीशक्ति, भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत महिला आरक्षण विधेयक की ओर बड़ी उम्मीद से देख रही थी। विगत ग्यारह वर्ष में नीतिगत और धरातल-दोनों ही स्तरों पर महिला सशक्तिकरण सुनिश्चित कर भारत सरकार ने “महिला नेतृत्व से विकास” (Women-led Development) के अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य को अपना अनूठा योगदान देने का प्रयास किया है। साथ ही “विकसित भारत 2047” के राष्ट्रीय लक्ष्य में महिलाओं को अग्रणी भूमिका में रखने के उद्देश्य से संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण सुनिश्चित करने हेतु गत 17 अप्रैल को लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) प्रस्तुत किया गया था।
यह विधेयक भारतीय महिलाओं की आशा और अस्मिता से सीधा जुड़ा था। किन्तु इसे गिराकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने यह स्पष्ट कर दिया कि वे महिलाओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखते हैं। केवल उपनाम के आधार पर राजनीति में खड़ी प्रियंका गांधी, परिवारवाद के सहारे अपनी पत्नी को सांसद बनाने वाले अखिलेश यादव, और अपने राज्य में 294 विधानसभा सीटों में से मात्र 52 पर महिला उम्मीदवार उतारने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी-महिलाओं को व्यापक नेतृत्व में देखना ही नहीं चाहते।
नारी नहीं भूलेगी अपना अपमान

आज भारत का हर नागरिक देख रहा है कि कैसे भारत की नारी शक्ति की उड़ान को रोक दिया गया। उनके सपनों को बेरहमी से कुचल दिया गया है। हमारे लिए देश हित सर्वोपरि है, लेकिन जब कुछ लोगों के लिए दल-हित सब कुछ हो जाता है, दल-हित, देश-हित से बड़ा हो जाता है, तो नारी शक्ति को, देश-हित को, इसका खामियाजा उठाना पड़ता है। इस बार भी यही हुआ है। कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और समाजवादी पार्टी जैसे दलों की स्वार्थी राजनीति का नुकसान देश के नारी शक्ति को उठाना पड़ा है।
कल देश की करोड़ों महिलाओं की नजर संसद पर थी, देश की नारी शक्ति देख रही थी, मुझे भी यह देखकर बहुत दुख हुआ, कि जब ये नारी हित का प्रस्ताव गिरा, तो कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, सपा, जैसी परिवारवादी पार्टियां, खुशी से तालियां बजा रही थीं। वो नारी के स्वाभिमान पर उसके आत्मसम्मान पर चोट थी और नारी सब भूल जाती है, अपना अपमान कभी नहीं भूलती, इसलिए संसद में कांग्रेस और उसके सहयोग के उन सबके व्यवहार की कसक हर नारी के मन में हमेशा रहेगी।
महिला आरक्षण का विरोध करके जो पाप विपक्ष ने किया है, इसकी उन्हें सजा जरूर मिलेगी। इन दलों ने संविधान निर्माताओं की भावनाओं का भी अपमान किया है और जनता द्वारा इसकी सजा से भी वो बच नहीं पाएंगे।
ये 40 साल से लटके हुए नारी के हक को, 2029 के अगले लोकसभा चुनाव से उसका हक देने का संशोधन था। नारी शक्ति वंदन संशोधन 21वीं सदी के भारत की नारी को नए अवसर देने, नई उड़ान देने, उसके सामने से बाधाएं हटाने का महायज्ञ था। देश की 50% यानी आधी आबादी को उसका अधिकार देने का साफ नियत के साथ, ईमानदारी के साथ किया गया एक पवित्र प्रयास था।
हमारा आत्मबल अजेय है। हमारा प्रयास रुकेगा नहीं, हमारा प्रयास थमेगा नहीं। हमारे पास आगे अभी और मौके आएंगे, हमें आधी आबादी के सपनों के लिए, देश के भविष्य के लिए, इस संकल्प को पूरा करना ही है।
– नरेन्द्र मोदी,प्रधानमंत्री (राष्ट्र के नाम संबोधन का अंश 18.04.2026)
कांग्रेस की सोच महिला विरोधी

-अमित शाह, केंद्रीय गृहमंत्री (सदन में चर्चा के दाैरान)
महिला नेतृत्व बनाम परिवारवाद
विगत सत्तर वर्ष से “इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा” का नारा देने वाले राजनीतिक विमर्श में भी महिलाओं को वास्तविक नेतृत्व नहीं दिया गया। ये दल नहीं चाहते कि प्रतिभाशाली महिलाएं उनके स्थापित राजनीतिक ढांचे को चुनौती दें। उनके लिए महिला सशक्तिकरण अपने परिवार तक सीमित है,गांव, वंचित और सामान्य वर्ग की महिलाओं से उन्हें कोई मतलब नहीं है।
महिला नेतृत्व के संदर्भ में भारत ने पिछले ग्यारह वर्ष में महत्वपूर्ण प्रगति की है। 2014 से पहले जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 8 प्रतिशत था, वहीं आज यह बढ़कर 14.4 प्रतिशत तक पहुंच गया है। वैश्विक स्तर पर मंत्रिमंडलों में महिलाओं की भागीदारी लगभग 22-23 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह लगभग 14.4 प्रतिशत है।
विश्व के 195 देशों में से मात्र 28 देशों में ही महिलाएं राष्ट्राध्यक्ष हैं। वैश्विक स्तर पर केवल लगभग 6 प्रतिशत सीईओ महिलाएँ हैं और फॉर्च्यून 500 कंपनियों में यह आँकड़ा लगभग 4 प्रतिशत है। इसके विपरीत, स्थानीय प्रशासन में भारत का प्रदर्शन उल्लेखनीय है, जहाँ महिला नेतृत्व लगभग 47 प्रतिशत है-जो वैश्विक औसत 36 प्रतिशत से अधिक है।
इसी सुदृढ़ आधार पर अब संसद और विधानसभाओं में महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया, किन्तु दुर्भाग्यवश इसे रोक दिया गया।

परिसीमन और राजनीतिक भ्रम
विरोध का प्रमुख कारण परिसीमन (Delimitation) बताया गया, जबकि यह प्रावधान विधेयक में पहले से मौजूद है। वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में परिसीमन न केवल आवश्यक है बल्कि अनिवार्य भी।
उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश के पास 29 लोकसभा सीटें हैं, जबकि केरल के पास 20। मध्य प्रदेश का क्षेत्रफल लगभग 3,08,252 वर्ग किमी और जनसंख्या लगभग 8.5 करोड़ है, जबकि केरल का क्षेत्रफल 38,863 वर्ग किमी और जनसंख्या लगभग 3.5 करोड़ है। इसके बावजूद सीटों का अंतर सीमित है।
आज भी 127 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां लगभग 21 लाख लोगों पर एक सांसद है। ऐसे में जनसंख्या और भूभाग के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना आवश्यक है। परिसीमन के बाद सीटों में वृद्धि होती और उसी अनुपात में महिला प्रतिनिधित्व भी बढ़ता-यही बात परिवारवादी राजनीति करने वाले दलों को स्वीकार्य नहीं थी।

पुराना इतिहास
महिला आरक्षण विधेयक की यात्रा लंबी और विवादित रही है। पहली बार 1996 में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार ने इसे संविधान संशोधन विधेयक के रूप में प्रस्तुत किया था। इसके बाद 1998, 1999, 2002 और 2008 में भी इसे पेश किया गया, लेकिन हर बार राजनीतिक असहमति के कारण यह पारित नहीं हो सका।
कुछ दलों ने यह तर्क दिया कि यह विधेयक केवल विशेष वर्ग की महिलाओं को लाभ देगा, जबकि जाति और धर्म के आधार पर अतिरिक्त आरक्षण की माँग कर इसे और जटिल बनाया गया। परिणामस्वरूप, महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व देने का यह प्रयास बार-बार विफल होता रहा।
यह विधेयक केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का विषय नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की समावेशी शक्ति का प्रतीक है। यह उस स्त्रीशक्ति की नेतृत्व क्षमता का सम्मान है जिसने परिवार, समाज और राष्ट्र को हर संकट, यहां तक कि कोविड जैसी वैश्विक आपदा में संभाला। यह विधेयक भारत के भविष्य से जुड़ा है, एक ऐसे भविष्य से, जहां आधी आबादी केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता होगी। भारत की स्त्रीशक्ति सब देख रही है, समझ रही है और समय आने पर इसका उत्तर अवश्य देगी।
न्यायपूर्ण नेतृत्व की मांग
महिला आरक्षण विधेयक की चर्चा ने भारतीय समाज में स्त्री नेतृत्व के प्रति नई चेतना जगाई है। यह सिर्फ कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि आधी आबादी को सच्चे अर्थों में बराबरी का दर्जा देने की लोकतांत्रिक मांग है। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है। ऐसे में उनका राजनीतिक नेतृत्व अपरिहार्य है, न कि दया या अनुग्रह का विषय। स्त्री शक्ति की कल्पना तभी सार्थक है जब उसे सत्ता के वास्तविक बंटवारे और निर्णय–निर्माण में स्थान मिले। विपक्ष के विरोध ने यह भी स्पष्ट किया कि कई राजनीतिक दलों की प्राथमिकता जनप्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि पुरानी व्यवस्थाओं को ही बनाए रखना है। वे चाहते हैं कि महिलाएं चुनावी रणनीति के लिए उपयोगी तो हों, पर संस्थागत नेतृत्व तक न पहुंच पाएं।

















