नारी शक्ति वंदन अधिनियम : 'वंदना' से 'नेतृत्व' की ओर बढ़ता भारत
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नारी शक्ति वंदन अधिनियम : ‘वंदना’ से ‘नेतृत्व’ की ओर बढ़ता भारत

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के जरिए संसद और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण लागू होने जा रहा है। जानिए कैसे बदलेगा भारत का राजनीतिक भविष्य...

Written byकैलाश विजयवर्गीयकैलाश विजयवर्गीय — edited by Shivam Dixit
Apr 15, 2026, 08:45 pm IST
inभारत, मत अभिमत

भारतीय संस्कृति के शाश्वत उद्घोष “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता” ने सदैव स्त्री को शक्ति और पूजनीयता के केंद्र में रखा है। हमारे वैदिक और सनातन वांग्मय में स्त्री-पुरुष की समानता केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति थी। देवाधिदेव महादेव का ‘अर्धनारीश्वर’ स्वरूप इस बात का दिव्य प्रमाण है कि सृष्टि का अस्तित्व पुरुष और प्रकृति के समान संतुलन पर टिका है। किंतु, कालचक्र के क्रूर प्रहारों, सामंती जकड़न और विदेशी आक्रमणों ने इस ‘नारी वंदना’ को धीरे-धीरे ‘नारी बंधन’ में परिवर्तित कर दिया। सदियों तक भारतीय नारी संस्कारों की कटौती, सामाजिक प्रतिबंधों और राजनीतिक हाशिए पर रहने को विवश रही।

28 सितंबर 2023 को जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर हस्ताक्षर किए, तो वह केवल एक कानून नहीं बना, बल्कि वह सदियों के अन्याय के परिमार्जन का एक वैधानिक संकल्प बन गया।

इतिहास में महिलाओं की स्थिति और सामाजिक सुधार

प्राचीन भारत में वाकाटक वंश की रानी प्रभावती गुप्ता या सातवाहन वंश की राजमाताओं का शासन और 18 वीं शताब्दी में इंदौर की देवी अहिल्याबाई के उत्कृष्ट प्रशासन के उदाहरण हमें गौरवान्वित तो करते हैं, लेकिन मध्यकाल तक आते-आते सामान्य महिलाओं के लिए शिक्षा और अधिकार कल्पित कथाओं जैसे हो गए थे। बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा और दहेज जैसी कुरीतियों ने महिलाओं को बेड़ियों में जकड़ दिया था।

सामाजिक पुनर्जागरण के काल में राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे मनीषियों ने इस अंधकार को चीरने का प्रयास किया। लेकिन महिलाओं के राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की सबसे ठोस नींव डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘हिंदू कोड बिल’ के माध्यम से रखी। उन्होंने स्पष्ट रूप से माना था कि बिना कानूनी अधिकारों के सामाजिक सुधार स्थायी नहीं हो सकते। हालांकि, हिंदू कोड बिल से उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार तो मिले, लेकिन राजनीतिक सत्ता के गलियारों में महिलाओं की उपस्थिति जनसंख्या के अनुपात में नगण्य बनी रही।

महिला आरक्षण का लंबा राजनीतिक संघर्ष

विधायी निकायों में 33 प्रतिशत आरक्षण का सफर भारतीय लोकतंत्र के सबसे लंबे संघर्षों में से एक है। यह विधेयक लगभग 27 वर्षों तक राजनीतिक असहमति, पितृसत्तात्मक विरोध और हंगामों की भेंट चढ़ता रहा। अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने 1998 से 2003 के बीच इसे कई बार सदन के पटल पर रखा, किंतु आम सहमति के अभाव में सफलता नहीं मिली।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 का महत्व

महिलाओं के उचित वैधानिक नेतृत्व और राजनीतिक अधिकारों के लिए वर्तमान मोदी सरकार प्रतिबद्ध है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ को नए संसद भवन में पेश किया जाना इस बात का प्रतीक था कि ‘नए भारत’ की नींव महिला नेतृत्व के साथ रखी जाएगी। लोकसभा में 454 मतों के भारी बहुमत और राज्यसभा में सर्वसम्मति से इसका पारित होना यह दर्शाता है कि अब भारत की राजनीतिक चेतना इस मुद्दे पर एकमत हो चुकी है।

लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े

आजादी के बाद से लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी का ग्राफ बेहद धीमी गति से बढ़ा है। 1952 की पहली लोकसभा में केवल 4.4% महिलाएँ थीं। सात दशकों के बाद 2019 में यह आंकड़ा 14.4% (78 महिलाएँ) तक पहुँचा, जो 2024 में पुनः घटकर 13.6% रह गया। यह गिरावट चिंताजनक है और इस सत्य को उजागर करती है कि बिना वैधानिक अनिवार्यताओं के, राजनीतिक दल महिलाओं को पर्याप्त टिकट देने में संकोच करते हैं।

महिलाओं की राजनीति में भागीदारी की चुनौतियां

पितृसत्तात्मक ढांचा, संसाधनों की कमी और चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक भारी वित्त वे मुख्य कारण हैं जिन्होंने महिलाओं को सक्रिय राजनीति से दूर रखा। जब तक नीति निर्धारण की मेज पर महिलाओं की संख्या निर्णायक नहीं होगी, तब तक देश की आधी आबादी से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशीलता का अभाव बना रहेगा।

अधिनियम के प्रावधान और विशेषताएं

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है। इसमें ‘कोटे के भीतर कोटे’ का प्रावधान कर अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की गई है। रोटेशन प्रणाली यह सुनिश्चित करेगी कि नेतृत्व का अवसर व्यापक स्तर पर फैले।

लागू करने की प्रक्रिया और विशेष सत्र

15 वर्षों की प्रारंभिक अवधि और संसद द्वारा इसे बढ़ाने की शक्ति इसे एक लचीला और प्रगतिशील कानून बनाती है। वर्ष 2029 के आम चुनावों से पहले इस अधिनियम को लागू करना एक चुनौती मानी जा रहा था। किंतु हाल ही में केंद्र सरकार के द्वारा 16 से 18 अप्रैल 2026 में एक विशेष सत्र का आयोजन किया जा रहा है जिसका उद्देश्य “नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023” को पूरी तरह से लागू करना है। इस विशेष सत्र में संविधान संशोधन के माध्यम से 2029 के चुनावों से पहले लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित किया जा सकेगा।

नेतृत्व और नीति निर्माण में परिवर्तन

यह अधिनियम केवल सीटों का आरक्षण नहीं है, बल्कि यह शासन की शैली में बदलाव का अग्रदूत है। पंचायतों और नगरपालिकाओं में पहले से मौजूद महिला आरक्षण ने ‘सरपंच पति’ जैसी चुनौतियों के बावजूद लाखों महिलाओं को नेतृत्व सिखाया है। अब यह नेतृत्व राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर नीति निर्धारण करेगा। जब 180 से अधिक महिलाएँ लोकसभा में बैठेंगी, तो बजट से लेकर रक्षा नीतियों तक और शिक्षा से लेकर विदेश नीति तक, हर क्षेत्र में एक मानवीय और संतुलित दृष्टिकोण देखने को मिलेगा।

अंबेडकर के सपने की दिशा में कदम

यह अधिनियम डॉ. अंबेडकर के उस सपने को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जहाँ वे महिलाओं की प्रगति से ही किसी समाज की प्रगति को मापते थे। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘पंच प्रण’—विशेष रूप से ‘गुलामी की मानसिकता से मुक्ति’ और ‘विरासत पर गर्व’—को चरितार्थ करता है।

नारी युग की ओर बढ़ता भारत

नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत के ‘अमृत काल’ का वह अमृत है जो लोकतंत्र को और अधिक समावेशी और प्राणवान बनाएगा। यह कानून उन तमाम महिलाओं के संघर्षों को समर्पित है, जिन्होंने घर की चौखट से लेकर संसद की सीढ़ियों तक संघर्ष किया है। अब समय केवल ‘नारी वंदना’ करने का नहीं, बल्कि उन्हें ‘विधायी नेतृत्व’ सौंपने का है। यह अधिनियम सुनिश्चित करेगा कि भविष्य का भारत केवल पुरुषों द्वारा निर्मित नहीं होगा, बल्कि उसमें उस ‘शक्ति’ का समान साझा होगा, जिसके बिना कोई भी राष्ट्र पूर्ण नहीं हो सकता।

आगामी दशक में नारी नेतृत्व का उदय

आगामी दशक भारत की राजनीति में ‘नारी युग’ के उदय का साक्षी होगा, जहाँ महिलाएँ अब याचक नहीं, बल्कि निर्णायक की भूमिका में होंगी। यही विकसित भारत की वास्तविक पहचान होगी।

Topics: महिला सशक्तिकरणभारतीय राजनीतिनारी शक्ति वंदन अधिनियमwomen empowerment politics indiaअमृत कालनरेंद्र मोदी
कैलाश विजयवर्गीय
कैलाश विजयवर्गीय
कैबिनेट मंत्री, म प्र सरकार [Read more]
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