आजकल पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार में एक ही शब्द सुनाई दे रहा है- परिवर्तन। यह परिवर्तन केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत के इस सीमांत प्रदेश में उस ‘सिंडिकेट अपसंस्कृति’ और ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ से मुक्ति का आह्वान है जिसने पिछले डेढ़ दशक से बंगाल के गौरव को धूमिल कर रखा है। 10 अप्रैल को कोलकाता में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा का ‘संकल्प पत्र’ जारी कर स्पष्ट कर दिया कि अब बंगाल में ‘खेला’ नहीं, बल्कि ‘सुशासन’ का सूर्योदय होने वाला है। यह चुनाव कुछ लोगों के लिए भले ही ‘खेला होबे’ हो, पर पश्चिम बंगाल के हिंदुओं के लिए अपने अस्तित्व की लड़ाई है।
इस चुनाव में भाजपा की सबसे बड़ी सामरिक विजय उसके उम्मीदवारों के चयन में छिपी है। जहां सत्तापक्ष ने धनबल, और बाहुबल के प्रति अपनी पुरानी वफादारी दोहराई है, वहीं भाजपा ने ‘मिट्टी की संतानों’ को नेतृत्व सौंपकर राजनीति के व्याकरण को ही बदल दिया है। इस बार बंगाल के चुनावी मैदान में साल्टोरा की चंदना बाउरी जैसी सादगी की प्रतिमूर्ति अकेली नहीं हैं। दक्षिण 24 परगना जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र से सुनीता गायकवाड़ जैसी उम्मीदवार का नाम प्रमुखता से उभर रहा है, जो अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं और जिन्होंने वर्षों तक सुंदरवन के दुर्गम क्षेत्रों में पार्टी की वैचारिक अलख जगाई है। यह प्रयोग केवल टिकट वितरण नहीं, बल्कि उस ‘संभ्रांत राजनीति’ पर सीधा प्रहार है, जिसने दशकों तक बंगाल के गरीब और वंचित वर्ग को केवल वोट बैंक माना।
भाजपा ने राज्य भर में ऐसे दर्जनों चेहरों को आगे किया है, जो सत्ता के गलियारों से कोसों दूर, झोपड़ियों और खेतों में पसीना बहाते रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, तापसी मोंडल (हल्दिया) और शिखा चटर्जी (डाबग्राम-फुलबाड़ी) जैसी महिला उम्मीदवारों ने यह सिद्ध कर दिया है कि चुनाव जीतने के लिए ‘कट-मनी’ के करोड़ों रुपयों की नहीं, बल्कि जनता के साथ अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है।
उत्तर बंगाल के चाय बागानों से निकली कल्पना घोष और नदिया के मतुआ समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली अम्बिका राय जैसे चेहरे भाजपा की उस ‘अंत्योदय’ नीति के प्रमाण हैं, जहां समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को निर्णायक भूमिका दी गई है।

इन उम्मीदवारों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी ईमानदारी और बेदाग छवि है। जब ये साधारण महिलाएं प्रचार के लिए निकलती हैं, तो जनता उन्हें किसी ‘राजनेता’ के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार की बेटी या बहू के रूप में देखती है। यह भावनात्मक जुड़ाव तृणमूल के उस ‘ठेकेदार तंत्र’ के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है जो केवल रसूख और आतंक की भाषा समझता है। भाजपा की यह नीति स्पष्ट संदेश दे रही है कि 2026 का चुनाव महलों में रहने वाले दागियों और झोपड़ियों में रहने वाले देशभक्तों के बीच का धर्मयुद्ध है। बंगाल की गलियों में आज यह चर्चा आम है कि जब सत्ता की चाबी सीधे उन हाथों में जाएगी, जिन्होंने अभावों को झेला है, तभी ‘सोनार बांग्ला’ का स्वप्न वास्तविकता में बदलेगा। कुछ कामरेडों के मुंह से भी सुनने को मिला— ‘‘भाजपा ने इतनी सामान्य पृष्ठभूमि वाली साधारण महिलाओं को टिकट देकर बड़ा जोखिम उठाया है। साधारणतः यह दूसरे दलों में देखने को नहीं मिलता।’’
भाजपा की एक और उम्मीदवार रत्ना देबनाथ की चर्चा बहुत हो रही है। पानीहाटी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहीं रत्ना देबनाथ आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई जूनियर डॉक्टर ‘अभया’ की मां हैं। इस कारण यह महज एक सीट नहीं, बल्कि बंगाल की अंतरात्मा की लड़ाई का केंद्र बन गया है। यहां से ‘अभया की मां’ का चुनावी मैदान में उतरना उस सरकारी व्यवस्था के खिलाफ सीधा संघर्ष है जिसने न्याय के स्वर को दबाने की कोशिश की थी। इस संघर्ष में पश्चिम बंगाल की जनता और पानीहाटी विधानसभा के मतदाता, विशेषकर महिलाएं, भाजपा प्रत्याशी रत्ना देबनाथ के साथ जुड़ कर स्वयं प्रचार के मैदान में उतर चुकी हैं।
जनता के आक्रोश का कारण यह है कि तृणमूल कांग्रेस ने यहां से उसी व्यक्ति के पुत्र को उम्मीदवार बनाया है, जिसका नाम अभया कांड के दागियों और सबूत मिटाने वाले संदिग्धों की सूची में प्रमुखता से रहा है। दूसरी ओर, वामपंथ की ओर से कलतान दासगुप्ता, जो ‘जस्टिस फाॅर आर. जी. कर’ आंदोलन में प्रमुख भूमिका में रहे, अपना भाग्य आजमा रहे हैं। डॉ. नारायण बनर्जी, जो आर.जी. कर आंदोलन के दौरान एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे और जिन्होंने जूनियर डॉक्टरों के संघर्ष को लगातार समर्थन दिया, उन्होंने कलतान दासगुप्ता की उम्मीदवारी को लेकर स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया। डॉ. बनर्जी का स्पष्ट कहना है, ‘‘पानीहाटी सीट पर जहां आर.जी. कर पीड़िता की मां स्वयं न्याय की गुहार लेकर चुनावी मैदान में हैं, वहां किसी भी विपक्षी दल (विशेषकर वामपंथ) को अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करना चाहिए था।’’
पानीहाटी की गलियों में इस बार किसी पार्टी का झंडा नहीं, बल्कि न्याय की मशाल दिखाई दे रही है। यहां की जनता स्वत:स्फूर्त रूप से एक मां के पीछे लामबंद हो चुकी है, जो अपनी बेटी के लिए इंसाफ की लड़ाई को विधानसभा तक ले जाना चाहती है।
इस चुनावी समीकरण ने सत्ता पक्ष के ‘महिला सशक्तिकरण’ के दावों की पोल खोल दी है। सोशल मीडिया और स्थानीय विमर्श में एक मतदाता का बयान खूब चर्चा में है। पानीहाटी के एक कॉलेज शिक्षक और प्रभावशाली नागरिक ने कहा, ‘‘यह चुनाव सड़क, बिजली या पानी का नहीं है। यह चुनाव उस शर्मिंदगी को धोने का है, जो आर.जी. कर कांड ने हर बंगाली के माथे पर दी थी। एक तरफ वह मां है, जिसने अपना सब कुछ खो दिया, और दूसरी तरफ वे लोग हैं जो आरोपियों को संरक्षण देते रहे। हमारा वोट इस बार राजनीति को नहीं, न्याय को जाएगा।’’ जनता का यह स्वतःस्फूर्त समर्थन भाजपा के उस संकल्प को और मजबूती दे रहा है, जिसमें महिलाओं के लिए ‘भयमुक्त बंगाल’ बनाने का वादा किया गया है।
इन साधारण और महिला उम्मीदवारों के प्रति लोगों की राय बहुत ही सकारात्मक है। चुनावी पंडित मान रहे हैं कि इन उम्मीदवारों के कारण तृणमूल की हवा खराब होती जा रही है और ममता बनर्जी के लिए राहें कठिन होती जा रही हैं।

















