बात भारत की: ॐ का रहस्य, ध्यान, विज्ञान और ब्रह्मांड का संगम
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बात भारत की: ॐ का रहस्य, ध्यान, विज्ञान और ब्रह्मांड का संगम

दो युगों के बीच हजारों वर्षों का अंतर है, लेकिन ध्वनि वही है ॐ। यहीं से प्रश्न उठता है क्या प्राचीन ऋषियों ने जिस ध्वनि को ब्रह्मांड का मूल कहा था, उसमें वास्तव में कोई गहरा वैज्ञानिक आधार है?

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Mar 22, 2026, 10:46 pm IST
inभारत
ॐ का रहस्य

ॐ का रहस्य

कल्पना कीजिए हजारों वर्ष पहले हिमालय की एक शांत गुफा में एक ऋषि ध्यान में बैठे हैं। न कोई यंत्र, न कोई प्रयोगशाला। केवल मौन और भीतर उठती एक सूक्ष्म ध्वनि-ॐ…और आज इक्कीसवीं सदी की एक आधुनिक न्यूरोसाइंस प्रयोगशाला। वैज्ञानिक fMRI मशीन पर किसी व्यक्ति के मस्तिष्क का अध्ययन कर रहे हैं, जो आँखें बंद करके “ॐ” का जप कर रहा है। कुछ मिनट बाद स्क्रीन पर दिखाई देता है, मस्तिष्क के तनाव से जुड़े क्षेत्र शांत हो रहे हैं। दो युगों के बीच हजारों वर्षों का अंतर है, लेकिन ध्वनि वही है ॐ। यहीं से प्रश्न उठता है क्या प्राचीन ऋषियों ने जिस ध्वनि को ब्रह्मांड का मूल कहा था, उसमें वास्तव में कोई गहरा वैज्ञानिक आधार है?

ॐ : केवल मंत्र नहीं, अस्तित्व का सूत्र

भारतीय दर्शन में ॐ को प्रणव कहा गया है। माण्डूक्य उपनिषद में स्पष्ट कहा गया है , “ॐ इत्येतदक्षरम् इदं सर्वम्” अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ॐ में ही निहित है। योगदर्शन में पतंजलि भी कहते हैं “तस्य वाचकः प्रणवः” — अर्थात् प्रणव (ॐ) ईश्वर का द्योतक है।

उपनिषदों के अनुसार, ॐ चार अवस्थाओं का प्रतीक है, अ – जाग्रत अवस्था , उ – स्वप्न अवस्था , म – सुषुप्ति अवस्था और मौन (अर्धमात्रा) – तुरीय, जो इन तीनों से परे है। यह तुरीय ही आत्मा और ब्रह्म की एकता का अनुभव है। यह त्रिमूर्ति और त्रिगुण का प्रतीक भी है ,ॐ की ध्वनि तीन अक्षरों से मिलकर बनती है अ – सृजन (ब्रह्मा) , उ – पालन (विष्णु) और म – लय (महेश) . योग परंपरा में शिव को आदियोगी माना गया है, जिनके ध्यान से यह प्रथम नाद प्रकट हुआ। यही कारण है कि ॐ को शिव की श्वास और ब्रह्मांड की स्पंदन-धारा कहा जाता है।

उच्चारण-विज्ञान और साधना – अ उ म तीन बीज-ध्वनियों का समन्वय है, “अ” कंठ से, “उ” ओष्ठों तक प्रवाहित, “म” ओष्ठों को मिलाकर नासिका-अनुनाद। यह कंपन नाभि से सहस्रार तक आरोहण का बोध कराता है। इसकी परंपरागत विधि स्थिर आसन, नेत्र बंद। दीर्घ श्वास, श्वास छोड़ते हुए “आ-ऊ-म्” का दीर्घ उच्चारण। अंत में मौन की अनुभूति। अक्सर तीन बार जप शरीर-मन-आत्मा के सामंजस्य हेतु किया जाता है; “ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः” से शांति का संकल्प पुष्ट होता है।

ध्वनि विज्ञान के अनुसार यह मानव मुख से निकलने वाली लगभग सभी ध्वनियों का आधार है। इसलिए इसे “सम्पूर्ण ध्वनि” भी कहा गया। आधुनिक भौतिकी बताती है कि ब्रह्मांड की हर वस्तु कंपन (vibration) से बनी है। क्वांटम सिद्धांत के अनुसार पदार्थ, ऊर्जा का रूप है और ऊर्जा तरंग के रूप में है , इस दृष्टि से पूरी सृष्टि एक विशाल कंपन प्रणाली है। ऋषियों ने इसी विचार को प्रतीकात्मक रूप में कहा सृष्टि एक ध्वनि से उत्पन्न हुई और ॐ उस ध्वनि का प्रतीक बन गया। आधुनिक विज्ञान ने सृष्टि की उत्पत्ति को “बिग बैंग” सिद्धांत से समझाने का प्रयास किया है। इस सिद्धांत के अनुसार लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले ब्रह्मांड एक अत्यंत शक्तिशाली विस्फोट से उत्पन्न हुआ। यह विस्फोट केवल प्रकाश ही नहीं बल्कि ऊर्जा और कंपन का भी स्रोत था। आज खगोलशास्त्री मानते हैं कि ब्रह्मांड में हर वस्तु तारों से लेकर आकाशगंगाओं तक किसी न किसी प्रकार के कंपन में है। भौतिकी के अनुसार ऊर्जा और कंपन ही पदार्थ का मूल आधार हैं। इसी कारण कुछ विद्वान कहते हैं कि ऋषियों की “नाद” या “ब्रह्मनाद” की अवधारणा और आधुनिक विज्ञान के कंपन सिद्धांत में रोचक समानता दिखाई देती है।

जैन पंथ में “ॐ” (ओंकार)

जैन पंथ में ॐ को “ओंकार” कहा जाता है और यह पांच परमेष्ठियों का प्रतीक माना जाता है। ये पांच परमेष्ठी हैं – अरिहंत , सिद्ध , आचार्य , उपाध्याय और साधु। जैन परंपरा में प्रसिद्ध मंत्र “णमोकार मंत्र” है। नमोकार मंत्र के पाँच अक्षरों के संक्षिप्त रूप से “ॐ” को बनाया गया माना जाता है।उदाहरण अ – अरिहंत , अ – आचार्य , उ – उपाध्याय और म – मुनि (साधु) इसलिए जैन धर्म में “ॐ” का प्रयोग पूजा और ध्यान दोनों में मिलता है।

बौद्ध पंथ में “ॐ”

बौद्ध पंथ में भी ॐ का प्रयोग मंत्रों में मिलता है, विशेषकर तिब्बती और महायान परंपरा में। सबसे प्रसिद्ध मंत्र है “ॐ मणि पद्मे हूँ” यह करुणा के बोधिसत्व अवलोकितेश्वर से जुड़ा हुआ है। यह मंत्र ध्यान और जप में उपयोग किया जाता है।

सिख पंथ में “ओंकार”

सिख पंथ में “ॐ” का रूप इक ओंकार है। यह सिख पंथ का मूल सिद्धांत है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब की शुरुआत ही इन शब्दों से होती है, इसका अर्थ है एक ही परम सत्य ईश्वर है।

आधुनिक शोध क्या बताते हैं?

पिछले दो दशकों में ॐ जप पर कई वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं। 2011 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ योग में प्रकाशित एक अध्ययन (Kalyani et al.) में fMRI के माध्यम से पाया गया कि ॐ जप के दौरान मस्तिष्क के एमिग्डाला (Amygdala) क्षेत्र की सक्रियता कम हो जाती है-जो भय और तनाव से जुड़ा होता है। Fernandes et al. (2018) के अध्ययन के अनुसार नियमित ॐ जप से पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र सक्रिय होता है, जिससे हृदय गति संतुलित होती है , रक्तचाप कम होता है और तनाव घटता है। कई अध्ययनों में पाया गया कि नियमित ॐ जप से कॉर्टिसोल (stress hormone) का स्तर कम हो जाता है।

हार्वर्ड मेडिकल रिसर्च के शोधकर्ता हर्बर्ट बेंसन ने निष्कर्ष निकाला कि ओम के उच्चारण से रक्तचाप कम , हृदय गति कम तथा तनाव हार्मोन कम होता है , उनकी पुस्तक रिलैक्सेशन रिस्पांस है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में किए गए अध्ययनों से संकेत मिलता है कि नियमित मंत्र जप से चिंता (anxiety) में कमी हो सकती है , भावनात्मक संतुलन बेहतर हो सकता है ,मनोदशा (mood) में सकारात्मक सुधार देखा जा सकता है। ॐ जप पर ईईजी (EEG) अध्ययन देवी नागेंद्र एवं स्वामी ने 2004 में किया। उन्होंने पाया कि इससे अल्फा तरंगें बढ़ती हैं जो गहरे विश्राम और शांति से जुड़ी होती हैं , थीटा तरंगें बढ़ती हैं यह ध्यान और रचनात्मकता से संबंधित होती हैं। इससे संकेत मिलता है कि ॐ जप व्यक्ति को ध्यान जैसी अवस्था में पहुँचा सकता है। वैश्विक शोध प्रवृत्ति (2022) “A global research trend in AUM meditation” नामक अध्ययन में पिछले लगभग 50 वर्षों के शोधों का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि ओम ध्यान पर शोध निरंतर बढ़ रहा है और अब यह कई आधुनिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण विषय बन चुका है, जैसे न्यूरोसाइंस (मस्तिष्क विज्ञान) मनोविज्ञान समेकित चिकित्सा (integrative medicine) आदि।

आधुनिक जीवन में ॐ की प्रासंगिकता

आज का मनुष्य तकनीक से घिरा है, पर भीतर से बेचैन है। तनाव, अवसाद, अनिद्रा—ये आधुनिक जीवन की पहचान बनते जा रहे हैं। ऐसे समय में ॐ जप एक सरल उपाय हो सकता है जो दवा नहीं है , खर्च नहीं है और कोई जटिल विधि नहीं है , सिर्फ कुछ मिनट की साधना। एक सार्वभौमिक ध्वनि ॐ केवल हिंदू धर्म का प्रतीक नहीं है। जैन, बौद्ध और सिख परंपराओं में भी इसकी ध्वनि और भाव मिलता है। सिख धर्म में “एक ओंकार” की अवधारणा इसी एकत्व की घोषणा करती है। इसलिए ॐ किसी संप्रदाय की सीमा में बंधा नहीं यह मानव चेतना का प्रतीक है। हालाँकि विज्ञान अभी यह सिद्ध नहीं कर पाया कि सृष्टि की पहली ध्वनि “ॐ” ही थी।

लेकिन विज्ञान यह अवश्य बता रहा है कि यह ध्वनि मन को शांत करती है मस्तिष्क को संतुलित करती है तनाव और चिंता को कम करती है। शायद यही कारण है कि हजारों वर्षों से भारतीय ऋषि इसे “प्रणव” जीवन की मूल ध्वनि कहते आए हैं। ॐ केवल एक मंत्र नहीं, यह अनुभव और विज्ञान के बीच का सेतु है। यह ध्वनि हमें बाहर की दुनिया से भीतर की यात्रा पर ले जाती है और शायद इसी यात्रा में मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।

 

Topics: भारतीय दर्शनबात भारत कीध्यान और विज्ञान
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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