TCS Nasik islamic Conversion : कॉरपोरेट भेड़िये और आस्था का आखेट
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कॉरपोरेट भेड़िये और आस्था का आखेट

कंपनी जगत में हिंदू आस्था को ठेस पहुंचाने के मामले बार-बार उठते रहे हैं। इस बार भी ये मामले एक के बाद एक सामने आ रहे हैं, परंतु इनमें अपराध की प्रकृति और आरोपी की पुष्टि के स्तर का अंतर है और कंपनियां विवाद से पल्ला झाड़ती दिख रही हैं।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Apr 19, 2026, 06:45 pm IST
inसम्पादकीय, महाराष्ट्र
आरोपियों को गिरफ्तार कर ले जाती पुलिस

आरोपियों को गिरफ्तार कर ले जाती पुलिस

भारत के चमचमाते कॉरपोरेट दफ्तरों के बारे में एक आरामदेह भ्रम पाला गया है। मान लिया गया कि जहां कांच की इमारतें हैं, अंग्रेजी बोलने वाली टीमें हैं, एचआर नीतियां हैं, वहां मनुष्य की मर्यादा अपने आप सुरक्षित होगी। नासिक के टीसीएस प्रकरण ने इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया है। यहां मामला केवल किसी एक कर्मचारी की असुविधा का नहीं है। यहां आरोप यौन उत्पीड़न के हैं, मजहबी दबाव के हैं, धार्मिक अपमान के हैं, शिकायतों की अनदेखी के हैं, और ऐसे माहौल के हैं जिसमें कुछ लोग अपने पद, निकटता या नेटवर्क का उपयोग करके दूसरे की आत्मा तक पर दबाव बना सकें। यही वह क्षण है जहां समाज को कहना चाहिए कि नौकरी का अनुबंध किसी की अंतरात्मा पर कंपनी या गिरोह का अधिकारपत्र नहीं है। यह आस्था पर आघात करने वाले कॉरपोरेट भेड़ियों के विरुद्ध आवाज उठाने का समय है।

टीसीएस नासिक मामले को इसलिए गंभीरता से लेना होगा क्योंकि यह केवल वायरल पोस्टों का मामला नहीं है। पुलिस जांच चल रही है, नौ शिकायतों की बात सामने आई है, गिरफ्तारियां हुई हैं, आरोपित कर्मचारियों को निलंबित किया गया है, और टाटा समूह ने अपनी मुख्य परिचालन अधिकारी आरती सुब्रमणियन की अगुवाई में जांच बैठाई है। चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने स्वयं इन आरोपों को गंभीर और पीड़ादायक कहा है। बाद में नासिक कार्यालय के कर्मचारियों को सुरक्षा और सुविधा के आधार पर वर्क फ्रॉम होम भी कहा गया। यह सब दिखाता है कि मामला इतना हल्का नहीं कि उसे केवल सोशल मीडिया उबाल कहकर खारिज कर दिया जाए।

इस प्रकरण का सबसे बेचैन करने वाला पक्ष केवल आरोपों की प्रकृति नहीं, बल्कि वह संस्थागत ठंडापन है जो ऐसी शिकायतों के बीच दिखाई देता है। आईटी कर्मचारी संगठन एनआईटीईएस ने इस मामले के बाद पीओएसएच अनुपालन की ऑडिट की मांग की है। नासिक जांच में एचआर की भूमिका भी सवालों के घेरे में आई है, और रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि आंतरिक शिकायत तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। यदि किसी कंपनी में महिला कर्मचारी बार-बार अपमान, दबाव या छेड़छाड़ का अनुभव करे और उसे लगे कि शिकायत करना भी निरर्थक है, तो दोषी केवल आरोपी व्यक्ति नहीं रहते, संस्था भी कटघरे में आ जाती है।

यहीं यह बात बहुत स्पष्ट करनी होगी कि कार्यस्थल पर आस्था का प्रश्न केवल पूजा की स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि विवश न किए जाने के अधिकार का भी है। संयुक्त राष्ट्र की 1981 की घोषणा साफ कहती है कि किसी व्यक्ति को ऐसी coercion का शिकार नहीं बनाया जा सकता जो उसके religion or belief की स्वतंत्रता को क्षति पहुंचाए। भारत का पीओएसएच कानून भी कार्यस्थल पर सुरक्षा, रोकथाम और प्रतितोष की व्यवस्था को बाध्यकारी बनाता है। इसलिए यदि किसी कर्मचारी पर यह दबाव बने कि पदोन्नति, निकटता, समूह में स्वीकृति या मानसिक शांति के लिए उसे अपनी आस्था बदलनी होगी, किसी दूसरे मजहबी व्यवहार में शामिल होना होगा, या अपने प्रतीकों को दबाना होगा, तो वह केवल व्यक्तिगत दुर्व्यवहार नहीं, अधिकार हनन है।

कंपनी जगत में हिंदू आस्था को ठेस पहुंचाने के मामले बार-बार उठते रहे हैं। इस बार भी ये मामले एक के बाद एक सामने आ रहे हैं, परंतु इनमें अपराध की प्रकृति और आरोपी की पुष्टि के स्तर का अंतर है और कंपनियां विवाद से पल्ला झाड़ती दिख रही हैं। टेक महिंद्रा के गोरेगांव कार्यालय को लेकर जो आरोप वायरल हुए, कंपनी ने उन्हें असत्य और आधारहीन बताया और कहा कि ऐसा बोर्ड उसके किसी कार्यालय का नहीं है। लेंसकार्ट में कथित ग्रूमिंग नीति पर विवाद उठा, लेकिन पीयूष बंसल ने कहा कि वह भाषा की चूक थी, कंपनी तिलक और बिंदी जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर रोक नहीं लगाती। इसका मतलब यह नहीं कि हिजाब को बढ़ाने और तिलक को मिटाने जैसे विवादों को हंसी में उड़ा दिया जाए। इसका मतलब केवल इतना है कि टीसीएस जैसा मामला जांच, एफआईआर और गिरफ्तारी के स्तर पर है, जबकि टेक महिंद्रा और लेंसकार्ट के मामले अभी कॉरपोरेट संवेदनशीलता, नीति भाषा और सार्वजनिक भरोसे के संकट के रूप में अधिक दिखते हैं।

फिर भी यह संयोग नहीं कि एक के बाद एक ऐसे विवाद सामने आते ही समाज के भीतर यह प्रश्न उठा कि आखिर कॉरपोरेट भारत अपने हिन्दू कर्मचारियों की आस्था और गरिमा को लेकर कितना सजग है ? लेंसकार्ट विवाद ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या आधुनिकता के नाम पर हिंदू प्रतीकों को अनुपयुक्त और दूसरे प्रतीकों को विविधता कह दिया जाएगा? टेक महिंद्रा विवाद ने यह आशंका जगाई कि क्या कार्यस्थल में मजहबी अनुकूलन और मजहबी पक्षपात की रेखा धुंधली हो रही है? इन प्रश्नों के उत्तर केवल जनसंपर्क वाले बयान नहीं दे सकते। कंपनियों को स्पष्ट, लिखित, सार्वजनिक और समान नीति रखनी होगी।

इस पूरे प्रसंग को हिंदू प्रतिक्रिया बनाम कॉरपोरेट लापरवाही के फ्रेम में देखना ही होगा। वैसे भी आधुनिक संस्थाओं की एक पुरानी बीमारी है। जब भी कोई संस्था अपने भीतर बने छोटे सत्ता समूहों को अनियंत्रित छोड़ देती है, वे पहचान, लिंग, मजहब, जाति, भाषा या निजी कमजोरी को नियंत्रण के औजार में बदल देते हैं। नासिक मामले में रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि पुलिस को एक संगठित पैटर्न की आशंका दिखी और आर्थिक रूप से कमजोर या अकेलेपन से जूझ रहे हिन्दू कर्मचारियों को आसान लक्ष्य माना गया। यह केवल कानूनी केस नहीं, सत्ता और असुरक्षा का क्लासिक शोषण है।

इसीलिए इसे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी समझना चाहिए। अमेरिका की ईईओसी ने ऐसे मामलों में मुकदमे दायर किए हैं जहां कर्मचारियों को कार्यस्थल पर प्रार्थना, धार्मिक गतिविधियों और आध्यात्मिक अनुष्ठानों में जबरन शामिल किया गया और विरोध करने वालों पर कार्रवाई हुई। आधिकारिक अमेरिकी मार्गदर्शन धार्मिक भेदभाव, धार्मिक उत्पीड़न और अनावश्यक coercion को रोजगार कानून के दायरे का गंभीर उल्लंघन मानता है। यानी यह समस्या किसी एक देश या एक मजहब तक सीमित नहीं है। जहां भी आस्था को स्वेच्छा से हटाकर दफ्तर की शक्ति संरचना से जोड़ दिया जाता है, वहां अपमान, मुकदमे, प्रतिरोध और सामाजिक तनाव पैदा होते हैं।

लेकिन भारत के मामले में एक अतिरिक्त सामाजिक आयाम है। एक तो कंपनी जगत में मानव संसाधन विभाग तथा CSR प्रबंधन जैसे पदों पर अपनी आस्था परिवर्तित कर चुके या गैर हिंदू वर्ग का वर्चस्व बढ़ रहा है। इस तरह हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता के मामले भी बढ़ रहे हैं। हालांकि इस दृष्टि से अभी तक कोई शोध हुआ नहीं है, परंतु किया अवश्य जाना चाहिए, यह समय की मांग लगती है। हिंदू समाज ऐतिहासिक रूप से सहिष्णु और विविध प्रथाओं के साथ जीने वाला समाज रहा है। इसी कारण जब उसे बार बार यह आभास होता है कि उसकी आस्था को ही सबसे आसान उपहास वस्तु समझ लिया गया है, उसके प्रतीकों को ही सबसे पहले हटाने योग्य माना जाता है, या उसकी सरलता को ही दबाव डालने का अवसर माना जाता है, तब भीतर आक्रोश जमा होता है। यह आक्रोश केवल भावनात्मक नहीं होता, यह सामाजिक भरोसे को खाता है। अगर कंपनियां समय रहते इसे नहीं समझेंगी तो वे केवल कानूनी संकट नहीं, अपने ही कर्मचारियों और ग्राहकों के नैतिक अविश्वास का सामना करेंगी।

यहां समाज के लिए भी एक चेतावनी है। आक्रोश सही समय पर सही स्तर पर उठाया जाए तो यह परिणामकारी हो सकता है। लंबी और लगातार चुप्पी भेड़ियों का दुस्साहस ही बढ़ाती है। यदि कोई आरोपी है तो उसे कानून के सामने कठोर दंड मिले। यदि एचआर या प्रबंधन ने शिकायत दबाई है तो उनकी जवाबदेही तय हो। यदि किसी कंपनी की नीति भाषा पक्षपाती है तो उसे सार्वजनिक रूप से सुधारा जाए। यह आवश्यक है । कठोरता चाहिए, विधिसम्मत कार्रवाई भी चाहिये; रोष चाहिए और इसके साथ सम्भावित या प्रमाणाधारित चेतावनियों को सुनने वाला संवेदनशील तंत्र भी चाहिए। कंपनी जगत में संस्थागत सुधार की दिशा में यह आवश्यक अपेक्षा है।

अब कॉरपोरेट जगत के सामने विकल्प सीधा है। या तो वह इस पूरे प्रसंग को जनसंपर्क संकट मानकर कुछ वक्तव्य जारी करे और अगले विवाद तक प्रतीक्षा करे। या फिर वह इसे ‘पानी नाक से ऊपर’ जाने का संकेत माने और अपने भीतर वास्तविक अपेक्षित बदलाव करे। हर बड़े संस्थान को अपने पीओएसएच (POSH) तंत्र, धार्मिक भेदभाव विरोधी नीति, शिकायत निवारण, एचआर जवाबदेही, डिजिटल साक्ष्य संरक्षण, और कमजोर कर्मचारियों की सुरक्षा व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा करनी चाहिए। नासकॉम ने भी उत्पीड़न पर शून्य सहिष्णुता की बात दोहराई है। अब उद्योग को यह सिद्ध करना होगा कि यह केवल बयान नहीं, व्यवस्था है।

अंत में बात बहुत मानवीय है। किसी लड़की की नौकरी केवल उसकी तनख्वाह नहीं होती। वह उसका स्वाभिमान होती है, घर की आशा होती है, उसका भविष्य होता है। यदि दफ्तर के भीतर कोई उसे छूकर, डराकर, बहलाकर, मजहबी दबाव डालकर, या शिकायत को कुचलकर यह संदेश दे कि तुम्हारी देह, तुम्हारी आस्था और तुम्हारी चुप्पी सब खरीदी जा सकती है, तो यह केवल अपराध नहीं, सभ्यता पर धब्बा है। कॉरपोरेट भारत को समझना होगा कि एक्सेल शीटें और नैतिकता अलग-अलग चीजें नहीं हैं। जिस दिन कर्मचारी को लगेगा कि कंपनी उसकी सुरक्षा से पहले अपनी छवि बचाती है, उसी दिन कंपनी भीतर से खोखली हो जाएगी। टीसीएस प्रकरण, टेक महिंद्रा विवाद और लेंसकार्ट बहस तीन अलग स्तरों के संकेत हैं, पर संदेश एक है। आस्था के साथ खिलवाड़ बंद होना चाहिए, अभी और यहीं।

X@hiteshshankar

Topics: टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेजपाञ्चजन्य विशेषधार्मिक भेदभावटीसीएस नासिक कन्वर्जनTCS Nasikटीसीएस नासिक कॉर्पोरेट जिहादकॉरपोरेट शोषणआस्था पर आघातमजहबी दबावTCS नासिक प्रकरणयौन उत्पीड़नपीओएसएच
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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