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बाबासाहेब, बंगाल और बुद्ध

जोगेंद्र नाथ मंडल को भीम-मीम की राजनीति के छल को समझाने वाले डॉ. आंबेडकर सामाजिक समस्याओं का समाधान भारतीय दर्शन और सांस्कृतिक अनुभव से लेते थे, यही भारत के संविधान का आधार बना।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Apr 25, 2026, 09:05 am IST
inसम्पादकीय

बाबासाहेब की जयंती अभी निकली है और बुद्ध पूर्णिमा निकट है। ऐसे में यह समय भारतीय संस्कृति और दर्शन के साथ-साथ राजनीतिक इतिहास के कुछ पन्ने पलटने का है।

बुद्ध पूर्णिमा हमें करुणा, मैत्री और मानव-मर्यादा की याद दिलाती है। बाबासाहेब आंबेडकर का चिंतन भी इसी भारतीयता में पगी प्रेरणा से निर्मित था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उनकी सामाजिक दर्शन-त्रयी; स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व, फ्रांसीसी क्रांति से नहीं, बल्कि बुद्ध की शिक्षाओं से निकली है, और लोकतंत्र तभी टिकेगा जब सामाजिक जीवन में भी यही मूल्य जिए जाएं। भारतीय सांस्कृतिक चेतना का मूल भी यही समावेशी बंधुत्व है।

बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के इस समावेशी, किन्तु भारत, इसकी संस्कृति और नागरिकों के प्रति खरे आग्रह रखने वाले स्वभाव पर चर्चा कम ही होती है। यह राजनीतिक रूप से एक-दूसरे से भिड़ने का विषय नहीं है, यह उस व्यक्ति की यात्रा को समझना है जिसने अपमान को ऊर्जा में बदला, पीड़ा को विचार में बदला और संघर्ष के समाधान को संविधान में बदल दिया।

राजनीतिक व्याख्याकारों, पूर्वाग्रह-ग्रस्त बौद्धिक लामबंदियों द्वारा उन्हें अक्सर टुकड़ों में समझाया गया है। जैसे कोई उन्हें केवल एक जाति-वर्ग का नेता कह देता है, कोई उन्हें ब्राह्मण-विरोधी बताता है, तो कोई उन्हें केवल विद्रोही के रूप में देखता है। लेकिन जब हम उनके जीवन और उनके अपने शब्दों के साथ बैठते हैं, तो एक बिल्कुल अलग बहुपक्षीय व्यक्तित्व सामने आता है, जो प्रचलित धारणाओं से अधिक गहरा, संतुलित और व्यापक है।

उनके बारे में सबसे बड़ी गलतफहमी यह बनाई गई कि वे ब्राह्मण-विरोधी थे। लेकिन जब हम उनके जीवन-प्रसंगों को देखते हैं, तो यह धारणा खुद ही टूटने लगती है। एक ब्राह्मण शिक्षक ‘कृष्णाजी’ ने उन्हें अपना ब्राह्मण उपनाम दिया और उन्होंने उसे सम्मान के साथ जीवन भर हृदय से लगाए रखा। जब उनके लेखन को परखते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि वे व्यक्ति नहीं, व्यवस्था की आलोचना करते हैं। वे उस सोच के विरुद्ध खड़े होते हैं जो मनुष्य को जन्म के आधार पर छोटा या बड़ा बनाती है।

इसी तरह एक और बात कांग्रेस के साथ उनके संबंधों की है। उनका यह रिश्ता भी सीधा नहीं था, बल्कि घटनाओं के परिणामों से उत्पन्न जटिलताओं से भरा था। उन्होंने कांग्रेस के साथ काम भी किया और अपमान तथा टकराव भी झेला। पूना पैक्ट उनके जीवन का ऐसा मोड़ था, जहां उन्हें अपने ही सिद्धांतों से समझौता करना पड़ा। यह समझौता उन्होंने मजबूरी में किया, लेकिन उसके भीतर की पीड़ा उन्होंने कभी छिपाई नहीं। बाद में जब हिंदू कोड बिल को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो उन्होंने मंत्री पद छोड़ दिया। यह त्याग केवल राजनीतिक नहीं था, यह अपनी बात के लिए खड़े होने का साहस था।

वामपंथ और इस्लाम को लेकर भी उनका नजरिया बहुत साफ था। मुस्लिम लीग के बारे में डॉ. आंबेडकर विशेष रूप से सावधान थे। नवंबर 1947 के अपने वक्तव्य में उन्होंने अनुसूचित जातियों को चेताया कि पाकिस्तान या हैदराबाद में मुसलमानों अथवा मुस्लिम लीग पर भरोसा करना घातक होगा। उनका अनुभव था कि लीग ने दलितों का साथ केवल तब दिया जब उससे उसका अपना हित सधता था, पर दलितों के दावों को स्थायी न्याय नहीं दिया। इसी तर्क की अगली कड़ी में उन्होंने लिखा कि यदि बंटवारा संप्रदाय के आधार पर होना ही है, तो केवल सीमाएं खींचना पर्याप्त नहीं; ‘अल्पसंख्यकों का स्थानांतरण’ ही स्थायी सांप्रदायिक शांति का उपाय है, क्योंकि पाकिस्तान बनने के बाद भी हिंदुस्तान में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का प्रश्न बना रहेगा।

बाबासाहेब की बात को गलत मानते हुए मुस्लिम भरोसे के भ्रम में आगे बढ़ने और फिर चोट खाने वाले बंगाल के जोगेंद्र नाथ मंडल का अनुभव इस सत्य का कठोर ऐतिहासिक पाठ है। उन्होंने मुस्लिम लीग से यह मानकर सहयोग किया कि मुसलमानों और अनुसूचित जातियों के हित जुड़े हैं, पर 1950 के अपने इस्तीफे में उन्होंने पूर्वी बंगाल में हिंसा, असुरक्षा और अल्पसंख्यकों के प्रति शासन की निष्ठाहीनता का विस्तृत वर्णन किया; इसके बाद उन्हें पाकिस्तान छोड़कर भारत में बसना पड़ा।

इसी तरह श्रमिकों के मामले में बाबासाहेब वामपंथी दृष्टिकोण का ढोंग जानते थे। वे बराबरी चाहते थे, लेकिन हिंसा के रास्ते से नहीं। उन्हें लगता था कि भारत की असली समस्या केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि सामाजिक है, और जाति उस समस्या का केंद्र है। इसलिए उन्होंने ऐसा रास्ता चुना जिसमें नैतिकता हो, करुणा हो और मनुष्य की गरिमा बनी रहे। बौद्ध पंथ की ओर उनका झुकाव इसी सोच का परिणाम था।

उनकी दूरदृष्टि का एक पहलू यह भी था कि उन्होंने बहुत पहले यह समझ लिया था कि जब धर्म राजनीति से ऊपर हो जाता है, तो समाज में टकराव बढ़ता है। उन्होंने यह बात उस समय कही, जब देश विभाजन की ओर बढ़ रहा था। आज जब दुनिया के कई हिस्सों में वही संघर्ष दिखते हैं, तो उनकी बात और भी स्पष्ट हो जाती है।

लेकिन अगर उनके व्यक्तित्व का सबसे सुंदर पक्ष देखना हो, तो वह उनका राष्ट्र के प्रति दृष्टिकोण है। उन्होंने कहा था कि हम पहले भारतीय हैं और अंत तक भारतीय रहेंगे। यह केवल एक वाक्य नहीं था, यह उनका विश्वास था। वे चाहते थे कि समाज में बराबरी हो, लेकिन यह बराबरी देश को तोड़कर नहीं, बल्कि जोड़कर आए। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए काम किया, श्रमिकों के लिए कानून बनाए, जल और अर्थव्यवस्था पर नीतियां दीं। यह सब किसी एक वर्ग के लिए नहीं था, यह पूरे भारत के लिए था।

संस्कृति के मामले में भी उनका दृष्टिकोण विरोध का नहीं, सुधार का था। उन्होंने संस्कृत और ज्ञान-परंपरा का समर्थन किया, क्योंकि वे जानते थे कि यह हमारी धरोहर है। उन्होंने कन्वर्जन के लिए आए पोप के हरकारों को लौटाया, उन्होंने हैदराबाद के निजाम द्वारा इस्लाम अपनाने के आग्रह को ठुकराया, किंतु साथ ही 21 वर्ष तक हिंदू समाज को कुरीतियां छोड़ने के आग्रह के साथ झकझोरते हुए भारत में ही उत्पन्न बौद्ध पंथ को अपनाया। वे अपनी सांस्कृतिक समझ की जड़ों से जुड़े रहे, बस उन्हें अधिक काल-सुसंगत तथा न्यायपूर्ण बनाना चाहते थे।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि परिवर्तन केवल आक्रोश से नहीं आता। उन्होंने अपमान को महसूस किया, लेकिन उसे घृणा में नहीं बदला। उन्होंने उसे शिक्षा और ज्ञान में बदला, विचार में बदला, व्यवस्था-निर्माण और नियमन में बदला। यही कारण है कि वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक दिशा बन गए।

आज जब हम उन्हें देखते हैं, तो प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि वे किसके नेता थे। असली सवाल यह है कि क्या हमने उन्हें पूरी तरह समझा है। क्या हमने उन्हें केवल एक प्रतीक बनाकर छोड़ दिया है, या उनके विचारों को अपने जीवन में उतारने, आत्मसात करने की कोशिश की है। उनका संदेश—शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो,किसी एक समाज के लिए नहीं था, यह हर उस व्यक्ति के लिए था जो अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहता।

बाबासाहेब को समझना मतलब यह समझना कि एक व्यक्ति कितनी दूर तक सोच सकता है और कितना बड़ा परिवर्तन ला सकता है। वे केवल इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, वे आज भी हमारे सामने एक सवाल की तरह खड़े हैं कि हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं।
आज बंगाल में तृणमूल कांग्रेस द्वारा कट्टरपंथी ध्रुवीकरण, पहचान-आधारित लामबंदी और नागरिकों की कीमत पर घुसपैठियों का ‘तुष्टीकरण’ जैसी बहसें तेज हैं।

ऐसे में बाबासाहेब की दृष्टि हमें सिखाती है कि सामाजिक और राष्ट्रीय हित दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं, साथ ही यह किसी भी वोट-बैंक राजनीति के अधीन नहीं हो सकते। बुद्ध पूर्णिमा पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि भारतीयता और इसके वास्तविक नागरिकों की नागरिकता की पहचान परखते हुए, किसी भी तुष्टीकरण या कट्टरता के आगे झुके बिना, सबके लिए समान नागरिकता, समान सुरक्षा और समान सम्मान की बात की जाए। और अंत में एक बात, जिसके नाम में ही ‘बाबा’ जुड़ा हो, उसे समग्रता से देखना चाहिए। ‘बाबा’ किसी एक के पक्ष में नहीं होते, वह पूरे परिवार के होते हैं।

X@hiteshshankar

Topics: सांस्कृतिक चेतनाबौद्ध धम्मपाञ्चजन्य विशेषतुष्टीकरण की राजनीतिजोगेंद्र नाथ मंडलहिंदू कोड बिलबुद्ध पूर्णिमाभारतीय दर्शनस्वतंत्रता
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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