भगवान परशुराम जयंती : महानद ब्रह्मपुत्र को धरती पर लाए, केरल, कन्याकुमारी, रामेश्वरम और गोमांतक-गोवा के संस्थापक
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भगवान परशुराम जयंती : महानद ब्रह्मपुत्र को धरती पर लाए, केरल, कन्याकुमारी, रामेश्वरम और गोमांतक-गोवा के संस्थापक

अक्षय तृतीया तिथि को धरा पर भगवान परशुराम का अवतरण हुआ। भगवान परशुराम की मान्यता थी कि स्वस्थ समाज की संरचना के लिए ब्रह्मशक्ति और शस्त्र शक्ति दोनों का समन्वय आवश्यक है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Apr 18, 2026, 11:50 pm IST
inधर्म-संस्कृति
भगवान परशुराम (चित्र एआई द्वारा निर्मित )

भगवान परशुराम (चित्र एआई द्वारा निर्मित )

अक्षय तृतीया तिथि को धरा पर भगवान परशुराम का अवतरण हुआ। भगवान परशुराम की मान्यता थी कि स्वस्थ समाज की संरचना के लिए ब्रह्मशक्ति और शस्त्र शक्ति दोनों का समन्वय आवश्यक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार सनातन हिन्दू धर्म के अष्ट चिरंजीवियों (अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम तथा ऋषि मार्कण्डेय) में वह शामिल हैं और भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं।

भृगुकुल शिरोमणि परशुराम जी के पिता ऋषि जमदग्नि व क्षत्रिय कुल की राजकन्या माता रेणुका दोनों ही विलक्षण गुणों से सम्पन्न थे। जमदग्नि ऋषि को आग पर नियंत्रण पाने का और माता रेणुका को पानी पर नियंत्रण पाने का वरदान प्राप्त था। ऋषि दम्पति के ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’ के फलस्वरूप पांचवीं संतान के रूप में उनका जन्म हुआ।

महादेव का अमोघ परशु धारण कर बने “परशुराम”

बचपन का नाम राम था। बहुत कम आयु में उन्होंने पिता से धनुर्विद्या सीख ली। कलान्तर में महादेव से परशु प्राप्त होने के बाद परशुराम कहलाए। कथानक है कि महादेव शिव के प्रति विशेष श्रद्धा भाव के चलते एक बार बालक राम भगवान शंकर की आराधना करने कैलास जा पहुंचे। वहां देवाधिदेव महादेव ने उनकी भक्ति और शक्ति की परीक्षा लेकर उन्हें उपहार स्वरूप अनेक अस्त्र-शस्त्रों सहित दिव्य परशु भी प्रदान किया। उस अमोघ परशु धारण करने के बाद बालक राम “परशुराम” ने नाम से विख्यात हो गये।

भगवान परशुराम की दिव्य उपलब्धियां

परशुराम जी का समूचा जीवन दिव्य उपलब्धियों से भरा हुआ है। वे न सिर्फ ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में पारंगत थे अपितु योग, वेद और नीति तथा तंत्र कर्म में भी निष्णात थे। दक्षिण भारत की लोककथाओं में उल्लेख मिलता है कि परशुराम जी पशु-पक्षियों की भाषा व उनके व्यवहार समझते थे। खूंखार वन्य जीव उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे। अपने समय के शस्त्रविद्या के महानतम गुरु के रूप में विख्यात भगवान परशुराम ने महाभारत युग में भीष्म पितामाह, द्रोणाचार्य व कर्ण जैसे कई महारथियों को शस्त्र विद्या देकर महान योद्धा बनाया था। शस्त्र विद्या के इस महारथी को केरल की पुरातन मार्शल आर्ट ‘कलारीपट्टू’ तथा ‘वदक्कन कलरी’ का संस्थापक आचार्य माना जाता है। यही नहीं, हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और शुभ मानी जाने वाली कांवड़ यात्रा का शुभारंभ परशुराम जी ने ही सबसे पहले शिवजी को कांवड़ से जल चढ़ाकर किया था। हिमालय में फूलों की घाटी मुनस्यारी को बसाने का श्रेय भी परशुराम जी को ही जाता है।

ब्रह्मपुत्र महानद को धरती पर लाये थे भगवान परशुराम

जिस प्रकार देवनदी गंगा को धरती पर लाने का श्रेय राजा भगीरथ को जाता है, उसी प्रकार पहले ब्रह्मकुंड (परशुराम कुंड) से और फिर लौहकुंड (प्रभु कुठार) पर हिमालय को काटकर ब्रह्मपुत्र महानद को धरती पर लाने का श्रेय परशुराम जी को जाता है। पिता जमदग्नि की आज्ञा से वे गंगा की सहयोगी नदी रामगंगा को भी धरती पर लाये थे।

केरल, कन्याकुमारी, रामेश्वरम व कोंकण- गोमांतक (गोवा) के संस्थापक

पौराणिक उद्धरणों के अनुसार केरल, कन्याकुमारी व रामेश्वरम की संस्थापना भगवान परशुराम ने ही की थी। जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की थी, वह स्थान आज तिरुवनंतपुरम के नाम से प्रसिद्ध है। केरल में आज भी पुरोहित वर्ग संकल्प मंत्र में परशुराम क्षेत्र का उच्चारण कर उक्त समूचे क्षेत्र को परशुराम की धरती की मान्यता देता है। गोमांतक (गोवा) को भी परशुराम जी का कार्य क्षेत्र कहा जाता है। ब्राह्मण की परंपरा के अनुसार परशुराम जी बिहार के तिरहुत से दस परिवारों को लेकर आए और उन्हें आधुनिक गोवा के नाम से मशहूर गोकर्ण में बसाया था।

सीता स्वयंवर में शिव धनुष टूटने पर क्रोध और प्रभु श्रीराम को समर्पण

विदेहराज जनक की राजसभा में सीता स्वयंवर के दौरान श्रीराम द्वारा शिवधनुष तोड़ने पर परशुरामजी का क्रोध व भगवान राम के अनुज लक्ष्मण जी से उनका संवाद तो सनातनधर्मियों में सर्वविदित है; मगर उनकी महानता इस बात में है कि ज्यों ही उन्हें अवतारी श्रीराम के शौर्य, पराक्रम व धर्मनिष्ठा का बोध हुआ और उनको योग्य क्षत्रिय कुलभूषण प्राप्त हो गया तो उन्होंने स्वत: दिव्य परशु सहित अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र राम के हाथ में सौंप दिये और महेन्द्र पर्वत पर तप करने लिए चले गये।

परशुराम जी ने डाली थी ‘अंत्योदय’ की बुनियाद

“अंत्योदय” की बुनियाद भी परशुराम जी ने ही डाली थी। समाज सुधार और समाज के शोषित-पीड़ित वर्ग को कृषिकर्म से जोड़कर उन्हें स्वावलंबन का पाठ पढ़ाने में भी महती भूमिका रही है। पितामह महर्षि ऋचीक के कहने पर उन्होंने केरल, कोंकण मालाबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी। परशुराम ने इस क्षेत्र में अपने परशु का उपयोग रचनात्मक काम के लिए किया। उन्होंने समाज के वंचित लोगों को न सिर्फ वन काटने में लगाया और उपजाऊ भूमि तैयार कर धान की पैदावार शुरू करायी थी। यही नहीं परशुराम जी ने दरिद्र नारायणों को शिक्षित व दीक्षित कर उन्हें यज्ञोपवीत संस्कार से जोड़कर ब्राह्मण बनाया तथा दुराचारी व आचरणहीन ब्राह्मणों का सामाजिक बहिष्कार भी किया। अक्षय तृतीया के दिन उन्होंने एक साथ हजारों युवक-युवतियों को परिणय सूत्र में बांधा था। इसीलिए यह तिथि विवाह का अत्यंत शुभ मुहूर्त मानी जाती है।

Topics: भगवान परशुरामब्रह्मपुत्र नदीपरशुराम जयंतीपाञ्चजन्य विशेषगोवा के संस्थापकसप्त कोंकणगोमांतककोंकण
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