यह कोई दुकान नहीं है : सबरीमाला विवाद पर TDB की तीखी दलील, SC ने कहा- 'समाज सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते'
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यह कोई दुकान नहीं है : सबरीमाला विवाद पर TDB की तीखी दलील, SC ने कहा- ‘समाज सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते’

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज। जजों ने माना कि सुधार और मान्यताओं के बीच एक 'बैलेंस' होना चाहिए। आस्था बनाम अधिकार की बहस में उठे कई बड़े संवैधानिक सवाल

Written byShivam DixitShivam Dixit
Apr 15, 2026, 09:27 pm IST
inभारत, केरल, दिल्ली

नई दिल्ली । केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी जंग तेज हो गई है। बुधवार को सुनवाई के चौथे दिन, मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने अपनी दलीलें पेश करते हुए स्पष्ट किया कि यह मामला किसी रेस्टोरेंट या साधारण दुकान का नहीं है, बल्कि एक ‘आजन्म ब्रह्मचारी’ देवता की मर्यादा और करोड़ों भक्तों की आस्था से जुड़ा है।

जानिए सबरीमाला केस सुनवाई के 5 बड़े अपडेट्स

बता दें कि वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के सामने मंदिर का पक्ष रखा। वहीं सुनवाई के दौरान कई ऐसे बिंदु सामने आए जो धर्म और संविधान के बीच के बारीक संतुलन को दर्शाते हैं-

1. जनहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग पर चिंता

अधिवक्ता सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान  दलील दी कि धार्मिक परंपराओं में ‘बाहरी हस्तक्षेप’ रोकने के लिए PIL से बचना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका उस धर्म से जुड़ाव नहीं है, सदियों पुरानी परंपराओं को कोर्ट में चुनौती दे सकता है..?

2. धर्म की ‘मजबूती’ और समाज सुधार

वहीं सर्वोच्च अदालत ने भी सुनवाई के दौरान एक बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कहा कि सामाजिक सुधार आवश्यक है, लेकिन इसके नाम पर किसी धर्म के मूल स्वरूप को खत्म या खोखला नहीं किया जा सकता। साथ ही जजों ने माना कि सुधार और मान्यताओं के बीच एक ‘बैलेंस’ होना चाहिए।

3. अनुच्छेद 25 vs अनुच्छेद 26 (संवैधानिक टकराव)

वहीं कोर्ट में इस बात पर बहस हुई कि क्या किसी धार्मिक संस्था का सामूहिक अधिकार (अनुच्छेद 26), किसी व्यक्ति के निजी अधिकार (अनुच्छेद 25) से बड़ा हो सकता है। जबकि TDB का मानना है कि मंदिर को अपने नियम तय करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए।

4. प्रथाओं को कौन तय करेगा.?

अधिवक्ता सिंघवी ने सर्वोच्च अदालत में तर्क दिया कि कौन सी प्रथा धर्म का हिस्सा है, यह तय करने का हक धार्मिक समुदाय को होना चाहिए, न कि कोर्ट को। जिसके बाद इस तर्क पर जजों ने भी न्यायिक सक्रियता की सीमाओं पर चर्चा की।

5. सबरीमाला में महिला प्रवेश और देव स्वरूप

वहीं TDB ने अदालत को जानकारी देते हुए कहा कि भारत में भगवान अय्यप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं जहाँ पर महिलाएँ जा सकती हैं। लेकिन सबरीमाला की विशिष्टता वहां के देवता का ‘ब्रह्मचारी स्वरूप’ है, और 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश इसी स्वरूप के विपरीत माना जाता है।

जानिए सबरीमाला विवाद का अब तक का सफर

1991 : केरल हाईकोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को जायज ठहराया था।

2018 : सुप्रीम कोर्ट ने इस बैन को भेदभावपूर्ण बताते हुए हटा दिया था।

वर्तमान स्थिति : 2018 के फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिसके बाद 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर अब बड़ी पीठ सुनवाई कर रही है।

अदालत की अहम टिप्पणी :

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस सुनवाई के दौरान अदालत ने एक अहम टिपण्णी करते हुए कहा- “करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है।”

अब आगे क्या..?

7 अप्रैल से शुरू हुई इस सुनवाई में केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि कई देवी मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश वर्जित है, इसलिए परंपराओं का सम्मान होना चाहिए। फिलहाल, इस मामले पर बहस जारी है और सबकी नजरें आने वाले फैसले पर टिकी हैं।

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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