लोकतंत्र में सत्ता का ताला वोट-संख्या की चाबी से खुलता है। इसीलिए कुर्सी की दौड़ लगाती राजनीति जनता को खंड-खंड देखने लगती है ताकि लोगों को जात-पात, धर्म-संप्रदाय, भाषाई-क्षेत्रीय पहचान के आधार पर टुकड़ों में बांटकर उनके विशिष्ट हितों का औजार की तरह इस्तेमाल करके अपना उल्लू सीधा किया जा सके।
लेकिन ऐसी सियासत से विभाजक रेखाएं गहराती हैं और देश-समाज के लिए खतरे पैदा हो जाते हैं। सीमा पार से आए घुसपैठियों को ‘वोटबैंक’ बना देना इसका सबसे खतरनाक उदाहरण है।

















