पूरे आकाश में और साथ ही विशाल अंतरिक्ष में हर जगह शांति हो। इस पृथ्वी पर, जल में और सभी जड़ी-बूटियों, पेड़ों और लताओं में शांति हो। पूरे ब्रह्मांड में शांति का प्रवाह हो। परमपिता ब्रह्म में शांति हो। और केवल शांति और हमेशा शांति हो। ओम् हमें और सभी प्राणियों के लिए शांति, शांति और शांति!
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः
पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः
सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
वेदों में विश्व को तीन भागों में विभाजित किया गया है- पृथ्वी, अंतरिक्ष (आकाश) एवं द्यौ। आकाश का सम्बन्ध बादल, विद्युत और वायु से है, धुलोक का सम्बन्ध सूर्य, चन्द्रमा,गृह और तारों से हैं। पृथ्वी गोल है। ऋग्वेद 1/33/8 में पृथ्वी को आलंकारिक भाषा में गोल बताया गया है। इस मंत्र में सूर्य पृथ्वी को चारों ओर से अपनी किरणों द्वारा घेरकर सुख का संपादन (जीवन प्रदान) करने वाला बताया गया है। पृथ्वी अगर गोल होगी तभी उसे चारों और से सूर्य प्रकाश डाल सकता है।
अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त (कुल 63 मंत्र है ) में पृथ्वी को समस्त जड़ चेतन जगत की जननी और पोषक बताया गया है, सभी जीव वनस्पति,जल , अन्न , पशु आदि इसी पर आश्रित हैं। यहां प्रार्थना की गई है कि पृथ्वी हमें अन्न , धन, गायें समृद्धि प्रदान करें तथा रोग, क्लेश और शत्रुओं से रक्षा करें। पृथ्वी को ऋत अर्थात शाश्वत प्राकृतिक नियमों का पालन करने वाली बताया गया। मनुष्य को पृथ्वी की रक्षा के लिए साहसी तेजस्वी और कर्तव्यनिष्ठ बनने का संदेश दिया है। पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने वाली बताया गया है।
पृथ्वी के बारे में बड़ा रोचक वर्णन ऋग्वेद (1/185/1) में मिलता है जिसमें लिखा है कि जैसे दिन रात्रि का चक्र निरंतर चलता है , रथ का पहिया ऊपर नीचे घूमता है, उसी प्रकार पृथ्वी की स्थिति भी परिवर्तनशील है अर्थात पृथ्वी स्थिर नहीं, गतिशील है। अथर्ववेद (12/1/52) में भी पृथ्वी की वार्षिक गति का वर्णन मिलता है जहां यह बताया गया कि पृथ्वी वर्ष भर में सूर्य के चारों चक्कर लगाकर पुन : उसी स्थिति में लौट आती है। ऋग्वेद (10/149/1) तथा (1/35/2, 1/35/9) में उल्लेख मिलता है कि ईश्वर अपनी आकर्षण शक्ति से पृथ्वी सूर्य और अन्य लोगों को आकाश में स्थित रखता है , जो कहीं ना कहीं आज के आधुनिक गुरुत्वाकर्षण की ओर संकेत करता है। ऋग्वेद (1/164/13) में सूर्य को केंद्र और अन्य पिंडों को उसके चारों ओर स्थित बताते हुए सौरमंडल की संरचना का संकेत दिया है। ऋग्वेद (1/84/15) में यह कहा गया कि सूर्य अपने प्रकाश से पृथ्वी और चंद्रमा को प्रकाशित करता है ।
वेदों में पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश दिया है। यजुर्वेद में लिखा है कि पृथ्वी को मजबूत बनाओ , उसके साथ हिंसा मत करो अर्थात प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। ऋग्वेद में लिखा है, जल तुम सुख देने वाले हो , हमें शक्ति ऊर्जा प्रदान करो और हमें महान जीवन के लिए सक्षम बनाओ। ऋग्वेद में वायु के लिए लिखा है कि हे वायु तुम औषधि के समान हो ,हमारे हृदय को सुख देने वाले हो ,हमारी आयु को बढ़ाओ। कुल मिलाकर प्रकृति का संतुलन बनाकर चलना ही वेदों का संदेश है। पर्यावरण संरक्षण जीवन जीने की संस्कृति है। भारतीय परंपरा मूलतः प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित रही है, जहाँ मानव एवं प्रकृति का सहचर्य है।
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
अर्थात इस चराचर जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर (प्रकृति) द्वारा व्याप्त है। इसलिए, प्रकृति का भोग त्याग की भावना से करें, लोभ या लालच से नहीं।
पद्मपुराण का मंत्र –
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुकान्ते वसुंधरे।
मृत्तिके! हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्।।
अर्थात हे पृथ्वी! जो घोड़ों और रथों से रौंदी जाती है,मेरे द्वारा किए गए पापों को क्षमा करें। यह पर्यावरणीय क्षति के प्रति पश्चाताप का भाव है। आज के संदर्भ में यह सस्टेनेबल डेवलपमेंट का नैतिक आधार है।
ईशोपनिषद का मंत्र –
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।।
अर्थात जो व्यक्ति सभी प्राणियों में अपने आत्मा को देखता है और अपने में सभी प्राणियों को , वह किसी से द्वेष नहीं करता। यह अहिंसा और सार्वभौमिक एकता का सिद्धांत है। सबमें वही आत्मा है यह पर्यावरण संरक्षण का आधार है।
परिवार इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जल संरक्षण, वृक्षारोपण, अपशिष्ट प्रबंधन और संतुलित उपभोग जैसी आदतें बचपन से ही सिखाई जाएँ, तो ये केवल नियम नहीं, बल्कि जीवन शैली बन जाएँगी। भारतीय संविधान भी इस दिशा में मार्गदर्शन करता है। नीति-निर्देशक तत्वों में पर्यावरण संरक्षण को राज्य का दायित्व बताया गया है, वहीं मूल कर्तव्यों में प्रत्येक नागरिक से प्रकृति की रक्षा करने की अपेक्षा की गई है। विशेष रूप से भारत की जनजातीय परंपराएँ हमें प्रेरणा देती हैं। बिश्नोई समाज, उत्तर-पूर्व की जनजातियाँ, लद्दाख और हिमालयी समुदाय प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीते हैं।
अतः स्पष्ट है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए नीतियों के साथ-साथ संस्कारों की आवश्यकता है। जब हम अपनी संस्कृति और प्रकृति के साथ पुनः जुड़ेंगे, तभी एक सच्चे अर्थों में पर्यावरण-सम्मत समाज का निर्माण संभव होगा।
विकास की दौड़ और प्रकृति
आज मानव ने प्रगति के शिखर छू लिए हैं, उसके पास आधुनिक शहर, विशाल उद्योग, तेज़ रफ्तार जीवन, पर इसी विकास की चमक के पीछे एक गहरी चिंता छिपी है, प्रदूषित वायु, घटते जल स्रोत, कटते वन और असंतुलित प्रकृति। हम कितना विकास चाहते है ? क्या इसकी कोई सीमा है ? आखिर हमें तय करना होगा कि हमें कितना विकास चाहिए, विकास की सीमा तय करने होगी अन्यथा हमारा स्वयं का विनाश हो जाएगा।
हम पर्यावरण सरंक्षण एवं विकास की बातें तो अवश्य करते हैम, प्रकृति की पूजा की बात करते हैं, नदियों को माँ कहकर सम्मान देते हैं, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि इन आदर्शों का हमारे आचरण में कितना स्थान है? क्या हमारे आचरण में वह संवेदना दिखाई देती है, जिसकी हम बातें करते हैं? यही वह बिंदु है जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
सरकार की नीतियाँ भी कागज़ पर स्पष्ट हैं, जहाँ वृक्ष कटते हैं, वहाँ कई गुना अधिक वृक्ष लगाने का प्रावधान है, लेकिन वास्तविकता में यह संतुलन कहीं दिखाई नहीं देता। खनन, परिवहन के साधनों का विस्तार, उद्योगों की निरंतर वृद्धि, इन सबने हर वर्ष जंगलों को और कम कर दिया है। विकास के नाम पर हम प्रकृति से लगातार लेते जा रहे हैं, पर उसे लौटाने का भाव कम होता जा रहा है।
यदि यही क्रम चलता रहा, तो भविष्य की तस्वीर भयावह हो सकती है। हमारे पास आधुनिक उद्योग होंगे, चौड़ी और चमचमाती सड़कें होंगी, अत्याधुनिक शहर और स्वचालित (ऑटोमेटेड) जीवन-प्रणाली होगी, लेकिन क्या उस जीवन में सांस लेने के लिए शुद्ध वायु होगी? क्या पीने के लिए स्वच्छ जल होगा? क्या प्रकृति का संतुलन बचेगा? यदि नहीं, तो यह विकास किस काम का?
धरती की सीमाएँ अब टूट चुकी हैं, अर्थ ओवरशूट दिवस ( Earth Overshoot Day 2025 इस वर्ष 24 जुलाई को ही आ गया यानी सालभर के लिए जितने संसाधन धरती पुनः उत्पन्न कर सकती थी, मानव ने उन्हें केवल सात महीने में ही समाप्त कर दिया। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह असंतुलन हमारे अस्तित्व को सीधी चुनौती है।
यही कारण है कि महात्मा गांधी ने कहा था कि पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, पर उसके लालच के लिए नहीं। अब समय है अपने आचरण में भी परिवर्तन लाएँ तभी विकास और प्रकृति के बीच सच्चा संतुलन स्थापित हो सकेगा।
भारतीय दर्शन सदैव हमें संतुलित जीवन का मार्ग दिखाता है। अपरिग्रह हमें सिखाता है कि आवश्यकता से अधिक संग्रह न करें। अहिंसा मनुष्य के साथ साथ प्रकृति ,पेड़, जल, पशु-पक्षी अर्थात सभी के प्रति करुणा और संरक्षण का भाव है। हमारे शास्त्रों में पृथ्वी को माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः कहा गया, यह धरती केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी माँ है।
अंततः, हमें यह तय करना है कि हम केवल विकास के उपभोक्ता बनेंगे या इस धरती के सजग संरक्षक? क्योंकि यदि पृथ्वी बची रहेगी, तभी मानव का भविष्य सुरक्षित रहेगा।

















