स्थापना दिवस पाञ्चजन्य के 79 साल : “देश के लोगों ने मान बिंदुओं पर गर्व करना शुरू किया है”
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पाञ्चजन्य के 79 साल : “देश के लोगों ने मान बिंदुओं पर गर्व करना शुरू किया है”

सांस्कृतिक विमर्श के सत्र में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री  श्री गजेंद्र सिंह शेखावत से पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश:

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 10, 2026, 01:20 pm IST
in साक्षात्कार, दिल्ली, पाञ्चजन्य इवेंट
केंद्रीय मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत

केंद्रीय मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत

सभ्यता—संस्कृति को लेकर भविष्य की योजना क्या है? शिक्षा के साथ ही युवाओं को संस्कृति से जोड़ने के लिए सरकार द्वारा क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
देखिए, भारत सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर में प्रवेश कर चुका है। भारत की संस्कृति का, भारत के सांस्कृतिक मान बिंदुओं का सम्मान पूरे विश्व भर में नए सिरे से प्रतिस्थापित हो रहा है। भारत के सर्वसामान्य व्यक्ति के मन में भी पिछले वर्षों में संस्कृति के प्रति गर्व, गौरव और सम्मान का भाव नए सिरे से प्रतिस्थापित हुआ है। जब भारत की सरकार और सरकार के मुखिया विरासत का सम्मान करते हैं तो निश्चित रूप से देश की सांस्कृतिक मान्यताओं का सम्मान पूरे विश्व में नए सिरे से स्थापित होता है। 2014 में लोगों ने माननीय नरेंद्र मोदी जी को आशीर्वाद देकर देश के प्रधानमंत्री रूप में सेवा करने का अवसर दिया। आजादी के बाद मूर्तियों के लौटने की वैश्विक व्यवस्था 70 के दशक में बनी तब से लेकर मात्र 13 धरोहर भारत वापस आई थीं। लेकिन 2014 के बाद यह आंकड़ा करीब 700 पहुंचा और बहुत जल्दी यह आंकड़ा चार डिजिट में पहुंचने वाला है। जब सरकार और सरकार का मुखिया संस्कृति और संस्कृति के ऐसे प्रतीक चिन्हों की घर-वापसी के लिए, प्रचलित वैश्विक नियमों के आधार पर पूरे मन से प्रयास करते हैं। तब इस तरह की सफलता प्राप्त होती है। और हमने देखा कि दुनिया के अनेक देशों से हम अपनी धरोहरों को वापस लाने में कामयाब हुए हैं।

केंद्रीय मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत से बातचीत करती हुईं तृप्ति श्रीवास्तव

आज देश में विरासत का सम्मान करते हुए विकास हो रहा है। काशी विश्वनाथ कोरिडोर, महाकाल काेरिडोर और फिर संसद भवन। इन सभी जगहों पर विकास के साथ विरासत का सम्मान है। क्या महज यह प्रतीकात्मक है या फिर सांस्कृतिक आत्मबोध? 
आज सरकार के आचरण और व्यवहार में विकास के साथ विरासत का सम्मान दिखता ही है। यह केवल प्रतीक नहीं है। प्रतीकों से या प्रतीकात्मक व्यवहार से देश में चेतना ज्ञापित नहीं होती। आज भारत के लोगों ने, भारत की संस्कृति का सम्मान करना प्रारंभ किया है। जैसा मैंने कहा कि सांस्कृतिक मान बिंदुओं पर गर्व करना प्रारंभ किया। ये अनायास नहीं है। आजादी के बाद भारत की छवि जिस तरह की बनाई गई थी, वह अजीब थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू जी कहते थे कि भारत की संस्कृति को हम दूसरे देशों तक पहुंचाएं। उनके साथ साझा करें। लेकिन उस भाषण का अंश यह भी था कि संस्कृति क्या होती है, यह मेरे मन में स्पष्टता नहीं है। जब देश के मुखिया और देश पर शासन करने वाले लोगों के मन में उहापोह की स्थिति होती है, तब उस देश के नागरिकों से संस्कृति का सम्मान करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन आज देश के प्रधानमंत्री देश की संस्कृति के विषय को लेकर पूरे विश्व भर में जाते हैं। प्रकृति, पर्यावरण से लेकर सांस्कृतिक मान्यताओं के संरक्षण के लिए पुरजोर आवाज में विश्व के सारे मंचों पर बात करते हैं। और केवल बात नहीं करते। वरन देश का सामान्य मानव देश की व्यवस्थाओं में विश्वास करे, उस विश्वास को स्थापित करने का काम करते हैं। आज भारत की छवि बदली है। आज भारत गरीबी रेखा से बाहर निकलता हुआ देश है। सबसे तेजी से आर्थिक रूप से प्रगति करता हुआ देश है। तकनीकी के क्षेत्र में, सामरिक क्षेत्र में, आर्थिक क्षेत्र में सब दृष्टिकोण से जब भारत इस तरह से बदल रहा है, तब निश्चित रूप से भारतवासी भी सम्मान कर रहे हैं और दुनिया भी सम्मान कर रही है। तो ये प्रतीकात्मक कैसे रह सकता है?

इस बार नव वर्ष पर हमने देखा कि युवाओं ने काशी विश्वनाथ, राममंदिर, महाकाल, बिहारी जी में दर्शनों के लिए कतारें लगा दीं। इससे पहले ऐसे मौकों पर इतनी संख्या देखने को नहीं मिलती थी। क्या आप मानते हैं कि आज के युवाओं में अब सांस्कृतिक बोध आ रहा है? 
निश्चित रूप भारत के लोग सदैव से मंदिरों के दर्शन करते आए हैं। धार्मिक पर्यटन हमारे डीएनए में है। हजारों साल से भारत की सभ्यता और संस्कृति के साथ में धार्मिक पर्यटन जुड़ा हुआ है। मैं केवल पहली जनवरी को ध्यान में रखकर बात नहीं कर रहा। आपने उज्जैन के महाकाल लोक की बात की। महाकाल के मंदिर में जाने वाले एक वर्ष के दर्शनार्थी 2012-13 के दशक में 35 लाख के आसपास होते थे। लेकिन पिछले दिसंबर के अंतिम सप्ताह और जनवरी के पहले 10 दिन की बात करें तो यह आंकड़ा 35 लाख को पार कर गया। ऐसे ही अन्य धार्मिक क्षेत्रों के और भी उदाहरण हैं। इसके अनेक कारण हैं। जैसे बुनियादी सुविधाएं होना। दूसरा एक बड़ा वर्ग जब गरीबी रेखा से बाहर आता है और उसकी जेब में खर्च करने को ठीकठाक पैसे होते हैं तो सबसे पहले वह अपने बुजुर्ग माता-पिता को, पत्नी को, परिवार के बच्चों को लेकर ऐसे आस्था के केंद्र पर जाता है। निश्चित रूप से ऐसे रूझान बढ़े हैं। संस्कृति केवल मात्र मंदिर तक ही नहीं है, पर्यटन के अन्य क्षेत्रों में इसी तरह से बदलाव आया है। भारत को पहचानने, भारत को समझने, भारत को देखने के उद्देश्य से जाने वाले लोगों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ी है।

वैश्विक मंच पर भारत सरकार भारत को ‘लोकतंत्र की जननी’ के तौर पर प्रस्तुत करती है। लेकिन ज्यादा से ज्यादा भारतीय युवाओं को कैसे भारतीय विचार से जोड़ा जाए? यह ‘लोकतंत्र की जननी’ पश्चिमी मॉडल से किस तरह से अलग है? 
भारत का मॉडल पश्चिमी मॉडल से एकदम अलग है। पश्चिम ‘लिबरल डेमोक्रेसी’ की बात करता है। वहां व्यक्ति की गणना यूनिट में अकेले की है। भारत की संस्कृति में व्यक्ति कभी यूनिट नहीं है। भारत की संस्कृति में सबसे छोटी इकाई परिवार है। सबसे बड़ी ईकाई भी परिवार है। भारत की संस्कृति एकमात्र ऐसी संस्कृति है, जो विश्व बंधुत्व की बात करती है। वसुधैव कुटुंबकम की बात करती है। इसलिए निश्चित रूप से भारत की मान्यताओं को पश्चिम की डेमोक्रेसी के साथ जोड़कर हम नहीं समझ सकते। लेकिन यह तय है कि भारत सबसे पुराना लोकतांत्रिक राष्ट्र है। साथ ही साथ भारत सबसे बड़ी डेमोक्रेसी भी है। मैं यह कहूंगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के दृष्टिकोण से जिस तरह से चुनाव होते हैं, सत्ता का हस्तांतरण होता है, जब उसको देखते हैं तो पाते हैं कि भारत आज के समय की सबसे समृद्ध डेमोक्रेसी है।

अटल जी की जन्मशताब्दी पर पाञचजन्य द्वारा प्रकाशित संग्रहणीय अंक का विमोचन करते श्री गजेंद्र सिंह शेखावत (मध्य में)।  साथ में हैं (बाएंं से) सर्वश्री आलोक गोस्वामी, तृप्ति श्रीवास्तव, निखिल नंदा, नरेश कुमावत, अरुण कुमार गोयल,  हितेश शंकर, ब्रजबिहारी गुप्ता, एवं विनीत कुमार गर्ग

क्या युवा इस बात को समझ पा रहे हैं? 
देखिए, मुझे लगता है कि जब देश के लोग अपने देश पर, देश की व्यवस्थाओं पर, देश की सांस्कृतिक मान्यताओं पर गर्व करना प्रारंभ कर देते हैं तो अपने आप सब उसके साथ में जुड़ जाते हैं। लेकिन निश्चित रूप से संस्कृति मंत्रालय सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े हुए विषयों को पाठ्यक्रम में किस तरह शामिल किया जाए, उसको लेकर रचना कर रहा है।

कई बार हम जब हम अपनी संस्कृति, धरोहर, विरासत और मान बिंदुओं की बात करते हैं तो एक पक्ष द्वारा कहा जाता है कि अतीत में झांकने की क्या जरूरत है? इस पर आपका क्या मत है?
देखिए, जो भी इस तरह की बात करता है वह पश्चिम के दृष्टिकोण से प्रभावित है। वे भारत के मन को समझते ही नहीं हैं। हम भारत के लोग कहते हैं कि हम सतयुग से त्रेता में आए, त्रेता से द्वापर में आए, द्वापर से कलयुग में आए। हम पीछे घूम करके देखते हैं। तो हमारे पास में एक स्पष्ट लक्ष्य है कि वापस हमको उस मुकाम तक जाना है। हमको उस तरह की व्यवस्था को अर्जित करना है। जबकि पश्चिम के पास इस तरह की दृष्टि नहीं है। वे कहते हैं कि हम बंदर से यात्रा तय करते हुए यहां तक पहुंचे। इसलिए उनके पास पीछे देखकर गर्व करने का कोई विषय ही नहीं है। इसलिए उनकी संस्कृति में जो कुछ नूतन है उसी का अभिनंदन है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। हमें नूतन और पुरातन दोनों के बीच में समावेश करके उस पर गर्व करते हुए नूतन की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ते जाना है। जब हम अतीत को जानेंगे तभी भविष्य की राह तय कर पाएंगे।

Topics: राष्ट्र की अस्मिताविरासत के साथ विकाससांस्कृतिक आत्मबोधधरोहरों की घर-वापसीभारतीय दर्शननूतन और पुरातनवसुधैव कुटुंबकमलोकतंत्र की जननीधार्मिक पर्यटनपाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक पुनर्जागरण
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