Sabarimala Case में नया मोड़! केंद्र ने 2018 फैसले पर उठाए सवाल
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Sabarimala Case में नया मोड़! केंद्र ने 2018 फैसले पर उठाए सवाल

सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने 2018 के फैसले पर सवाल उठाए। धार्मिक परंपरा, आस्था और संविधान की व्याख्या को लेकर बहस तेज।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Apr 9, 2026, 07:26 pm IST
inभारत, दिल्ली
Supreme court judge oath

सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली (हि.स.) । सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा है कि 2018 का फैसला महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की धारणा पर आधारित था। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय बेंच के समक्ष ये दलीलें रखी। नौ सदस्यीय संविधान बेंच के समक्ष इस मामले की सुनवाई का आज तीसरा दिन था।

धार्मिक परंपराओं और आस्थाओं का मामला

मेहता ने कहा कि ये मामला किसी एक लिंग के पक्ष का विपक्ष का नहीं है बल्कि ये धार्मिक परंपराओं और आस्थाओं से जुड़ा हुआ है। मेहता ने कहा कि देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां पुरुषों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध है या उन्हें विशेष परंपराओं का पालन करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि केरल के कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर में पुरुष पारंपरिक रुप से महिलाओं की तरह साड़ी पहनकर पूजा करते हैं। ये परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मेहता ने कहा कि हर धार्मिक स्थल की अपनी अलग परंपराएं होती हैं, जिन्हें एक ही नजरिये से नहीं देखा जा सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पर चर्चा

सुनवाई के दौरान एएसजी केएम नटराज ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 25 के तहत धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए तीन स्तरीय तंत्र मौजूद हैं। पहला अनुच्छेद 25(1) के तहत व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता, दूसरा अनुच्छेद 25(2) के तहत राज्य का नियामक अधिकार और तीसरा अनुच्छेद 26 के तहत संस्थागत अधिकार।

न्यायालय के सवाल और जवाब

नटराज ने कहा कि ये सभी प्रावधान आपस में जुड़े हुए हैं और किसी को भी दूसरे से कमतर नहीं माना जा सकता है। तब जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अनुच्छेद 25(2) के पहले भाग पर सवाल उठाते हुए पूछा कि ‘इस अनुच्छेद में कुछ भी मौजूदा कानूनों को प्रभावित नहीं करेगा’ का क्या मतलब है। तब नटराज ने कहा कि इसका मतलब पूर्व संवैधानिक कानूनों से है। अगर ये कानून मौलिक अधिकारों के असंगत नहीं हैं, तो उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और नैतिकता पर विचार

उच्चतम न्यायालय ने 8 अप्रैल को कहा था कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है यह तय करने का अधिकार उसके पास है। उच्चतम न्यायालय ने ये बातें तब कही थी जब केंद्र सरकार ने दलील दी कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकती क्योंकि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। तब जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि सार्वजनिक नैतिकता स्थिर नहीं है। जो 1950 के दशक में अनैतिक या अश्लील माना जाता था वह आज वैसा नहीं है। जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि क्या हम 50 के दशक के मानकों को संकीर्ण मानसिकता कह सकते हैं। उन्होंने कहा था कि समाज के साथ नैतिकता बदलती रहती है, इसलिए इसे केवल एक पुराने नजरिये से नहीं देखा जा सकता है।

संविधान बेंच की संरचना

उच्चतम न्यायालय की 9 जजों की संविधान बेंच ने इस मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरु की थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का उल्लेख

उच्चतम न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के साथ काफी समय से भेदभाव होता रहा है। महिला पुरुष से कमतर नहीं है। एक तरफ हम महिलाओं को देवी स्वरुप मानते हैं दूसरी तरफ हम उनसे भेदभाव करते हैं। कोर्ट ने कहा था कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल वजहों से महिलाओं के धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया जा सकता है।

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