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होम विश्लेषण

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति और गांधी परिवार का संबंध

वायनाड सीट पर राहुल गांधी और अब प्रियंका वाड्रा की जीत में आईयूएमएल का अहम रोल। मुस्लिम वोट बैंक (एक तिहाई) के कारण कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी का विश्लेषण।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Apr 7, 2026, 02:20 pm IST
inविश्लेषण, केरल
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

केरल विधानसभा चुनाव में लगातार दो बार विपक्ष में रहने के बाद कांग्रेस पार्टी अपने गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बैनर तले चुनावी मैदान में है। इस गठबंधन में कांग्रेस पार्टी के बाद सबसे बड़ा घटक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) है। ये दोनों दल 1979 से गठबंधन में हैं। इससे पूर्व में भी ये दोनों दल केरल में एक दूसरे का समय समय पर सहयोग कर चुके थे। यह देश के सबसे पुराने गठबंधनों में एक है।

मुस्लिम लीग का दागदार इतिहास

आईयूएमएल का इतिहास काफी दागदार रहा है। इस पार्टी का जन्म मोहम्मद अली जिन्ना आल इंडिया मुस्लिम लीग से हुआ है। दूसरे शब्दों में इसे स्वतंत्र भारत में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का रूपांतरण भी कह सकते हैं। इस पार्टी का कार्यकलाप काफी विवादास्पद होने के बावजूद भी पूरे देश में धर्मनिरपेक्षता का दुहाई देने वाली कांग्रेस पार्टी आईयूएमएल के सामने विवश होकर अपने राजनीतिक लाभ के लिए घुटने टेक देती है।

2019 के बाद आईयूएमएल का महत्व ना सिर्फ कांग्रेस पार्टी के लिए बल्कि गाँधी परिवार के लिए भी काफी बढ़ गया है। दूसरे शब्दों में गांधी परिवार वर्तमान में पूर्णतः आईयूएमएल पर अपनी राजनीतिक वजूद के लिए निर्भर हो गई है। 2019 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अमेठी के अलावा केरल के वायनाड लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। राहुल गांधी द्वारा वायनाड सीट का चयन पूर्णतः आईयूएमएल के कारण किया गया था। वायनाड लोकसभा सीट पर लगभग एक तिहाई मुस्लिम मतदाता हैं, जो आईयूएमएल के अनुसार ही मतदान करते है। 2024 में राहुल गाँधी द्वारा वायनाड और राय बरेली दोनों सीट जीतने के बाद वायनाड सीट को खाली करने के बाद प्रियंका वढेरा द्वारा इस सीट से चुनाव लड़ना गाँधी परिवार को और भी आईयूएमएल पर आश्रित बना दिया है। अब गाँधी परिवार के पास आईयूएमएल के दिशा निर्देशों का पालन करने के अलावा कोई भी दूसरा उपाय नहीं है।

सांप्रदायिक राजनीति से भरा है आईयूएमएल

आईयूएमएल की सांप्रदायिक राजनीति का इतिहास लंबा और विषैला है। 26 अक्टूबर 2023 को कोझिकोड में आईयूएमएल केरल प्रदेश के अध्यक्ष पनक्कड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल ने अपने भाषण में भारत सरकार पर हमेशा इजरायल का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि जो भी इजरायल के साथ हाथ मिलाता है वह आतंकवाद का समर्थन करता है। इसी रैली में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता और विधायक एम के मुन्नेर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अमर बलिदानी भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की तुलना हमास आतंकियों से करने के आरोप हैं। इस तरह के बयानों के बावजूद भी कांग्रेस पार्टी आईयूएमएल के खिलाफ कोई भी बयान तक जारी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती है।

जुलाई 2023 में मुस्लिम लीग की युवा शाखा ने केरल के कासरगोड की एक रैली में हिंदुओं के खिलाफ भयंकर भड़काऊ नारे लगाए थे। यूडीएफ सरकार के दौरान इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के शिक्षा मंत्री पी के अब्दुर रब्ब ने अपने आधिकारिक आवास का नाम गंगा से बदलकर ग्रेस कर दिया था। इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने यह भी कहा था कि क्लास में लड़के और लड़कियां को एक साथ नहीं बैठना चाहिए। 2015 में मुस्लिम लीग ने अपने मंत्रालय से जुड़े किसी भी कार्यक्रम में दीप प्रज्जवलन से  इंकार कर दिया था, क्योंकि उनके अनुसार यह इस्लामिक मान्यताओं के खिलाफ था। वहीं फरवरी 2013 में एक मुस्लिम लीग के एक नेता ने केरल यूनिवर्सिटी के सिंडिकेट में मुस्लिम सदस्यों के लिए अधिक से अधिक सीटों की मांग की थी। इस कदम को सांप्रदायिक आधार पर शिक्षा नीति को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में देखा गया था। इसके बावजूद भी कांग्रेस आईयूएमएल पर कोई भी वक्तव्य देने से बचती रहती है क्योंकि उसे गांधी परिवार के लिए वायनाड लोकसभा सीट पर इस पार्टी का समर्थन चाहिए।

राहुल गांधी का झूठ भी पढ़िए

कांग्रेस पार्टी के नेतागण और राहुल गांधी का कहना है कि आईयूएमएल का पाकिस्तान बनाने वाली जिन्ना की मुस्लिम लीग से कोई रिश्ता नहीं है। मगर यह हकीकत से ध्यान भटकाने जैसा है। पाकिस्तान के निर्माण से पूर्व 40 के दशक की शुरुआत में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान के लिए मुस्लिम लीग को मजबूत करने के लिए मुहिम चलाई तो उन्हें पूरे दक्षिण भारत में शानदार सफलता मिली थी। आज़ादी के पूर्व केरल मद्रास प्रेसिडेंसी का अंग था। 1945-46 में संविधान सभा और प्रांतीय असेंबली चुनाव में मद्रास प्रेसीडेंसी में 28 सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित थी।

मद्रास प्रेसीडेंसी की सभी मुस्लिम आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग जीती थी। इसके अलावा संविधान सभा लिए मद्रास प्रेसीडेंसी की सभी तीन आरक्षित मुस्लिम सीटें भी मुस्लिम लीग ही जीती थी। इन परिणामों से स्पष्ट होता है कि मुस्लिम लीग की जड़ें तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी और वर्तमान के केरल और दक्षिण भारत में कितनी गहरी थी। वर्तमान में भी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग केरल और तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी और द्रमुक के साथ गठबंधन में है। इन दलों से इसकी मनमुताबिक कीमत वसूल रही है। तमिलनाडु की रामनाथपुरम लोकसभा की सीट विगत दो बार से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग कांग्रेस और द्रमुक के सहयोग से जीत रही है। पूर्व में वेल्लोर लोकसभा सीट से मुस्लिम लीग ने कांग्रेस पार्टी या द्रमुक के टिकट पर अपने उम्मीदवारों को संसद पहुंचाया है।

इसे भी पढ़ें: कांग्रेस-DMK की मुस्लिम लीग पर बढ़ती निर्भरता: केरल-तमिलनाडु में वोट बैंक की मजबूरी

मुस्लिम लीग का पुनर्गठन

संविधान सभा में मद्रास प्रेसीडेंसी मुस्लिम लीग के विजयी बी. पॉकर साहिब बहादुर और एम मोहम्मद इस्माइल जिन्ना के बेहद विश्वासपात्र थे। जिन्ना इन दोनों को दक्षिण भारत में अपनी दो आंखों के समान मानते थे। मगर देश का बंटवारा होने के बाद ये दोनों पाकिस्तान नहीं गए और भारत में ही रहकर एक बार फिर से मुस्लिम लीग को नए अवतार में स्थापित किया। 10 मार्च 1948 को एम मोहम्मद इस्माइल और बी. पॉकर साहिब बहादुर ने मुस्लिम लीग के नेतागण जो भारत में ही स्वतंत्रता के बाद रह गए थे उनके साथ  चेन्नई के राजाजी हॉल में आयोजित एक बैठक में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की स्थापना की थी। विदित हो कि मुस्लिम लीग के दक्षिण भारत से चुने गए 28 में से 27 विधायक भारत में ही रहे और सिर्फ एक विधायक अब्दुल सेथ पाकिस्तान गया था। संविधान सभा के मुस्लिम लीग से तीनों निर्वाचित सदस्य भी भारत में ही स्वंतंत्र के बाद रहे।

मोपलिस्तान नाम का अलग राष्ट्र बनाना चाहता है मुस्लिम लीग

चेन्नई के राजाजी हॉल में मुस्लिम लीग का फिर से गठन के बाद कायदे मिल्लत एम मोहम्मद इस्माइल इसके पहले अध्यक्ष चुने गए। मोहम्मद इस्माइल ने पाकिस्तान की तर्ज़ पर मुस्लिम लीग के मुखपत्र डॉन में 18 जून 1947 को केरल को भी मोपलिस्तान नाम से एक अलग मुस्लिम देश बनाने की मांग की मांग की थी। 3 जून 1947 को भारत के बंटवारे की घोषणा होने के 15 दिन बाद मोहम्मद इस्माइल ने यह मांग की थी। मोहम्मद इस्माइल ने मोपलिस्तान बनाने की मांग की थी क्योंकि उसका मानना था कि मोपला मुस्लिमों की नस्ल हिंदुओं से अलग है और वे अरबों के वंशज है। उनके अनुसार मोपला मुस्लिमों का धर्म ही नहीं बल्कि उनकी संस्कृति और उनका रहन-सहन इस इलाके के बाकी हिंदुओं से अलग है। मोहम्मद इस्माइल के अनुसार मालाबार की कुल आबादी 15 लाख है जिसमें 9 लाख मोपला मुसलमान हैं।

आज़ादी के बाद पूर्व के मुस्लिम लीग के नेताओं का स्वंतंत्र भारत में लंबा राजनितिक जीवन रहा था। आईयूएमएल की स्थापना के बाद मोहम्मद इस्माइल एक बार राज्यसभा सदस्य और तीन बार केरल के मंजेरी लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। वहीं मुस्लिम लीग के दूसरे बड़े नेता पी बी पोकर बहादुर साहिब मंजेरी और मलप्पुरम लोकभा सीटों से सांसद चुने गए थे। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने केरल में कभी कांग्रेस तो कभी कम्युनिस्ट पार्टी का दामन थामती रही है। जिन्ना के करीबी रहे के एम सेठी 1960 में केरल विधानसभा का अध्यक्ष बनाये गए थे। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जवाहरलाल नेहरू के जीवन काल में ही जिन्ना के मुस्लिम लीग के सिपहसालारों ने स्वतंत्र भारत में इन पदों पर काम करके देश की योजनाओं को चरितार्थ किया था।

इंदिरा गांधी ने भी कट्टर कोया का किया था समर्थन

ऐसा नहीं कि राजनीतिक परिवर्तन सिर्फ जवाहरलाल नेहरू के समयकाल में हुआ, बल्कि उनकी पुत्री इंदिरा गांधी भी अपने पिता के बनाये गए पदचिन्हों पर आगे बढ़ती रहीं। इंदिरा गाँधी के कांग्रेस अध्यक्षीय कार्यकाल में 1979 में कांग्रेस के समर्थन से मुस्लिम लीग के सी एच मोहम्मद कोया मुख्यमंत्री बनाये गए थे। मोहम्मद कोया 1947 में मुस्लिम लीग मलयाली मुखपत्र चंद्रिका में बड़े पद पर कार्यरत थे। कांग्रेस के समर्थन से केरल के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी मोहम्मद कोया का मुस्लिम कट्टरपंथी सोच में कोई भी परिवर्तन नहीं आया था और 30 नवंबर 1979 को इंडिया टुडे पत्रिका को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि अल्पसंख्यकों के सांप्रदायिक संगठन और बहुसंख्यक के सांप्रदायिक संगठन अलग-अलग होते है। हम अल्पसंख्यक अपनी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होते हैं लेकिन बहुसंख्यक तो कहीं भी अधिकार जमा सकते हैं, उन्हें सांप्रदायिक संगठनों की जरूरत ही क्या है ?

गाँधी परिवार इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के समयकाल का संबंध आज भी उसी तरह से आगे बढ़ाते हुए केरल में इस पार्टी के समर्थन से लगातार तीन बार से संसद पहुंच रहा है। इससे पूर्व गाँधी परिवार के सदस्य इंदिरा गाँधी और सोनिया गाँधी ने दक्षिण भारत से चुनाव लड़ा मगर कभी भी एक सीट से दोबारा लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सकी थीं।

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अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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