कश्मीर शैवदर्शन : चेतना का अद्वैत प्रवाह
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होम भारत

कश्मीर शैवदर्शन : चेतना का अद्वैत प्रवाह

पिछले अंक में आपने पढ़ा कि उत्तर भारत-दक्षिण भारत औपनिवेशिक विभाजन हैं। प्राचीन इतिहास में इन्हें उत्तरापथ-दक्षिणापथ कहा गया है, जो परस्पर भिन्न संस्कृतियां नहीं, अपितु सांस्कृतिक आदान-प्रदान के मार्ग थे। राष्ट्र नवराष्ट्रवाद या बहुराष्ट्रवाद नहीं, चिरराष्ट्रवाद-स्मृतियों से पोषित आध्यात्मिक एकता है। डॉ. आंबेडकर व वैदिक दृष्टि साझा भावना व भूमि-चेतना से बंधी है। कश्मीर शैवमत इसका सेतु है। पढ़िए गतांक से आगे-

Written byजे नंदकुमारजे नंदकुमार
Feb 26, 2026, 12:45 pm IST
inभारत, विश्लेषण, संघ @100, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
केरल का अझिमाला शिव मंदिर : 58 फीट ऊंची गंगाधेश्वर प्रतिमा, मंत्रमुग्ध कर देने वाला तटीय दृश्य, समृद्ध इतिहास और आध्यात्मिक अनुभव का अद्वितीय संगम है।

केरल का अझिमाला शिव मंदिर : 58 फीट ऊंची गंगाधेश्वर प्रतिमा, मंत्रमुग्ध कर देने वाला तटीय दृश्य, समृद्ध इतिहास और आध्यात्मिक अनुभव का अद्वितीय संगम है।

यदि चेतना ही परम सत्य है और समस्त जीव उसी की अभिव्यक्तियां हैं, तो कोई भी सामाजिक वर्गीकरण उपयुक्त नहीं। अस्तित्व के आधार पर कोई मनुष्य निम्न नहीं हो सकता। इस अर्थ में कश्मीर शैववाद केवल आध्यात्मिक दर्शन नहीं, बल्कि गहन नैतिक-सामाजिक दृष्टि भी है। रवींद्रनाथ ठाकुर के शब्दों में, “विविधता में एकता का अनुभव करना और भिन्नताओं में सामंजस्य स्थापित करना ही भारत का मूल धर्म है। यह विनाश नहीं, समायोजन चाहता है।”

यह अंतर्दृष्टि ज्ञान परंपराओं पर भी समान रूप से लागू होती है। संस्कृत शास्त्र, मलयालम मंत्र, कश्मीरी छंद और केरल की आचार-संहिताएं एक साझा बौद्धिक विरासत के विविध रूप हैं। उन्हें ‘उच्च’ और ‘नीच’ श्रेणियों में बांटना औपनिवेशिक अकादमिक वर्गीकरण की पुनरावृत्ति है। मंत्र सीमाओं से परे हैं। वे विश्व को पवित्र करते हैं, देह को दिव्यता का माध्यम बनाते हैं और ज्ञान को भाषा, भूगोल तथा सामाजिक बंधनों से मुक्त रखते हैं। क्रम परंपरा सिखाती है कि निरपेक्ष सत्य जड़ नहीं, बल्कि स्पंदित चेतना है। शक्ति गौण तत्व नहीं, बल्कि आत्मप्रकाश की सामर्थ्य है। राजनीतिक द्वंद्व के युग में क्रम एक तीसरा मार्ग प्रस्तुत करता है-अखंड एकता और जीवंत बहुलता का मार्ग।

कश्मीर की यह सूक्ष्म दृष्टि दक्षिण की जीवंत परंपराओं में प्रवाहित हुई। यह कर्नाटक के वीरशैव आंदोलन, लिंगायत वचन-परंपरा और शरणाओं से लेकर तमिल शैव सिद्धांत की तेवरम परंपरा तक और अंततः केरल के विशिष्ट शाक्त-शैव अनुष्ठानों में मूर्त हुई। केरल में क्रम केवल विचार नहीं, साकार आध्यात्मिकता बन जाता है। भगवती पूजा, सप्तमातृका आराधना, मातृभाव, थेय्यम और कलमेऴुतु-ये मात्र ‘लोक प्रथाएं’ नहीं, बल्कि अद्वैत की अनुष्ठानिक व्याख्याएं हैं। इसलिए जब सामाजिक रूप से हाशिए पर खड़ा एक थेय्यम कलाकार ‘जाग्रत देवता’ का स्वरूप धारण करता है और उसके समक्ष सभी वर्गों के लोग नतमस्तक होते हैं, तब क्रम का दर्शन प्रतीकात्मक नहीं, वास्तविक रूप में प्रकट होता है। अतः आवश्यकता है कि औपनिवेशिक दृष्टिकोण को बदला जाए-ऐसा दृष्टिकोण जो अनुष्ठान को विचार, प्रस्तुति को दर्शन और मूर्त रूपों को ज्ञान के वैध स्वरूप के रूप में स्वीकार करे।

शक्ति, अभिव्यक्ति और ब्रह्मांडीय लय

महेश्वरानंद का कथन है-‘स्व-शक्ति-विस्फार-मात्रं जगत्’, अर्थात् यह ब्रह्मांड परम चेतना की अपनी ही शक्ति का विस्तार है। तंत्र, विशेषकर कश्मीर शैववाद, सत्य को कठोर सीमाओं में बांधने से इनकार करता है। उसका स्वभाव विस्तारमय है। तांत्रिक दृष्टि में ज्ञान किसी अभिजात वर्ग, एक भाषा या किसी विशेष भूगोल तक सीमित नहीं रहता। वह प्रवाहमान है, रूपांतरित होता है और अनुकूल परिस्थितियों में नए रूप ग्रहण करता है। तंत्र सामाजिक अवरोधों, भाषाई सीमाओं और जड़ परंपराओं को तोड़ते हुए क्रम दर्शन की परिष्कृत अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है। क्रम के अनुसार निरपेक्ष सत्य कोई स्थिर या जड़ पूर्णता नहीं, बल्कि सक्रिय, स्पंदित चेतना है। शक्ति उसका केंद्र है-अभिव्यक्ति का सामर्थ्य। प्रत्येक धारणा, ज्ञान-प्रक्रिया और अनुष्ठान चेतना की उसी ब्रह्मांडीय लय की एक गति है, जो विविध पहचान रचती है।

क्रम बहुलता और ऐतिहासिक प्रक्रिया को समझने की स्वदेशी दृष्टि देता है। इसके विपरीत आधुनिक राजनीतिक विमर्श प्रायः दो चरम सीमाओं के बीच उलझा रहता है-एक ओर एकरूप केंद्रीकरण की प्रवृत्ति, दूसरी ओर पहचान-आधारित विभाजन का द्वंद्व। ऐसे समय में क्रम एक वैकल्पिक कल्पना प्रस्तुत करता है। वह सिखाता है कि किसी एक रूप को अंतिम सत्य बनाए बिना अन्य रूपों को कैसे स्वीकार किया जाए, अंतर्निहित एकता को खोए बिना भिन्नताओं को कैसे महत्व दिया जाए। इस तरह क्रम सत्तावादी एकीकरण व निरर्थक विभाजन, दोनों के लिए आध्यात्मिक परिशोधन का संदेश देता है।

जीवंत आध्यात्मिक धारा

कश्मीर इस विमर्श में विशिष्ट स्थान रखता है। यही वह भूमि है जहां इस दृष्टि को सर्वाधिक स्पष्ट और परिष्कृत अभिव्यक्ति मिली। अपनी शैव-शाक्त परंपराओं के माध्यम से कश्मीर ने तर्क, अनुभव और अनुष्ठान की संगति पर आधारित एक सुसंस्कृत बौद्धिक परंपरा विकसित की। यहां अद्वैतवाद केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि बौद्ध और नैयायिक विमर्श, ध्यान-साधना तथा साहित्यिक-भाषायी अभिव्यक्तियों से समन्वित जीवंत चिंतन है। क्रम-त्रिक परंपरा के आचार्य और नाट्यशास्त्र के प्रख्यात टीकाकार अभिनवगुप्त केवल धर्मशास्त्री ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के साहित्यकार और दार्शनिक भी थे। उनके लिए रंगमंच का रस और रहस्यवाद का आनंद अलग-अलग अनुभव नहीं, बल्कि एक ही अंतर्निहित सत्य की अभिव्यक्ति थे-स्वयं द्वारा स्वयं का आत्मबोध।

विचारों और प्रथाओं की इस यात्रा के स्रोत को समझने के लिए चेतना को एक नदी के रूपक में देखना होगा। एक ऐसी नदी, जिसका कोई स्थिर किनारा नहीं, फिर भी गंगा या कावेरी से भी अधिक तीव्र प्रवाहमान है। यह अद्वैत शैव परंपरा की चेतना-धारा है। हमारा उद्देश्य क्रम और प्रत्यभिज्ञा जैसी दो विशिष्ट विचारधाराओं के बौद्धिक-आध्यात्मिक प्रवास को समझना है। यह यात्रा कश्मीर की हिमाच्छादित चोटियों से आरंभ होकर कर्नाटक से गुजरती हुई केरल की हरित भूमि में अनुष्ठानिक पूर्णता प्राप्त करती है। इस प्रवाह को समझने के लिए सर्वप्रथम ‘प्रकाश’ और ‘प्रतिबिंब’ के पारस्परिक संबंध को समझना आवश्यक है।

तमिलनाडु स्थित चिदंबरम नटराज मंदिर

प्रत्यभिज्ञा : आत्म-परिचय का दर्शन

प्रत्यभिज्ञा दर्शन, अर्थात् ‘पहचान का दर्शन’, कश्मीर की दार्शनिक परंपरा का बौद्धिक मुकुट माना जाता है। इसकी स्थापना सोमानंद ने की, उत्पलदेव ने इसे दार्शनिक गहराई प्रदान की और अभिनवगुप्त ने इसे सुव्यवस्थित रूप में परिष्कृत किया। इसका केंद्रीय संदेश सरल, किंतु अत्यंत गूढ़ है-“जिस सत्य को तुम खोज रहे हो, वह स्वयं तुम ही हो।”

उत्पलदेव की ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका (1.1) में कहा गया है कि जब साधक महेश्वर-स्वरूप की अनुभूति करता है, तब वह अपने अंतर्निहित शिवत्व का साक्षात्कार कर परम तृप्ति प्राप्त करता है। यहां मूल प्रश्न है-पहचान किसकी? प्रत्यभिज्ञा का उत्तर है-जीव और निरपेक्ष शिव में कोई वास्तविक भेद नहीं। मुक्ति में बाधा केवल अस्थायी विस्मृति है, जिसे दूर करना है। इसे एक रूपक से समझा जा सकता है। यदि कोई राजकुमारी भूलवश सामान्य व्यक्ति की तरह पाली जाए, तो उसे राज्य प्राप्ति के लिए केवल अपनी वास्तविक पहचान का स्मरण करना होगा।

इसी प्रकार, साधक को भी अपनी अंतर्निहित स्वतंत्रता और शिवत्व की पहचान करनी होती है। जहां प्रत्यभिज्ञा मुक्ति का दार्शनिक आधार प्रदान करती है, वहीं क्रम उसकी अनुभूति की गतिशील प्रक्रिया है। ‘क्रम’ का अर्थ है अनुक्रम या आध्यात्मिक उत्तराधिकार-एक महान मार्ग की क्रमिक साधना। यह विशेष रूप से काली-उपासना से संबद्ध है, जहां काली केवल संहार की देवी नहीं, बल्कि समय और चेतना की गतिशील शक्ति हैं। क्रम दर्शन में चेतना किसी स्थिर सरोवर की भांति नहीं, बल्कि तरंगों की शृंखला के समान है। यह पंचवह चेतना के पांच आयामों को व्यक्त करता है-सृष्टि, स्थिति, संहार, अनाख्या और भास।

प्रत्यभिज्ञा का दक्षिणगमन

जब कश्मीरी प्रत्यभिज्ञा दर्शन दक्षिण की ओर प्रवाहित हुआ, तो उसने कर्नाटक को केवल स्पर्श भर नहीं किया, बल्कि वहां गहरा प्रभाव स्थापित करते हुए स्थानीय परंपराओं को भी आत्मसात किया। 12वीं शताब्दी में बसवण्णा के नेतृत्व में उभरे वीरशैव आंदोलन और वचन-परंपरा ने एक व्यापक आध्यात्मिक जागरण को जन्म दिया। इस आंदोलन को कश्मीरी प्रत्यभिज्ञा ने एक सुदृढ़ दार्शनिक आधार प्रदान किया। शक्ति-विशिष्टाद्वैत में कश्मीरी अद्वैत की स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनाई देती है। कश्मीरी आचार्यों की भांति वीरशैव शरणाओं ने भी जगत को मात्र माया मानने से इनकार किया। उनके लिए विश्व शिव की लीला है।

प्रत्यभिज्ञा-आधारित ‘लिंग-अंग समरसता’ की वीरशैव अवधारणा, जीव और परमात्मा की एकता को काव्यात्मक और व्यावहारिक रूप में व्यक्त करती है। यहां प्रत्यभिज्ञा केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं रहती, बल्कि जीवन-पद्धति का अभिन्न अंग बन जाती है-एक जीया हुआ अद्वैत। लिंगायत परंपरा से पूर्व कलामुख और पाशुपत संप्रदायों का उल्लेख भी आवश्यक है। इन तपस्वी परंपराओं ने कश्मीरी शैव ग्रंथों के दक्षिण में प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया। विद्वानों के अनुसार, शैवाद्वैत दार्शनिक श्रीकंठ शिवाचार्य के ग्रंथ, जो संभवतः कर्नाटक क्षेत्र से संबद्ध हैं, उपनिषद् चिंतन और उत्तर भारतीय शाक्त तत्वों के सृजनात्मक सम्मिश्रण को दर्शाते हैं।

चोल शासकों ने तमिल आचार्यों और कश्मीरी परंपराओं के मध्य संवाद को प्रोत्साहित कर इस बौद्धिक समन्वय को और सुदृढ़ किया। अल्लामा प्रभु की रहस्यवादी काव्यधारा में अभिनवगुप्त के विमर्श-सिद्धांत की अनुगूंज मिलती है-स्व-चेतना के आत्म-प्रकाश की अनुभूति। कर्नाटक के शिलालेख, जैसे बेलगावी का रट्टा शिलालेख, मठों को दिए गए दानों के संदर्भ में ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका का उल्लेख करते हैं, जो इस दार्शनिक परंपरा की जीवंत उपस्थिति का प्रमाण है।

‘पति-पशु-पाश’ और प्रत्यभिज्ञा की अंतर्धारा

अल्लामा प्रभु के वचन प्रायः विज्ञानभैरव तंत्र के ‘शून्य’ प्रतीक की अनुगूंज प्रस्तुत करते हैं। जब वे ‘प्रकाश के भीतर प्रकाश’ की बात करते हैं, तो वह ज्ञान के स्वप्रकाश स्वरूप की ओर संकेत है, जो प्रत्यभिज्ञा दर्शन के उस मूल सिद्धांत की अभिव्यक्ति, जिसमें चेतना स्वयं को स्वयं प्रकाशित करती है। यह समन्वय चोल साम्राज्य (9वीं-13वीं शताब्दी) के काल में तमिलनाडु में अपने उत्कर्ष पर पहुंचा। राजराज प्रथम ने अद्वैत शैव परंपरा के अनुयायियों को संरक्षण दिया और उत्तर भारतीय, विशेषतः कश्मीरी ग्रंथों के प्रसार को प्रोत्साहित किया। नयनार संतों के तिरुमुरै भक्ति-भजन दैवी उपस्थिति के सजीव अनुभव का आह्वान करते हैं। मेयकंदर परंपरा द्वारा सुव्यवस्थित शैव सिद्धांत ने कश्मीरी अद्वैत के तत्वों को एक द्वैताभासीय ढांचे में रूपायित किया, किंतु उसका मूल अंतर्ज्ञान अक्षुण्ण रहा। ‘आणव-मल’ के बंधन से मुक्त हुए बिना आत्मज्ञान और मोक्ष संभव नहीं।

यह धारणा दोनों परंपराओं को सेतु की भांति जोड़ती है। चिदंबरम के नटराज मंदिर के शिलालेख आनंद-तांडव के अनुभव में इसी आध्यात्मिक तत्व का आवाहन करते हैं। 19वीं शताब्दी में अरुमुगा नवलर ने प्रत्यभिज्ञा-संबंधी टीकाओं का प्रकाशन कर इस परंपरा को पुनर्जीवित किया। उनके नेतृत्व में हुए पुनरुद्धार ने भक्ति को केवल बाह्य अनुष्ठान न मानकर अंतःकरण में शिवस्वरूप के साक्षात्कार की साधना के रूप में पुनःस्थापित किया। शिव, जिन्हें लोग विस्मृत कर चुके थे, पुनः ‘हृदय की लय में नृत्य’ करने लगे। दक्षिण की शैव ‘पति-पशु-पाश’ व्याख्या भी अंततः उसी स्वातंत्र्य की पुनर्प्राप्ति की ओर संकेत करती है, जिसे त्रिक परंपरा अनुग्रह और आत्मबोध के माध्यम से उद्घाटित करती है।

केरल पहुंचने पर उत्तर का व्यापक प्रत्यभिज्ञा दर्शन मंदिरों के विस्तृत अनुष्ठानों में रूपांतरित होने लगा। 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच त्रावणकोर के शासकों के संरक्षण में इन धाराओं का प्रभाव और प्रबल हुआ। त्रिचूर के कृष्णपुरम् जैसे मठों में प्रत्यभिज्ञा ग्रंथों की पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। केरल में शैव सिद्धांत अधिक द्वैतवादी ढांचे में विकसित हुआ, फिर भी ‘पशु–मोक्ष’ के रूप में प्रत्यभिज्ञा की मूल अंतर्दृष्टि अक्षुण्ण रही। शरीर में बंधी आत्मा (पशु) दीक्षा द्वारा पति-अर्थात् शिव-के साथ अपनी अंतर्निहित पहचान का पुनःबोध करती है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका (1.5.11) में प्रतिपादित है कि चेतना की स्वयंप्रकाशमान प्रकृति से ‘मैं पूर्ण हूं’ की जागृति होती है, जिससे साधक जगत का साक्षी बनता है।

तंत्र, परंपरा और दार्शनिक समन्वय

पुर्तगाली दस्तावेजों से पता चलता है कि केरल में शैव ग्रंथ-संग्रहों में अभिनवगुप्त के तंत्रलोक के अंश स्थानीय तांत्रिक विधियों में समाहित थे। कुलोत्तुंग तृतीय जैसे चोल शासकों की सभाओं में प्रत्यभिज्ञा और विशिष्टाद्वैत पर विचार-विमर्श ने नाट्यगम अनुष्ठानों में ‘पुनःप्रत्यभिज्ञा’ के सिद्धांत को स्थापित किया।

केरल में क्रम मत ने स्थानीय नंबूदरी तांत्रिक परंपराओं के साथ सहज समन्वय किया। संस्कृत और प्राचीन कश्मीरी भाषा के मिश्रण से रचित ग्रंथ ‘महानयप्रकाश’ का संरक्षण और अध्ययन दक्षिण में सहज नहीं था। यह दार्शनिक समन्वय का प्रमाण है। केरल में भगवती (भद्रकाली) की उपासना क्रम मत का अनुष्ठानिक स्वरूप है। यहां सभी मंदिरों में पूजित सप्तमातृकाओं को क्रम के परंपरागत चरणों के अनुसार ही समझा और अनुभव किया जा सकता है।

मातृसद्भाव अनुष्ठान, जो केरल की प्रमुख शाक्तोपासना है, कश्मीरी क्रम परंपरा का ही विस्तार है। यहां विमर्श सिद्धांत का सतत प्रवाह स्पष्ट करता है कि परम सत्ता केवल मूक दर्शक नहीं, बल्कि जागरूकता की सक्रिय व जीवंत शक्ति है। केरल के ऋ षि महेश्वरानंद ‘महारथमंजरी’ में कहते हैं कि उत्तरी केरल इस चिंतन का महत्वपूर्ण भागीदार रहा है। समकालीन दृष्टिकोण में इसे ‘ईश्वर का अपना देश’, बैकवाटर-साक्षरता वआयुर्वेद-कथकली का केंद्र कहा जाता है, किंतु शायद ही इसे कभी तंत्र-मंत्र के ऐसे केंद्र के रूप में देखा गया हो, जहां आध्यात्मिक अंतर्ज्ञान परिष्कृत अनुष्ठान-प्रणालियों में रूप लेता रहा।

केरल की इस वास्तविकता को समझने के लिए औपनिवेशिक शब्दावली से परे दृष्टिकोण आवश्यक है। औपनिवेशिक शासकों और नृवंशविज्ञानियों द्वारा ‘शैतान-नृत्य’, ‘भूत-प्रेत भगाओ’ या ‘ग्रामीण अंधविश्वास’ जैसी संज्ञाएं केवल प्रथाओं को तुच्छ ठहराने का माध्यम नहीं, बल्कि उनके प्रयोगकर्ताओं के ज्ञान पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

उत्तरी केरल में थेय्यम, कलमेऴुथुमपट्टु, पवित्र उपवन और ग्रामीण भगवती मंदिरों की परंपराएं विकसित मंदिर-तंत्र के साथ संनादित होकर अद्वैत शाक्त-शैव चिंतन का जीवंत कोष रचती हैं। ये केवल शिवसूत्र पर टीका नहीं लिखतीं, बल्कि इसकी अंतर्दृष्टि को रक्त, अग्नि, वेशभूषा, हावभाव, आवेश और आशीर्वाद में साकार करती हैं। दार्शनिक दृष्टि से थेय्यम का अवलोकन शक्ति, क्रम, आवेश, अनुग्रह व अवज्ञा जैसी धाराओं को यथार्थ समय में घटित होते देखने के समान है। यह सिर्फ कल्पना नहीं, वरन् परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव है।
थेय्यम कलाकार के वेश का ध्यानपूर्वक अवलोकन करने पर वह महाचंद्रयोगेश्वरी (एक उग्र देवी) द्वारा आवेशित प्रतीत होता है। सामाजिक व्यवस्था में उसकी जाति भले ही नीची मानी जाए, पर अनुष्ठान के समय उसका स्थान सर्वोच्च होता है। समाज के सभी वर्ग उससे उपहार अर्पित करते हैं, आशीर्वाद ग्रहण करते हैं और उसके वचनों को दैवीय आज्ञा मानकर स्वीकार करते हैं।

औपनिवेशिक व्याख्या से परे तांत्रिक यथार्थ

औपनिवेशिक या समाजशास्त्रीय दृष्टि से इसे ‘क्षणिक मुक्ति’ या ‘अनुष्ठानिक विद्रोह’ कहा जा सकता है। किंतु कश्मीर शैव दर्शन के अनुसार, क्रम सत्य की गहन वास्तविकता उजागर करता है। तंत्र के वास्तविक स्वरूप में उपनिवेशवाद-विरोधी चेतना और तांत्रिक मत एकाकार हो जाते हैं। तंत्र को इसके सटीक अर्थ में समझने पर सामाजिक वर्गीकरण की मूल धारणाएं डगमगाती हैं। उपनिवेशवादी शब्दावली से परे इसका अध्ययन करने पर यह विद्रोही ऊर्जा आधुनिक उदारवादी या अपरिपक्व मानवविज्ञानी श्रेणियों से अलग पहचान पाती है। तब स्पष्ट होता है कि यह अनुष्ठान कोई ‘पूर्व-आधुनिक तमाशा’ नहीं, बल्कि अद्वैत का परिष्कृत अभिव्यक्ति- साधन है। चैतन्यात्मा की सारगर्भित व्याख्या, जहां चेतना ही आत्मा है।

इसी क्षेत्र के अन्य प्राचीन ग्रंथ इस दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं। नीलेश्वरम या उसके आस-पास लघुभट्टारक रचित ‘बालाविंशति’, जो बाद में पंचस्तवी में समाहित हुआ, कश्मीरी परंपरा के स्थानीय अनुयायियों के धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह दर्शाता है कि इस सांस्कृतिक धारा ने अपने स्वरूप को कैसे अक्षुण्ण बनाए रखा और आध्यात्मिक मूल तत्वों को संरक्षित रखते हुए विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और रूपों में सहज विस्तार की क्षमता कायम रखी।

अब ‘सांस्कृतिक प्रवाह’ की इस धारणा को गहराई से समझें। औपनिवेशिक विवरणों में भारत के सांस्कृतिक प्रभाव को एकतरफा धारा के रूप में चित्रित किया गया, जैसे-जैसे आर्य किसी ‘केंद्र’ से स्थानीय सीमाओं तक पहुंचे या संस्कृत से प्रादेशिक भाषाएं उत्पन्न हुईं। राष्ट्रवादी विमर्श में भी इन्हीं आख्यानों को चुनौती न देकर पुनर्विन्यासित किया गया, जिसमें केंद्र की जगह स्थानीय सीमाएं रख दी गईं, पर मूल कथानक अपरिवर्तित रहा। वास्तविकता यह है कि प्राचीन काल से निरंतर प्रवाहित सभ्यता में क्षेत्रीय सीमाएं कभी परस्पर विपरीत नहीं थीं। संस्कृत और प्रादेशिक भाषाओं में सदा पारस्परिक समन्वय रहा और अनुष्ठान व दर्शन परस्पर गुंथे हुए थे।

क्रम शृंखला इसी विचार को प्रतिपादित करती है, पर पूर्ण आरंभ या अंत को सीमित नहीं करती। प्रत्येक चरण पूर्ववर्ती से उद्भूत होकर परवर्ती को प्रेरित करता है। कोई चरण संपूर्ण नहीं, कोई तुच्छ नहीं। यही तर्क हमारी क्षेत्रीय और ग्रंथ-आधारित परंपराओं पर भी लागू होता है। शैव मत का ‘उद्गम’ केवल कश्मीर नहीं, न ही केरल केवल शाखा है। ये दोनों व्यापक साझा क्षेत्र में ठोस प्रभावों के प्रतिबिंब हैं। यदि इसे उत्तर-दक्षिण या दक्षिण-उत्तर की एकतरफा धारा मान लें, तो साझेदारी के गहन संबंध से वंचित रह जाएंगे, जिसमें दोनों क्षेत्र समान रूप से सहभागी हैं। ब्रह्मयामल में शिखा से पाद तक नौ कमलों की विस्तृत शृंखला का वर्णन है, जो सूक्ष्म शक्ति तंतु से संनादित है। इसमें कहा गया है:
नाध्यात्मेन विना बाह्यं नाध्यात्मं बाह्यवर्जितम्।
सिद्ध्येज्ज्ञानक्रियाभ्यां तद्द्वितीयं संप्रकाशते।
अर्थात् बाह्य के बिना आंतरिक का अस्तित्व नहीं और न आंतरिक के बिना बाह्य का। ज्ञान और अनुष्ठान के माध्यम से दोनों अपनी पूर्णता में स्वप्रकाशमान रहते हैं।

अलग-अलग दृष्टियों से न तो आंतरिक पूर्ण है, न बाह्य। इस आध्यात्मिक भूमि में कश्मीर और केरल एक-दूसरे के निकट खड़े हैं। दोनों शिव-शक्ति पूजा के शक्तिशाली केंद्र हैं, दोनों में तंत्र परिष्कृत रूप में विकसित हुआ और दोनों ने अद्वैत अंतर्दृष्टि को स्थायी अभिव्यक्ति प्रदान की। इन्हें विमर्श में सम्मिलित करना नक्शे के सुदूर बिंदुओं को जोड़ने का दिखावा नहीं, बल्कि प्राचीन सांस्कृतिक प्रवाह के चिह्नों को पुनःप्रकाशित करना है, जिसे औपनिवेशिक आधुनिकता ने धूमिल कर दिया था। इसे भारतीय दृष्टि से समझना आवश्यक है। भारत भय या बल से नहीं, बल्कि साझा आध्यात्मिक स्मृतियों से एकजुट बंधेगा। अध्ययनकर्ता के रूप में हमारी दोहरी जिम्मेदारी है-अभिनवगुप्त को भारत-विशेषज्ञ के रूप में ग्रहण करना और केरल के तंत्रों को समीक्षात्मक दृष्टि से समझना। हमें प्राचीन चिंतकों द्वारा सौंपी गई परंपरा के अनुयायी नहीं रहना, बल्कि अपने ग्रंथों का आत्मविश्वासपूर्ण अध्ययन करना होगा, जिससे सांस्कृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो, सामूहिक पहचान दृढ़ बने और यह परंपरा जीवंत एवं प्रवाहमान बनी रहे।

ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारे विचार, अभिव्यक्ति और सहयोग के तरीकों में क्रम की लय-चेतना की प्रत्यभिज्ञा धीरे-धीरे पूर्ण स्पष्टता से प्रकट हो। क्रम को केवल अध्ययन-विषय न मानकर जीवनशैली बनाएं, चैतन्य में स्थित होकर अनुभव-अवस्था और अभिव्यक्ति-विविधता दोनों का सम्मान करें। आइए, अंग्रेजी परिभाषाओं से परे जाकर भारत की प्राचीन दीप्तिमान छवि और चैतन्य सभ्यता की गौरवमयी पहचान को विश्व मंच पर दृढ़ता से प्रतिष्ठित करें।
(केंद्रीय विश्वविद्यालय केरल में ‘क्रम और सांस्कृतिक प्रवाह : उत्तर और दक्षिण भारत के बीच कश्मीर शैवदर्शन’ पर आयोजित संगोष्ठी में दिए गए उद्बोधन का दूसरा और अंतिम भाग)

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