डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बंगाल में हिंदू एकता का उदय (खंड-2)
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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बंगाल में हिंदू एकता का उदय (खंड-2)

1937 बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कृषक प्रजा पार्टी के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया। जानिए कैसे इस ऐतिहासिक भूल ने मुस्लिम लीग को मजबूत किया और बंगाल विभाजन की नींव रखी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका और हिंदू एकता का संघर्ष।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Jul 6, 2026, 11:59 am IST
inविश्लेषण

1937 के बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और कृषक प्रजा पार्टी ही तीन सबसे प्रमुख राजनीतिक दल थे। इस चुनाव के दौरान किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस 54 सीटों के साथ बंगाल में सबसे बड़ी एकल पार्टी बनकर उभरी थी। हालांकि, बहुमत न होने के कारण कांग्रेस ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। ए.के. फजलुल हक के नेतृत्व वाली कृषक प्रजा पार्टी ने 36 सीटें जीती थीं।

कांग्रेस साथ देती तो मुस्लिम लीग डायरेक्ट एक्शन डे नहीं कर पाती

ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ऐसी स्थिति में कांग्रेस यदि कृषक प्रजा पार्टी के साथ गठबंधन करके बंगाल में संतुलित सरकार बना सकती थी। उस समय डॉ. फजलुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी सक्रिय थी और उसे किसानों का व्यापक समर्थन भी प्राप्त था। यह पार्टी सांप्रदायिक नहीं थी और बंगाल की संस्कृति के विकास में भी इसका भी योगदान था। लेकिन, कांग्रेस ने ऐतिहासिक भूल करते हुए इस अवसर को गंवा दिया। अगर कांग्रेस पार्टी ऐसा करती तो कृषक प्रजा पार्टी के सहारे मुस्लिम लीग के प्रभाव को बंगाल में काफी कम किया जा सकता था। इस समय अगर कांग्रेस कृषक प्रजा पार्टी  के साथ सरकार बना लिया होता तो पूरा बंगाल आज भारत का हिस्सा हो सकता था। मुस्लिम लीग बंगाल में 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे भी शायद नहीं कर पाती।

मुस्लिम लीग ने कृषक प्रजा पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाकर अपने प्रभाव को और भी व्यापक कर लिया। मुस्लिम लीग के और प्रभावशाली होने के कारण उसने अपनी सांप्रदायिक नीतियों के कारण मुसलमानों के पक्ष तथा हिंदुओं के विरोध में कठोर नीतियां बनाने लगी। शिक्षा और प्रशासन में भी मुस्लिम लीग का प्रभाव बढ़ने लगा था। इस सरकार में मुस्लिमों का ही बोलबाला रहा। पश्चिम बंगाल में अपनी मिली सफलता के बल पर मुस्लिम लीग ने अंततः 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्रस्ताव को आगे बढ़ाया और अलग पाकिस्तान की मांग को बल मिला।

बंगाल में हिन्दुओं पर बढ़ा था अत्याचार

बंगाल में हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ने लगा था। इस क्रम में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के नेता विनायक दामोदर वीर सावरकर अगस्त-सितंबर 1939 में बंगाल की यात्रा की थी। इस स्थिति में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिंदू महासभा से जुड़ने के साथ ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। महात्मा गांधी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राष्ट्रवादी विचारों की प्रशंसा करते हुए कहा कि था कि वे पंडित मदन मोहन मालवीय के बाद हिंदुओं का नेतृत्व कर सकते हैं। डॉ. मुखर्जी द्वारा खुद को सांप्रदायिक बताए जाने की आशंका व्यक्त करने  पर गांधी ने उन्हें भारतीय राजनीति की कठिनाइयों का सामना करने योग्य बताया था।

डॉ मुखर्जी ने हिन्दू एकता का संदेश फैलाया

डॉ. मुखर्जी ने हिंदू समाज में एकता और संगठन का संदेश पूरे बंगाल में फैलाया, जिससे हिंदू महासभा को नई ऊर्जा मिली। मुख़र्जी की प्रतिभा की पहचान का आदर करते हुए उन्हें अखिल भारतीय हिंदू महासभा का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया। डॉ. मुखर्जी ने देशभर का दौरा कर अपने विचारों का प्रचार किया और अपने साहस, नेतृत्व, संगठन क्षमता तथा प्रभावशाली वक्तृत्व के कारण शीघ्र ही पूरे भारत में लोकप्रिय नेता बन गए। स्वतंत्र भारत की पहली मंत्रिपरिषद (1947) में वे उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने।

आरएसएस है आशा की किरण

1940 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लाहौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘मैं इस संगठन में भारत के आकाश में छाये बादल के बीच आशा की एक किरण देखता हूं’। मुख़र्जी ने संघ को भारत के भविष्य की आशा की किरण बताया था। राजनीति में आने के बाद उन्होंने बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार की सांप्रदायिक और दमनकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया। मुस्लिम लीग सरकार माध्यमिक शिक्षा को कलकत्ता विश्वविद्यालय के नियंत्रण से हटाकर सीधे सरकारी नियंत्रण में लाना चाहती थी। जिससे कि शिक्षा का इस्लामीकरण किया जा सके। डॉ. मुखर्जी ने इस प्रस्ताव को शिक्षा और प्रशासन के सांप्रदायिक करण की दिशा में उठाया गया कदम बताया और इसका कड़ा विरोध जताया था। उन्होंने जनता को इसके विरोध के लिए संगठित किया। मुख़र्जी ने इस विधेयक को लेकर तर्क दिया, ‘यह विधेयक बंगाल में शैक्षिक प्रशासन को एक आक्रामक सांप्रदायिक मोड़ पर ला खड़ा कर देगा।’ अपनी तार्किकता, संगठन क्षमता और प्रभावशाली वक्तृत्व के बल पर उन्होंने जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त किया। इस संघर्ष से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक सशक्त राष्ट्रवादी नेता और हिंदू महासभा के प्रमुख नेताओं में स्थापित हो गए।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने माध्यमिक शिक्षा विधेयक का विरोध केवल संवैधानिक और संसदीय तरीकों से किया । इस संघर्ष से उनकी संसदीय समझ, तर्कशक्ति और लोकतांत्रिक नेतृत्व क्षमता स्पष्ट हुई। इसी दौरान तत्कालीन बंगाल प्रदेश और वर्तमान के बांग्लादेश के ढाका, नोआखाली और नारायणगंज में हिंदुओं के विरुद्ध दंगे, हिंसा और लूटपाट की घटना हुई थी। ब्रिटिश सरकार के विरोध के बावजूद डॉ. मुखर्जी स्वयं छोटे विमान से ढाका पहुँचे और दंगों की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण किया।

वे ढाका पहुँचने वाले पहले बाहरी हिंदू नेता थे। उन्होंने नवाब से मुलाकात कर हिंसा रोकने और शांति स्थापित करने का आग्रह किया। उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति एवं इतिहासकार आर. सी. मजूमदार के घर ठहर कर प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और पीड़ित लोगों का मनोबल बढ़ाया। उनका उद्देश्य पूरे देश को दंगों और हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की सच्चाई से अवगत कराना था, हालांकि उस समय प्रेस पर दबाव होने के कारण वास्तविक घटनाएं व्यापक रूप से सामने नहीं आ सकी। इस दौरे से लौटकर उन्होंने पूर्वी बंगाल में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा को देश के सामने रखा और सरकार की तुष्टीकरण की नीतियों के विरोध में 8 अप्रैल 1950 को केंद्रीय मंत्रिमंडल (उद्योग और आपूर्ति मंत्री पद) से अपना इस्तीफा दे दिया था।

Topics: श्यामा प्रसाद मुखर्जीमुस्लिम लीग1937 बंगाल चुनावकांग्रेस की ऐतिहासिक गलती
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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